Home अमृत कलश बल, सेवा के लिए

बल, सेवा के लिए

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गीता में श्री भगवान् ने कहा है-बल बलवतामस्मि कामराग विवर्जितम अर्थात बलवानों में मैं वैराग्ययुक्त निष्काम बल हूं। शब्दों पर खूब ध्यान दो। सिर्फ बल नहीं कहा, वैराग्ययुक्त निष्काम बल। इस वैराग्ययुक्त निष्काम वल की मूर्ति हम व्यायामशालाओं में रखा करते हैं? वह कौन सी मूर्ति है-हनुमानजी की पवित्र और सामथ्र्यवान मूर्ति। हनुमानजी वैराग्ययुक्त निष्काम बल के पुतले थे। इसलिए बाल्मीकि ने उनकी स्तुतिस्रोत गाए। रावण भी महा बलवान था लेकिन रावण में वैराग्य नहीं था।

रावण का बल भोग के लिए था। दूसरों को सताने के लिए था। रावण पहाड़ उठाता था, वज्र तोड़ डालता था, दस आदमियों का बल मानो उस अकेले में था, इसीलिए उसके दस मुंह और बीस हाथ दिखाए गए। इतना बलवान होते हुए भी उसका सारा बल धूल में मिल गया। हनुमान का बल अजर अमर हो गया। बाल्मीकि ने बल की ये दो मूर्तियां, ये दो चित्र उपस्थित किए हैं। रावण के बल में भोग वासना थी। रावण बल के द्वारा भोग प्राप्त करना चाहता था। हनुमान बल के द्वारा सेवा करना चाहते थे। सेवा का अर्पण किया हुआ बल टिकेगा। अमर होगा। भोग को अर्पण किया हुआ बल अपने और संसार के नाश का कारण होगा।

-विनोबा भावे

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