Home अमृत कलश अनुशासन एक स्रोत है

अनुशासन एक स्रोत है

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सामाजिकता की एक बहुत बड़ी प्रकृति है परस्परावलंबन। जिसका जितना मूल्यांकन होता है उतना अनुशासन जागता है। अनुशासन कभी लाया नहीं जाता। अनुशासन पैदा होता है। अनुशासन तालाब का पानी नहीं है। ऊपर से बरसा हुआ पानी नहीं है। अनुशासन स्रोत से निकलता है। एक पानी आकाश से टपकता है, बरसता है और एक पानी जमीन से निकलता है।

कुएं में स्रोत होता है। ऐसे बड़े-बड़े स्रोत और झरने होते हैं, जहां भूमि में से पानी निकलता है। पहाड़ से पानी का प्रवाह चलता है। अनुशासन एक स्रोत है। यह वर्षा का पानी नहीं है। वर्षा का पानी होगा वह सीमित होगा। तालाब में जितना पानी डालो, उतना पानी निकाल लो। थोड़ा बहुत तो सूख ही जाएगा। किंतु जो स्रोत होता है वह चलता ही रहता है। कुएं से आज भी पानी निकाला, कल भी निकाला, निकालते ही जाओ। एक एक कुआं ऐसा होता है कि पूरे गांव को पानी देता है क्योंकि उसके स्रोत हैं, डाला हुआ पानी नहीं है। अनुशासन हमारे जीवन में एक स्रोत होता है, स्रोत बनकर बहता है।
-आचार्य महाप्रज्ञ

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