Home अमृत कलश आसक्ति से कामना

आसक्ति से कामना

11
0

हमारी सामथ्र्य से बाहर तथा अनावश्यक अपेक्षाएं ही हमें रुलाती हैं। सुखी जीवन जीने का सिर्फ एक ही रास्ता है वह है अभाव की तरफ दृष्टि न डालना। आज हमारी स्थिति यह है जो हमें प्राप्त है उसका आनंद तो लेते नहीं, वरन जो प्राप्त नहीं कर सकते हैं उसका चिन्तन करके जीवन को शोकमय कर लेते हैं। दु:ख का मूल कारण हमारी आवश्यकताएं नहीं हमारी अनावश्यक इच्छाएं हैं।

हमारी आवश्यकताएं तो कभी पूर्ण भी हो सकती हैं मगर सामथ्र्य से परे इच्छाएं नहीं। अपनी सामथ्र्य से परे इच्छाएं कभी पूरी नहीं हो सकतीं और न ही किसी की आज तक हुई। एक इच्छा पूरी होती है तभी दूसरी खड़ी हो जाती है। विचार करें, क्या जो इच्छा उमड़ रही है उसकी आवश्यकता हमें है। यदि है तो क्या वह हमारे सामथ्र्य के अंदर है। यदि नहीं तो उसे बिना किसी लाग लपेट के त्याग दें। हमारी सामर्थ्य से बाहर तथा अनावश्यक अपेक्षाएं ही हमें रुलाती हैं। इसलिए शास्त्रकारों ने लिख दिया-‘आशा हि परमं दुखं नैराश्यं परमं सुखं’ दु:ख का मूल हमारी आशा ही हैं।

हमें संसार में कोई दुखी नहीं कर सकता, हमारी शक्ति के परे अपेक्षाएं ही हमें रुलाती हैं। अति इच्छा रखने वाले और असंतोषी हमेशा दुखी ही रहते हैं। आशैव राक्षसी पुंसामाशैव विषमञ्जरी । आशैव जीर्णमदिरा नैराश्यं परमं सुखम्॥ इन्सान के लिए आशा ही राक्षसी, विष लता, और जीर्ण मदिरा है। आशारहितता परम् सुख है। ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते। संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ (भगवद्गीता 2762) विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है।

दिनयामिन्यौ सायं प्रात:,शिशिरवसन्तौ पुनरायात:। काल: क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायु:॥ जो व्यक्ति समय समय पर मन में उत्पन्न हुई आशाओं से उस तरह अविचलित रहता है जैसे अनेक नदियां सागर में मिलने पर भी सागर का जल नहीं बढ़ता, वह शांत ही रहता है ऐसे ही व्यक्ति सुखी हो सकते हैं । -एसएन मिश्रा

Previous articleविकास की गवाह बनी काशी
Next articleझुकने से मिलती है ऊंचाई

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here