Home अमृत कलश विजयादशमी के उपलक्ष्य

विजयादशमी के उपलक्ष्य

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विजयादशमी राष्ट्रीय विजय का त्योहार है। आज के दिन ही पांडव अपना अज्ञातवास समाप्त कर कर कर्मक्षेत्र में पुन: अवतरित हुए थे, वहीं कर्म क्षेत्र भविष्य में धर्म क्षेत्र में परिवर्तित हो गया। आज के दिन ही धर्म चक्र प्रवर्तक में इस पुन्यभू पर धार्मिक साम्राज्य की स्थापना के लिए जन्म लिया था। आज के शुभ मुहूर्त पर ही हिंदू पदपादशाही के संस्थापक छत्रपति शिवाजी की विजयिनी सेनाएं यवनों के आसुरी राज्य की अंत्येष्टि करने के लिए भवनी का शुभ आशीर्वाद प्राप्त कर प्रस्थान किया करती थीं। आज की शुभ घड़ी पर ही अरावली के शैल शिखरों पर दास्य के अभेद्य अंधकार को भेदते हुए स्वराज्य के दीपक से धर्म के प्रकाश की दिव्य रश्मियां वितरित करने का पवित्र कार्य महाराणा के मतवाले अनुयाई किया करते थे।

आज के महामंगल पावन क्षणों में ही महावीर की आत्म विस्मृति से भरे हुए राष्ट्र के पुनरुज्जीवन का दैवीय कार्य पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार द्वारा प्रारंभ हुआ था। सलस सुषुप्ति को जीवन जागृति में, ग्लाननिजनक आत्मविस्स्मृति को दिव्य आत्म साक्षात्कार में और दयनीय शरण गति को प्रचंड आत्माभिमान में परिवर्तित करने की महती आकांक्षा को कार्य रूप में परिणित करने के लिए राष्ट्र संघ का निर्माण किया गया था। वर्षों से दौर्बल्य, कायरता, शिथिलता निष्क्रियता और व्यामोह से समाज को सर्वदा के लिए मुक्त कर संगठन और शक्ति पूजन द्वारा राष्ट्र सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का व्यवस्थित प्रयत्न शुरु हुआ। विजय पर्व के दो भाग हैं- शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन।

शक्ति की पूजा करते हुए अजेय सामथ्र्य संचित करने का मंगल प्रयास प्राचीन काल से होता आया है। जिन शस्त्रों की सहायता से धर्म की स्थापना एवं अधर्म का नाश किया जाता है, उनका पूजन वीरोचित है, धार्मिक है राष्ट्रीय पर्व की स्फूर्ति दायिनी विधि है। शक्ति पूजन के पश्चात अस्त्र शस्त्र अर्जित सैन्य सजाकर स्वराज की सीमाओं को समग्र भूमंडल पर चतुर्दिक विस्तृत करने का पुनीत प्रयत्न होता था। स्वदेश की रक्षा की निमित्त संभावित आक्रमण का प्रतिकार करने के शत्रु के दुर्भावों के कार्यरूप में प्रकट होकर युद्ध के कराल मेघ वन शस्य श्यामला भूमि पर प्रलय का तांडव नृत्य करने के पूर्व ही समाप्त करने के लिए सीमा लांघकर सांप को उसकी बामी में ही कुचल डालने की दृष्टि से इस प्रथा का पालन होता था। सीमोल्लंघन के मूल में साम्राज्य की भावना को प्रेश्र्य देकर समस्त संसार में शुद्ध सांस्कृतिक राज्य की स्थापना के ध्येय को सम्मुख रखा गया है।
-अटल बिहारी बाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री

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