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दु:ख का कारण

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जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक असंतुलन दोनों हो सकते हैं। अच्छाई या बुराई-किसी एक तरफ अधिक झुकाव अहितकर रहता है। सकारात्मक क्षणों में उत्साहित होकर कुछ निर्णय ले लिया जिसे बाद में न निभा पाए और कुछ विपरीत कर बैठते हो। जब तुम स्वयं में स्थित होते हो, तभी जीवन की सही दिशा और लक्ष्य का उदय होता है। तभी किसी उच्च लक्ष्य का उदय होता है। तभी किसी उच्च लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का आविर्भाव होता है।

तुम्हारा जीवन में उसी लक्ष्य या दिशा की ओर आगे बढ़े इसका सदा ख्याल रखना। जीवन ऊर्जा को सही दिशा में बहने का निर्देश देना ही जीवन का लक्ष्य है। खुशी के क्षणों में हम प्राय़: खो जाते हैं, बेखबर हो जाते हैं। दु:ख में ऐसा नहीं होता। द:ुख में तुम सतर्क रहते हो, सांसारिकता को संभाले रहते हो। यदि खुशी में अपने को संभाल सको, बेसुध न हो जाओ, कभी दुखी नहीं हो सकते। इसका अर्थ यह है कि खुशी के क्षणों में अहोभाव से भर जाओ और सेवारत हो जाओ। तुम उदास हो ही नहीं सकते।

यदि हो भी जाओ तो सेवा में लग जाओ, उदासी दूर हो जाएगी। उदासी का कारण है जब तुम केवल अपने विषय में सोचने लगते हो, अपने लिए चिंतित होने लगते हो। तुम्हें अपने लिए चिंता करने की जरूरत क्या है। शमा तुम्हारे लिए जल रही है, सूर्य तुम्हारे लिए चमक रहा है। तुम्हें क्या करना है। कुछ भी तो नहीं। बस अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता से भर जाओ, प्रेम में डूबो, सेवा में बहो। तुम्हारा जीवन तुम्हारा है कहां। समय के अनंत प्रवाह में एक घटना मात्र है।

समय और स्थान की विराटता में जीवन की तुच्छता का भान होते ही समर्पण घट जाता है। जरा खगोल शास्त्र देखो तो जानो लाखों तारे, अति विशाल सौर्यमंडल, उसमें पृथ्वी का क्या स्थान है। फिर उस पृथ्वी पर एक मानव के जीवन की क्या गिनती। इस अनंनतता का विचार आते ही समर्पण हो जाता है। समष्टि से संबंध बनाओ तो भी समर्पण घट जाएगा। अपने को एक आत्मा से अलग इकाई मत समझो।

जब एक पानी का प्याला समझे ‘मैं सागर में हूं तो बड़ा बल मिलता है। अपनेपन का बोध होता है। अंधकार के गर्भ से ही प्रकाश का जन्म होता है। आंख के भीतर काले दृष्टिपटल के कारण ही हम प्रकाश देख सकते हैं। अंधकार के बिना प्रकाश नहीं देख सकते। जिस प्रकार प्रत्येक किसी बड़ी झील में अथवा सागर में विलीन हो जाती है, ऐसे ही जीवन भी अनंत अस्तित्व में, ब्रह्म में, बृहतचेतना में समा जाता है। वही जीवन का आधार है, वही उसका उत्कर्ष है।
-श्री श्री रविशंकर

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