Home अमृत कलश बुद्ध-विवेकानंद एकाकार

बुद्ध-विवेकानंद एकाकार

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स्वामी विवेकानंद कहते थे कि बुद्धदेव ने एक हिंदू के रूप में जन्म लिया और एक हिंदू के रूप में देह त्याग किया। उनके क्रांतिकारी विचारों को आत्मसात करके प्राचीन वैदिक धर्म वर्तमान हिंदू धर्म में रूपांतरित हुआ। अत: हिंदू धर्म को समझने के लिए बुद्धदेव और विश्व के प्रति उनके अवदान को समझना अति आवश्यक है। बचपन से ही स्वामी विवेकानंद का भगवान बुद्ध के प्रति विशेष आकर्षण था। किशोरावस्था में ही उन्हें एक बार भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ था। वह बुद्ध के साथ एकाकार हो गए थे। तभी तो अमेरिका जाते समय जब स्वामीजी जापान में कुछ दिन ठहर कर वहां का परिदर्शन कर रहे थे तो उनके व्यक्तित्व का भगवान बुद्ध के साथ साम्य देखकर वहां के लोग विस्मित रह जाते थे।

बुद्धदेव के साथ यह समानता और उनके प्रति आकर्षण स्वामीजी के मन में पहले से ही था। महापुरुष शिवानंदजी ने अपने जीवन के अंतिम पर्व में एक दिन स्वप्न देखा जिसका वर्णन करते हुए उन्होंने कहा था- स्वामीजी आए थे, उनकी अपूर्व दिव्य उज्जवल मूर्ति थी। उन्होंने कहा- तारक भाई, मैं बुद्ध रूप में और तुम आनंद रूप में आए थे। तुम्हें याद है न! स्वामी जी के मन में बुद्धदेव के प्रति प्रबल आकर्षण का एक अन्य कारण भी था। भगिनी निवेदिता लिखती हैं-अपने यौवन के आरंभ में मेरे गुरुदेव जब दक्षिणेश्वर आने जाने लगे थे, उसी समय जगत की दृष्टि बौद्ध धर्म की ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुई थी।

इन्हीं दिनों अंग्रेज सरकार के आदेश पर बोधगया के विशाल मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा था। केवल बुद्ध की ऐतिहासिक प्रामाणिकता ने ही उन्हें मंत्रमुग्ध नहीं किया था और कम से कम इतना ही सशक्त इसका दूसरा कारण यह था कि उनके नेत्रों के समक्ष उनके गुरुदेव का प्रत्यक्ष जीवन था, जो 25 शताब्दियों पहले के सर्वजन स्वीकृत इतिहास के साथ काफी कुछ साम्य रखता था। उन्होंने बुद्धदेव में रामकृष्ण परमहंस को और रामकृष्ण में बुद्ध को देखा था।

-स्वामी विदेहात्मानंद

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