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आर्य बाहरी नहीं

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राजसत्ता प्रत्येकक्ष युग में अपनी सत्ता को दृढ़ बनाने के लिये बुद्धिजीवियों को अनेक लालच देकर अनेक मिथ्या-सिद्धान्त खड़े करती है। इसी के लिए कतिपय विद्वानों ने कहा कि आर्य बाहर से आये थे किन्तु यह तो आप प्रमाणित कीजिए कि आर्य एक जाति-नस्ल है। उसका प्रयोग और प्रमाण तो देना ही होगा। आर्य बाहर से ही आये सही, परन्तु मूल सवाल यह है कि आर्य कोई नस्ल है तो उस शब्द का प्रयोग कहीं है ? या यह नकली कहानी 150 साल पहले गढ़ी गयी है ? इससे पहले का प्रमाण क्या है ? संस्कृति के विद्यार्थी होने के नाते मेरे मन में एक सवाल है -‘पहले-पहल आर्य शब्द का नस्ल के अर्थ में प्रयोग किसने किया और क्यों किया? यों तो आर्य शब्द कई हजार साल पुराना है। महात्मा बुद्ध ने चार आर्य सत्यों का उल्लेख किया है !

वैदिकसाहित्य, संस्कृत साहित्य [विशेषरूप से नाटक-साहित्य] से लेकर लोकसाहित्य तक आर्य शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। इसके अपभ्रंश रूप अज्जि, अजी, जी या आजुल लोकसाहित्य में जगह जगह आये हैं और श्रेष्ठ का अर्थ दे रहे हैं । लोकगीतों में गाया जाता है-‘खैयो पीजो मेरे आजुल-बाबुल जीजो लाख बरीस आजुल (बाबा)। साहित्य में आर्य शब्द के हजारों प्रयोग हैं किन्तु अंग्रेजों से पहले का कोई प्रयोग ऐसा नहीं मिला जो प्रजाति, जाति या अंग्रेजी के ‘रेस का अर्थ देता हो।

क्या कोई इतिहासकार कृपा कर के एक भी प्रयोग ऐसा बतायेंगे जहां आर्य शब्द नस्ल के अर्थ में आया हो? तब गत 150 वर्षों में आर्यजाति थी और बाहर से आयी थी-ये बातें नकली तो नहीं हैं? यदि प्रामाणिक हैं तो इतने पुराने शब्द का कोई भी ऐसा प्रयोग मिलना चाहिये । यदि साहित्य के हजारों साल के इतिहास में आर्य शब्द नस्ल के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है तो फिर सवाल यह है कि अंग्रेजों के जमाने में या उसके बाद लिखी गयीं इतिहास की आधुनिक किताबों में आर्य शब्द नस्ल के अर्थ में कैसे बदल गया?

-राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

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