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मेरा देशप्रेम मेरा धर्म

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मेरा विश्वास है कि भारत का ध्येय दूसरे देशों के ध्येय से कुछ अलग है। भारत में ऐसी योग्यता है कि वह धर्म के क्षेत्र में दुनिया में सबसे बड़ा हो सकता है। भारत ने आत्म शुद्धि के लिए स्वेच्छापूर्वक जैसा प्रयत्न किया है, उसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। भारत को फौलाद के हथियारों की इतनी आवश्यकता नहीं है। वह दैवी हथियारों से लड़ा है। और आज भी वह उन्हीं हथियारों से लड़ सकता है। दूसरे देश पशु बल के पुजारी रहे हैं। भारत अपने आत्मबल से सबको जीत सकता है। इतिहास इस सच्चाई के चाहे जितने प्रमाण दे सकता है कि पशुबल आत्मबल की तुलना में कुछ नहीं है। कवियों ने इस बल की विजय के गीत गाए हैं और ऋषियों ने इस विषय में अपने अनुभवों का वर्णन करके उसकी पुष्टि की है। यदि भारत तलवार की नीति अपना है तो वह क्षणिक सी विजय पा सकता है। लेकिन तब भारत मेरे गर्व का विषय नहीं रहेगा। मैं भारत की भक्ति करता हूं क्योंकि मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब उसी का दिया हुआ है। मेरा विश्वास है कि उसके पास सारी दुनिया को देने के लिए एक संदेश है। उसे यूरोप का अंधानुकरण नहीं करना है। यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि उस समय में जीवित रहा तो मैं भारत में नहीं रहना चाहूंगा। तब वह मेरे मन में गर्व की भावना उत्पन्न नहीं करेगा। मेरा देशप्रेम मेरे धर्म द्वारा नियंत्रित है।
-महात्मा गांधी

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