Home अमृत कलश निष्काम कर्म का मतलब

निष्काम कर्म का मतलब

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निष्काम कर्म का अर्थ क्या है? आजकल बहुत से लोग इसका यह अर्थ समझते हैं कि कर्म इस प्रकार किया जाए, जिससे मन को न हर्ष हो, न विषाद। यदि यही निष्काम कर्म का सच्चा अर्थ हो, तब तो पशुओं को निष्काम कर्मी कहा जा सकता है। कुछ पशु अपने बच्चों को ही निगल जाते हैं और ऐसा करने में उन्हें कुछ भी दुख का अनुभव नहीं होता। डाकू अन्य लोगों का सब माल छीनकर उनका सर्वनाश कर देते हैं और वे पर्याप्त कठोर होकर दुख-सुख की परवाह न करें तो उन्हें भी फिर निष्काम कर्मी कहना पड़ेगा। दीवार को सुख-दु:ख का अनुभव नहीं होता। पत्थर में भी सुख-दु:ख की भावना नहीं होती। पर यह नहीं कहा जा कहा जा सकता कि वे निष्काम कर्मी हैं। यदि निष्काम कर्म उपरोक्त अर्थ में प्रयोग किया जाए तब तो दुष्टों के हाथों में एक प्रबल अस्त्र बन जाएगा। वे तरह-तरह के बुरे कर्म करते जाएंगे और कहेंगे कि हम तो बिना किसी कामना के यह सब काम कर रहे हैं। यही अर्थ हो तब तो हम कहेंगे कि गीता में एक बड़े भयानक सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। अत: यह अर्थ नहीं हो सकता। फिर यदि हम गीता नायकों के चरित्र को देखें तो उनका जीवन एक भिन्न प्रकार का मालूम होगा। अर्जुन ने रण क्षेत्र में भीष्म और द्रोण का संहार किया और साथ ही उसने अपनी इच्छाओं, स्वार्थ और निम्न प्रकृति का भी लाखों बार बलिदान किया। हमें योग (एकाग्रता) के द्वारा कर्म करना चाहिए। जब कर्मयोग में इस प्रकार की एकाग्रता आ जाती है तब क्षुद्र अहं भाव का लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं रह जाता। जो अपना अहम् भाव भूलकर कार्य करते हैं उन पर इन दोषों का प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह संसार की भलाई के लिए कर्म करते हैं। निष्काम और अनासक्त होकर कार्य करने से हमें परम आनंद और मुक्ति की प्राप्ति होती है। गीता में भगवान कृष्ण ने इसी रहस्य की शिक्षा दी है।
-स्वामी विवेकानंद

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