Home अमृत कलश एकाग्रता सफलता का मंत्र

एकाग्रता सफलता का मंत्र

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वनवास के समय राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर के निकट पहुंचे तो देखा कि सरोवर के किनारे एक बगुला एक टांग पर ध्यानमग्न खड़ा है। उसकी एकाग्रता को देखकर राम ने कहा लक्ष्मण इस बगुले की एकाग्रता को देखो। एक टांग के सहारे ऐसे ध्यानमग्न खड़ा है जैसे कोई संन्यासी हो। इसका ध्यान अनुकरणीय है। राम के द्वारा बगुले की प्रशंसा मछलियों ने सुनीं तो वे व्यग्र हो गईं और बोलीं-राम आप इस कुटिल की चेष्टाओं को एकाग्रता और ध्यान कह रहे हैंं। इसने हमारे पूरे परिवार को समाप्त कर दिया है। आप हमारे दुख को क्या समझोगे। इस कथा का इतना ही प्रसंग माननीय है कि बगुले का ध्यान भी ध्यान है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि जो जन्म लेता है, वह ध्यान नहीं करता। एकाग्रता सबमें होती है। एक रसोइया रसोई बनाता है तो उसे भी बहुत एकाग्र होना पड़ता है। एकाग्रता भंग हुई तो तवे पर रोटी जल जाएगी। रत्नों की घिसाई करने वाले, आभूषणों का निर्माण करने वाले भी स्वयं को बहुत एकाग्र बनाते हैं। तभी वे अपने काम में सफल हो पाते हैं। एक दुकानदार को भी दुकान पर बैठकर एकाग्र होना पड़ता है। एक साथ अनेक ग्राहकों से बात करता है पर मिले पैसे के लेनदेन में कोई चूक नहीं होती। लक्ष्य पर निशाना साधने वालों की एकाग्रता अद्भुत होती है-मन प्राण और शरीर की। हर अवयव का एक-एक कण जैसे लक्ष्य पर एकाग्र हो जाता है। एकाग्रता के बिना जीवन के किसी कार्य में सफलता नहीं मिलती। व्यक्ति कोई भी काम करे, उसे एकाग्र होना ही पड़ता है। ध्यान का एक ही अर्थ है एकाग्रता। इस एकाग्रता को सिद्ध करें। मन की चंचलता को कम करें। -आचार्य महाप्रज्ञ

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