केरल से एक दुर्भाग्यपूर्ण समाचार आया है। पिछले सप्ताह केरल के पलक्कड़ जिले के अगाली नगर में तीस साल के आदिवासी व्यक्ति मधु की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। उस बेचारे गरीब और नि:सहाय व्यक्ति की गलती इतनी भर थी कि उसे भूख लगी थी और उसने एक दुकान से चावल चुरा लिया था। क्या हमारा समाज इतना असंवेदनशील हो गया है कि एक गरीब की सिर्फ इस बात के लिए हत्या कर देगा? यह घटना दु:खद और दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि केरल की पहचान शत-प्रतिशत साक्षर एवं प्रगतिशील राज्य के रूप में है। वहाँ के लोग सबसे अधिक पढ़े-लिखे हैं। क्या शिक्षित लोगों से इस प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है? लोगों की भीड़ ने न केवल उस युवक की पीट-पीट कर हत्या की बल्कि उस दौरान सेल्फी भी खींची, जो कि स्पष्टतौर पर यह संकेत करता है कि हमारी संवेदनाएं पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। समाज के इस व्यवहार के साथ उन बुद्धिजीवियों का व्यवहार भी चौंकाता है, जो भाजपा शासित राज्यों में होने वाली घटनाओं पर तो आसमान सिर पर उठा लेता है, किंतु वामपंथी शासित राज्यों केरल और त्रिपुरा में होने वाली इस प्रकार की घटनाओं पर भी शर्मनाक चुप्पी साध लेता है। केरल में आए दिन होने वाले हिंसक हमलों पर पत्रकारों का एक वर्ग कभी बात नहीं करता। यदि सोशल मीडिया का माध्यम आम समाज के पास नहीं होता, तब यह घटना सामने ही नहीं आ पाती। ध्यान देना होगा कि जब से केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी है, तब से केरल में हिंसक घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हो गई है। वैचारिक हिंसा से तो केरल लाल हो रही रहा था, अब हिंसा की लपटें और तेजी से फैल रही हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भी इसी प्रकार भीड़ के रूप में राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं पर हमला कर उनकी हत्याएं कर रहे हैं, किंतु देश में इसके खिलाफ अब तक बुद्धिजीवी वर्ग एवं राष्ट्रीय मीडिया ने कोई बहस खड़ी नहीं की है। बहरहाल, इस प्रकार की घटनाएं संपूर्ण समाज के लिए चेतावनी की तरह हैं। यदि आज इनको रोकने की योजना नहीं बनाई गई, तो भविष्य में यह सभ्य समाज को कबीलाई समाज में परिवर्तित कर देंगी। जहाँ लाठी ही जीवित बचेगी, मनुष्यता के लिए कोई स्थान नहीं होगा। हमें आज विचार करना चाहिए कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? बड़े पैमाने पर यह बोध जगाने की जरूरत है कि कोई भी प्रसंग या मुद्दा हो, किसी को मारना-पीटना अपराध है। यह अपराध तब भी उतना ही अपराध रहता है, जब उसे कोई झुंड या कोई संगठन अंजाम देता है। अगर किसी व्यक्ति पर कुछ गलत करने का शक है, तो उसे पुलिस को सौंप दिया जाना चाहिए। पुलिस को भी किसी को हिरासत में मार डालने या यातना देने का हक नहीं है। लोकतंत्र में दण्ड का विधान कानून के अनुसार है। किसी भीड़ के मत के अनुसार नहीं। केंद्र सरकार ने इस घटना की रिपोर्ट राज्य से तलब की है। आवश्यक है कि राज्य इस घटना के आरोपियों को कड़ी सजा दिलाए, ताकि समाज में एक संदेश जाए कि भीड़ में शामिल होकर भी अपराध से बचना संभव नहीं है। हर हाल में अपराधी की पहचान की जाएगी।

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