अखिलेश यादव द्वारा खाली किये गये बंगले की जो वीभत्स तस्वीर सामने आयी हैं उससे न केवल अखिलेश यादव की छवि खराब हुई है बल्कि पूरी राजनीतिज्ञ बिरादरी की छवि खराब हुई है। संदेश यह गया है कि राजनीतिज्ञ कितने लालची होते हैं, कितने आपराधिक मानसिकता के होते हैं, इनकी मानसिकता कितनी सड़ी हुई होती है कि ये सरकारी बंगले के टाइल्स उखाड कर और नल की टोटी तक उखाड कर ले जाते हैं। ऐसे राजनीतिज्ञ जनता के हितैषी कैसे हो सकते हैं। यह न केवल लालच का प्रसंग है बल्कि राजनीतिज्ञो के बीच नैतिकता की कमी की भी बात है। अखिलेश यादव कोई गरीब या फटेहाल राजनीतिज्ञ नहीं है। अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप चल रहा है, प्रसंग कोर्ट में लंबित है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि अखिलेश गरीबी में टाइल्स और नल की टोटी तोड कर ले जाने के लिए विवश हुए हैं। सबसे बडी बात यह है राजनीतिज्ञ और नौकरशाही मिल कर न केवल सरकारी धन का लूट मचाते हैं, सरकारी धन का बंदरबांट करते हैं और सरकारी धन का दुरूपयोग करते हैं। इनके जवाब भी बडे हैवानियत वाले होते हैं, अचंभित करने वाले होते हैं, हथकंडे वाले होते है, आरोप को दूसरो पर मढने वाले होता हैं। ऐसा हो सकता है कि जो राजनीतिज्ञ टाइल्स और नल की टोटी तक तोड कर ले जाने की लालच में कैद रहा हो वह नैतिकता के आधार पर सच को स्वीकार कर सकता है क्या? अखिलेश भी सच को स्वीकार करने या फिर अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया है। अब वे कह रहे हैं कि यह कारस्तानी उनके विरोधियों की है, फिर भी वे टाइल्स, नल की टोटी सहित उन सभी वस्तुओं के मूल्य चुकाने के लिए तैयार हैं जिन्हे गायब पाया जा रहा है और जिन्हे विध्वंस दिखाया जा रहा है। भारतीय राजनीति में अपनी कारस्तानी सामने आने पर और घोटाला पकड में आने पर राजनीतिज्ञ बडे आसानी से अपने आप को पीडित घोषित कर देते हैं। क्या चारा घोटाले के सजायाफ्ता लालू अपने आप को निर्दोष नहीं कहता है, अपने आप को पीडित नहीं कहता है, कई वित्तिये धोटाले में फंसे पी चिदम्बरम अपने आप को पीडित नहीं कहते हैं क्या?  पूर्व मुख्यमंत्रियों का आलीशान बंगला ही जंगल राज का प्रतीक था। जिस देश की अधिकतर जनता अभावों में रहती है, जिस देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी जीने के लिए विवश होती है, उस देश के राजनीतिज्ञो की ऐसे ठाठ-बांट और ऐसो आराम के संसाधनों के बीच मौज मस्ती करना  सिर्फ और सिर्फ जंगल राज के प्रतीक हैं। खासकर मायावती और अखिलेश के बंगलों की चर्चा आम लोगों की जबान पर है। सरकारी बंगला तो कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के पास भी था। पर इन दोनों नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही बंगला खाली कर दिये थे। राजनाथ सिंह और कल्याण सिंह ने बंगले सही सलामत सौपे थे। पर अखिलेश, मायावती और मुलायम सिंह यादव ने पैंतरेबाजी पर पैंतरेबाजी चली थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुलायम सिह यादव अपने बेटे के साथ मुख्यमंत्री योगी के पास पहुंच गये थे। हथकंडे और पैंतरेबाजी देखिये। इन्होंने मुख्यमंत्री योगी को सलाह दे डाला था कि नया आदेश जारी कर सुप्रीम कोर्ट का आदेश शिथिल किया जाये। इसके अलावा अखिलेश और मुलायम ने अपने बंगलों का आंवटन अपने विधायकों के नाम पर करने के लिए कहा था। अगर इनके बंगलों का आंवटन विधायको के नाम कर दिया जाता तो निश्चित तौर पर अखिलेश और मुलायम सिंह यादव अपने बंगले बचा लेते और फिर उन्हें खाली करने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन योगी इस पर राजी नहीं हुए। एक तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश था, सुप्रीम कोर्ट के आदेश नहीं मानने पर सरकार को अवमानना का मुकदमा झेलना पड सकता था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि जनता के बीच मे योगी की छवि खराब होती और योगी सरकार की जगहंसाई भी कम नहीं होती। इसलिए योगी कोई कदम उठाने से परहेज किये थे। राजनीतिक हलकों मे यह बात फैली थी कि योगी ने मुलायम और अखिलेश को सुप्रीम कोर्ट जाने और मोहलत लेने के लिए कहा था। मुलायम और अखिलेश सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे थे। पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया। इस कारण मुलायम और अखिलेश की बडी किरकिरी तो पहले ही चुकी थी। मायावती का प्रसंग तो औेर भी जहरीला है। मायावती तो सीधे तौर बगला हडपने की पैंतरेबाजी पर उतर आयी थी। मायावती को वह बंगला मुख्यमंत्री के नाम पर आवंटित था। मायावती ने हथकंडे अपनायी। वह अपने आंवटित बंगले की जगह दूसरे बंगले की चाभी प्रशासन को सौपने के लिए भेज दिया। जब प्रशासन ने चाभी लेने से इनकार कर दिया तो फिर चाभी स्पीड पोस्ट से भेज दिया गया। प्रशासन ने फिर इनकार कर दिया और प्रशासन ने कह दिया कि उसी बंगले को खाली करना होगा जिस बंगले को खाली करने का सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था। फिर मायावती पैंतरा बदलती है। रातोरात एक बोर्ड लाग दिया जाता है और उस बोर्ड पर लिखा होता है कि यह बंगला काशी राम विश्राम स्थल है। जबकि सुप्रीम कोर्ट आदेश के पूर्व ऐसा कोई बोर्ड ही नहीं लगा था। बोर्ड लगाने के पीछे एक बडी साजिश थी। अब प्रश्न यह उठता है कि काशी राम विश्राम स्थल का बोर्ड लगाने के पीछे साजिश क्या थी? साजिश यह थी कि काशी राम के हथकंडे से बंगला खाली करने से बचना और दलितों की सहानुभूति पाना। दलितों के बीच यह संदेश देने की कोशिश हुई थी कि मायावती के दलित होने के कारण सुप्रीम कोर्ट और योगी सरकार बंगला खाली कराना चाहती है। काशी राम के साथ दलितों की सहानुभूति अनिवार्य रूप प्रकट होती रही है। मायावती ने बोर्ड के हथकंडे के सहारे से यह राजनीतिक संदेश दी थी कि काशी राम की विरासत के साथ सरकार खिलवाड कर रही है। कई दलित नेताओ ने फौरन इस बात पर सहमति जता डाली थी कि काशी राम के विरासत के साथ योगी सरकार खिलवाड़ कर रही है और उस बंगले को काशी राम के विरासत के तौर पर सहेजा जाना चाहिए। जबकि वह बंगला कभी भी काशी राम विश्राम स्थल के रूप में विख्यात नहीं था बल्कि उस बंगले को मायावती निजी तौर पर इस्तेमाल करती थी। पर सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर के सामने मायावती की एक न चली थी। मायावती ने हार कर बंगला खाली करने के लिए बाध्य हुई थी। अभी भी योगी सरकार के सामने चुनौती है। अगर उस बंगले को योगी सरकार अन्य किसी को आंवंटित करती  है तो फिर मायावती इसे दलित विरोधी और काशी राम के अपमान का मुद्दा उठायेगी और इस राजनीतिक मुद्दे से दलितो के बीच उफान पैदा होगा। यह डर अभी योगी सरकार को है। मायावती और अखिलेश ने जिस तरह सें बंगले पर राशि खर्च की थी वह भी एक विचारणीय प्रश्न है। कहा यह जाता है कि मायावती ने उस सरकारी बंगले को सजाने और उसे एक महल के रूप  देने में कोई एक दो करोड नहीं बल्कि तीन सौ करोड रूपये खर्च की थी। तीन सौ करोड रूपये मे तो दर्जनो बंगले बन सकते थे। पर मायावती ने अपनी निजी इच्छा की पूर्ति के लिए इतनी बडी राशि खर्च करने से परहेज तक नहीं। अखिलेश ने अपने सरकारी बंगले के उपर भी करीब एक सौ करोड रूपये खर्च किये थे। आखिर राजनीतिज्ञों को अपनी इच्छानुसार मौज मस्ती की छूट देने और इतनी बडी राशि खर्च करने पर रोक क्यों नहीं लगनी चाहिए। पहले के नेता नैतिक वान होते थे और उनमे सादगी होती थी  पर आज के दौर के नेता अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए सरकारी धन को पानी की तरह बहाने से भी नही चूकते हैं। सरकारी धन जनता के टैक्स से जमा होता है। इसलिए राजनीतिज्ञों की ऐसी मौज मस्ती और ऐसे आराम देह रहन-सहन देश के गरीब जनता का अपमान है।


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