भारत के हित में एक सकारात्मक जानकारी वैश्विक शांति सूचकांक की रिपोर्ट में आई है। यह जानकारी भारत को बदनाम करने वाली ब्रिगेड के प्रोपोगंडा को भी उजागर करती है। जो लोग एक योजना के तहत यह वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं कि पिछले चार साल में अर्थात् नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और भाजपा के केंद्र में आने से देश में हिंसक गतिविधियां बढ़ गई हैं, यह रिपोर्ट उनके प्रोपोगंडा की हवा निकाल रही है। वैश्विक शांति सूचकांक की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष के मुकाबले दुनिया के 85 देशों में शांति कमतर हुई है, जबकि 75 देशों में सुधार दर्ज किया गया है, जिनमें भारत भी शामिल है। शांति व्यवस्था से जुड़ी कई जरूरी स्थितियों (जैसे- सुरक्षा इंतजाम पर खर्च, राजनीतिक अस्थिरता, आंतरिक संघर्ष, बाहरी हमले आदि) के आकलन के आधार पर पिछले वर्ष के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर मानी गयी है। इस रिपोर्ट में जिक्र है कि दक्षिण एशिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश भारत में सरकार ने हिंसक अपराधों पर रोक लगाने में अपेक्षाकृत सफलता प्राप्त की है। हथियारों की आयात पर भी पिछले साल के मुकाबले कम खर्च हुआ है यानी सैन्यीकरण की गति कम है। इन कारणों से रिपोर्ट में भारत का अंकमान सुधरा है। जबकि तथाकथित एक बुद्धिजीवी वर्ग पिछले कुछ समय से यह स्थापित करने का प्रयास कर रहा है कि देश में अराजकता का वातावरण है और अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों पर हिंसक हमले बढ़ गए हैं। यह रिपोर्ट उनकी इस स्थापना की बुनियाद को ही झूठ साबित कर रही है। रिपोर्ट की माने तो सरकार ने पहले से अधिक सुरक्षित वातावरण लोगों को उपलब्ध कराया है। इस बुद्धिजीवी वर्ग के दोगले आचरण को देखना है तो रिपोर्ट के उस तथ्य की ओर भी ध्यान देना चाहिए जिसमें बताया गया है कि भारत में हथियारों का आयात कर हुआ है। यह बुद्धिजीवी वर्ग हमेशा से हथियारों पर कम खर्च का हिमायती रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से यह सरकार को इसी संदर्भ में कठघरे में खड़ा कर रहा है। यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि हिंसा की स्थितियों के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान हुआ है, उसकी तुलना में भारत में हुआ आर्थिक नुकसान कम है। पिछले साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिंसा के कारण लगभग 996 लाख करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा, जो कुल वैश्विक घरेलू उत्पादन का 12.4 प्रतिशत है। भारत को यह नुकसान 80 लाख करोड़ रुपये का है। यह राशि देश की जीडीपी का (क्रयशक्ति के तुलनात्मक आकलन के आधार पर) नौ फीसदी है। प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह आंकड़ा लगभग 40 हजार रुपये का है। एक तरफ यह सुखद है कि शेष दुनिया के मुकाबले भारत में हिंसा पर नुकसान कम है, लेकिन दूसरी तरफ यह चिंताजनक भी है। यदि हमको तेजी से विकास करना है तो शांति बहाली की दिशा में और अधिक प्रयास करना होगा। तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए भी यह जरूरी है। देश में सुरक्षित और सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए सरकार को और अधिक प्रयास करने चाहिए। 

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