अभी पन्द्रह साल पहले की बात होगी प्रात: कालीन सैर के एक साथी मेरे पास अपने पुत्र का तबादला रूकवाने के लिए आये। उनका पुत्र लखनऊ मण्डल के एक जनपद की तहसील में चार साल से  वनकर्मी के रूप में दायित्व निभा रहा था। उसका स्थानान्तरण उसी मण्डल के एक अन्य जनपद की तहसील के लिए हो गया। जो नियुक्ति स्थान से अधिक अच्छी समझी जाती थी। लखनऊ से नव नियुक्त स्थल नजदीक भी था। काफी पूछताछ के बाद उन्होंने कहा कि वे इसलिए स्थानान्तरण रूकवाना चाहते हैं कि क्योंकि ऐसा होने पर उनके पुत्र का आठ लाख रूपया डूब जायेगा। मैं आश्चर्यचकित रह गया यह सुनकर। उन्होंने दो ही महीने के लिए रूकवाने का जब आग्रह किया तब मुझे पता चला कि सामाजिक बानगी के लिए जो धन आवंटित होना है वह इन्हीं दो महीने में हो जायेगा और उस धन में से आठ लाख रूपया उनके बेटे के हिस्से में आने वाला है। जो वहां से हट जाने के बाद नहीं मिलेगा। यद्यपि आठ लाख रूपये की राशि संभवत: मुझे प्रभावित करने के लिए कही गयी होगी। लेकिन उससे यह स्पष्ट हो गया कि जिलों में सामाजिक वानिकी के लिए जो धन जाता है उसको उपयोग कैसे होता है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि 1952 से लेकर अब तक सामाजिक वानिकी और वन महोत्सव के समय रोपे गये अरबों खरबों पौधे कहां चले गये। दो वर्ष पहले जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने एक दिन में एक करोड़े पौध रोपण का दावा कर गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया था। मध्य प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री ने भी स्वच्छ नर्मदा अभियान इसी प्रकार के वृक्षारोपण का दावा किया है।  हाल ही में विश्व प्लास्टिक हटाओ दिवस का अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन भारत में किया गया। जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया। इस सम्मेलन के मंच से और समाचार प्रसारणों में लोगों से यह अपील की गयी कि वे प्लास्टिक और पालीथीन का उपयोग न करें। प्रश्न यह है कि यह दोनों पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं तो इनका उत्पादन क्यों होने दिया जा रहा है। स्रोत पर ही सुधार के बजाए फैलाव हो जाने पर प्रभावित लोगों से उससे बचने की अपील कितनी सार्थक साबित होगी। जिस प्रकार पालीथीन और प्लास्टिक के उपयोग में बढ़ोत्तरी हो रही है। उससे होने वाले खतरे से सावधानी की  अपील कुछ उसी प्रकार है जैसे वन महोत्सव के अवसर पर वृक्षारोपण के दावे। अनेक स्थानों पर पालीथीन और प्लास्टिक के  कतिपय उत्पाद पर रोक की राजाज्ञा जारी है। न्यायालय ने भी इस बारे में इस बारे में कानून बनाने के लिए निर्देश दिये हैं लेकिन इसका अमली स्वरूप दो चार महीने में एक बार सड़क के किनारे ठेला लगाने वालों पर पुलिस द्वारा डण्डा बरसाये जाने के रूप में प्रकट होता है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पालीथीन को प्रतिबंधित किये गये कई वर्ष बीत गये। लेकिन उस पर अमल हो यह सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। नागरिक चेतना के रूप में नोयडा के गांव के लोगों ने अपने निकट डंप किये जाने वाले कूड़े से उत्पन्न प्रदूषण का विरोध प्रकट किया है। शहरी इलाके सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। कूड़ा प्रबंधन का कोई सम्यक विकल्प नहीं ढंूढा जा रहा है। जहां तहां इसके ढ़ेर दिखाई पड़ते हैं। 
जैसा कि प्रारम्भ में कहा गया है कि वर्ष प्रतिवर्ष सामाजिक वानिकी और वन महोत्सव के अन्तर्गत रोपे गये पौधों की जिस संख्या का दावा किया जाता है यदि  वह वास्तविक होते तो धरती पर एक इंच जमीन पैर रखने के लिए नहीं बचती। इन कार्यक्रमों में वक्षा रोपण का जो दावा किया जाता है उसमें अस्सी प्रतिशत दावे कागजी होते हैं जिनके धरातलीय आधार न होने के कारण हवा में उड़ जाता है। और जो 20 प्रतिशत धरातल का आधार पाते हैं वे देखरेख के अभाव में विलुप्त हो जाते हैं। वक्षों की कटान कम नहीं हो रही है। ऐसे में कुल भूमि का कम से कम एक तिहाई वनीकरण की आवश्यकता की पूर्ति कैसे की जा सकती है। मैदानी क्षेत्रों की एक बड़ी समस्या पर्वतीय क्षेत्रों की है। पेड़ों की कटान और अग्निकाण्ड के कारण सबसे ज्यादा पेड़ों की क्षति पर्वतीय क्षेत्रो में हो रही है। पर्वतीय क्षेत्र के पर्यावरण में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। आज से बीस वर्ष पहले किसी भी पर्वतीय क्षेत्र में जाने पर झरने ही झरने दिखाई पड़ते थे। वह विलुप्त हो रहे हैं। भू-स्खलन बढ़ गया है। पिछले वर्ष उत्तराखण्ड की यात्रा के दौरान मैंने वन विभाग के अधिकारियों से जब इस परिवर्तन के बारे में चर्चा की तब उन्होंने अन्य कारणों के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण कारण जो बताया कि वह यह है कि चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों का अभाव होता जा रहा है। चीड़ के पेड़ जो निचले पर्वतीय हिस्स में थे वह उपरी तरफ बढ़ते जा रहे हैं देवदार और बांझ जो पानी को अपनी जड़ों में रोकते थे उनका अभाव होता जा रहा है। मेरे इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला। कि जब निदान पता है तो उपाय क्यों नहीं हो रहा है।   
मेरे मित्र ने अपने बेटे के स्थानान्तरण को निरस्त कराने के लिए जो आग्रह किया था उसके मूल में ही दावे के अनुरूप धरातलीय प्रकटीकरण का अभाव कारण बना हुआ है। वन महोत्सव वक्षा रोपण दिवस फोटो खिंचाने मात्र तक सीमित हो गया है। यही स्थिति विश्व प्लास्टिक हटाओ दिवस मनाने के रूप में प्रकट होकर लुप्त हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए या लुप्त हो ही जायेगा। नीति संबंधी निर्णय बहुत अच्छे होते हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन में अभाव या स्वार्थ के प्रभाव के कारण वे धरती पर नहीं उतर पााते। इसी स्वार्थ के कारण गरीबा के लिए सीधे श्रम का अर्जन उनके खाते में भेजने की योजना अत्यन्त सराहनीय होने के बावजूूद काम नहीं कर पा रहा है। जिस प्रकार वनीकरण में पेड़ों की कागजी संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन प्रकट में पेड़ों का अभाव कम नहीं हो रहा है। उसे देखते हुए यह विश्वास कर पाना कठिन होगा कि लोगबाग सहजता से उपलब्ध प्लास्टिक और पालीथीन के उपयोग से मुंह मोड़ लेंगे। इनके उत्पादन के स्रोत को बन्द करना ही एक  मात्र उपाय है। अन्यथा इस प्रकार वनीकरण में वृक्षारोपण के कागजी दावे मात्र दिखावा भर होकर रह जाते हैं। वैसे ही पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के उपायों की घोषणा का भी परिणाम होगा। 

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