प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार नवाचारी प्रयोग करने में समर्थ है। पूर्व में लिए गए नोटबंदी और जीएसटी जैसे निर्णय इस बात की हामी भरते हैं। अब एक बार फिर केंद्र सरकार ने नवाचारी कदम उठाया है।  नौकरशाही में पाश्र्व प्रवेश (लैटरल एंट्री) के माध्यम से अब योग्य और जानकार लोगों उच्च प्रशासनिक सेवा में आने का अवसर केंद्र सरकार उपलब्ध कराने जा रही है। हालाँकि यह व्यवस्था अभी प्रयोगात्मक ही है, बड़े स्तर पर नहीं है। परंतु, यह प्रयोग अगर सफल रहा तो देश के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव आ सकता है। बीते रविवार को डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग ने इस आशय की औपचारिक अधिसूचना जारी करते हुए संयुक्त सचिव के दस पदों के लिए आवेदन मांगे। 40 साल का कोई भी स्नातकोत्तर, जिसके पास सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में काम करने का कम से कम 15 साल का अनुभव हो, इसके लिए आवेदन कर सकता है। यह नियुक्तियां राजस्व, वित्तीय सेवा, आर्थिक मामले, कृषि, किसान कल्याण, सड़क परिवहन और हाईवे, शिपिंग और पर्यावरण विभाग में होंगी। भारतीय प्रशासनिक सेवा में सुधार के प्रस्ताव लंबे अरसे से आ रहे हैं। अनेक विशेषज्ञों ने इसमें परिवर्तन के अलग-अलग रास्ते सुझाए। नौकरशाही में पाश्र्व प्रवेश का प्रस्ताव पहली बार 2005 में पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में आया था। कुछ समय पहले इन्फोसिस के संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने कहा था कि आईएएस को समाप्त कर उसकी जगह इंडियन मैनेजमेंट सर्विस का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को रखा जाए। उनका कहना था कि भारतीय नौकरशाही का मानस और ढांचा आज के समय के अनुकूल नहीं रह गया है। कई लोगों का यह कहना भी रहा है कि सिविल सेवा की परीक्षा का ढांचा अंतत: किताबी कीड़ों की जमात ही खड़ी करता है, जिसका समाज के यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं होता। व्यावहारिक जीवन से कटे ये लोग अव्यावहारिक फैसले करते हैं और जनता को व्यवस्था से जोडऩे के बजाय उसे और दूर ही ले जाते हैं। इसलिए यह जरूरी समझा गया कि इस सेवा में ऐसे लोगों के लिए जगह बनाई जाए जिन्होंने यूपीएससी का इम्तेहान भले न पास किया हो, पर जिन्होंने किसी विशेष कार्यक्षेत्र में अपनी योग्यता और उपयोगिता साबित की हो। अपने अनुभव के आधार पर यह लीक से हटकर फैसले कर सकते हैं, जबकि आईएएस अधिकारी आमतौर पर कुछ भी नया करने से बचते हैं। हालांकि इसके अपने खतरे भी हैं। पहला तो यही कि गैर-आईएएस पृष्ठभूमि वाले इन अफसरों के ऊपर और नीचे आईएएस अधिकारियों का ही बोलबाला होगा, लिहाजा अपने वरिष्ठों से तालमेल बिठाना और अधीनस्थों से काम लेना इनके लिए खासा मुश्किल होगा। फिर यह पारंपरिक नौकरशाहों की तरह सरकारी खर्च के मामले में तटस्थता बरत पाएंगे या नहीं, यह भी नहीं कहा सकता। एक आशंका इनकी नियुक्ति में आरक्षण के प्रावधान का पालन न होने और सत्तारूढ़ दल के चहेतों की भरमार हो जाने की भी है। लेकिन विपरीत नतीजों के भय से लकीर पीटते रहने में कोई समझदारी नहीं है। केंद्र सरकार के इस प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए। निश्चित ही इस प्रयोग से सरकार को अनुभवी, दक्ष और विषय विशेषज्ञ लोग प्राप्त होंगे, जो कुछ नया विहान रच सकते हैं। जड़ हो चुकी नौकरशाही में सकारात्मक बदलाव समय की आवश्यकता भी है। नौकरशाही को अधिक व्यवहारिक और जवाबदेह बनाने की भी आवश्यकता है। 

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