रायपुर। नक्सल प्रभावित मध्य भारत में शांति के लिए रायपुर के तिल्दा में आयोजित तीन दिवसीय विकल्प संगम दो नतीजों पर समाप्त हुआ। पहला यह तक मध्यस्थ सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नक्सल नेताओं से बातचीत को आगे बढ़े, जिसमें तमाम शंकाएं भी सामने आईं। दूसरा विकल्प आदिवासी स्वशासन की स्थापना का दिया गया, जिसमें नगा और बोडो आंदोलनों के बाद शांति के फार्मूले को अपनाने की सलाह दी गई।

क्या है आदिवासी स्वशासन

बोडोलैंड की तर्ज पर नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी मूल रूप से आदिवासी क्षेत्र हैं। बोडोलैंड में शांति के लिए आदिवासी स्वशासन प्रणाली लागू की गई है। इसमें जल, जंगल, जमीन पर हक के लिए बोडो ऑटोनॉमस काउंसिल का गठन किया गया है। इस काउंसिल को स्थानीय मुद्दों और समस्याओं पर स्वनिर्णय का अधिकार मिला है। ऐसी ही व्यवस्था छत्तीसगढ़ के बस्तर और दंडकारण्य समेत नक्सल प्रभावित राज्यों में लागू करने की राय बुद्धिजीवियों ने दी है।

संसाधनों का प्रबंधन सही हो

नक्सलियों व सरकार के बीच कई नाजुक मौकों पर मध्यस्थ रहे प्रोफेसर डॉ. हरगोपाल, गोंडी में मोबाइल समाचार सर्विस चलाने वाले शुभ्रांशु चौधरी व सर्वआदिवासी समाज के सचिव बीएस रावटे कहते हैं कि संसाधनों का उचित बंटवारा और प्रबंधन होना चाहिए। आदिवासियों को यह अधिकार हो कि वे अपने जीवन के बारे में फैसले ले सकें। मोहल्ला और ग्राम सभाओं को ताकत दी जानी चाहिए।

सोचना होगा हिंसा करना है या समाज बदलना

वक्ताओं ने कहा कि माओवादी भी सोचें कि उनका उद्देश्य क्या है। वे हिंसा करना चाहते हैं या समाज बदलना चाहते हैं। समाज बदलना है तो उन्हें बातचीत की प्रक्रिया में आना होगा। भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर बात होनी चाहिए। सर्व आदिवासी समाज ने कहा कि यह बात भी हो कि जेलों में आम आदिवासी क्यों बंद हैं।

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