यह तीन कारकों का एक मिला-जुला मामला है।

— पहला कारक देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी है, जिसके वे फिलहाल अध्यक्ष हैं।

— दूसरा कारक उनका परिवार है जो सबसे लंबे समय तक इस देश की सत्ता के केंद्र में काबिज रहा है।

— तीसरा कारक राहुल गांधी खुद हैं- यानी वह पहचान जो अपने लिए उन्होंने खुद कमाई है।

और यहीं पहला सवाल फिर उठ खड़ा होता है- राहुल गांधी ने क्या पहचान कमाई है! शायद कहने की आवश्यकता नहीं, हम सब यह जानते हैं।

उन पर केंद्रित व्हाट्सएप चुटकुले कुछ अतिशियोक्ति हो सकते हैं, किन्तु सभा-रैलियों के दौरान रिकार्ड उनके वीडियो को क्या कहेंगे! राहुल गांधी की कमाई यही सब है। मंचों से इतर उनकी समझदारी की यह पहचान ट्विटर जैसे सोशल मीडिया मंचों पर भी जब-तब उजागर होती रहती है। ताजा मामला तमिलनाडु का है। यहां तुतुकुड़ी में वेदांता स्टील फैक्ट्री प्रकरण पर हुई हिंसा और इस भीषण हिंसा के जवाब में हुई पुलिस कार्रवाई एक अत्यंत संवेदनशील मामला था। किन्तु यहां भी राहुल गांधी मौके की नजाकत समझे बिना सोशल मीडिया पर अचानक कूद पड़े। राजनीतिक हित और दखलंदाजियों के इतिहास और भ्रष्टाचार के आरोपों की कीचड़ से बजबजाते इस मामले में चर्च गहरा धंसा था (देखें रिपोर्ट)। कुछ तात्कालिक मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया की बहुतेरी पोस्ट में भी इसका व्यापक उल्लेख है। तुतुकुड़ी मामले में पुलिस का कहना था कि भीड़ के हिंसक होने से पूर्व करीब 5000 लोग एक स्थानीय चर्च पर जुटे थे! स्टरलाईट और वेदांता का जिक्र छिड़ने पर लोग इस कंपनी के संदिग्ध लाभों से भरे इतिहास और कांग्रेस नेता पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के इस कंपनी के साथ संबंधों को याद कर रहे थे किन्तु आश्चर्य की बात है कि राहुल गांधी को इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नजर आए!

यह जानना दिलचस्प है कि संघ पर नाहक आरोप लगाने का एक मामला पहले ही राहुल गांधी पर महाराष्टÑ की अदालत में चल रहा है और जून में उनकी पेशी है। बहरहाल, राहुल यदि संजीदा नेता के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं तो उन्हें चर्च या चिदंबरम को बचाते हुए बोलने की जरूरत भला क्यों है! और यदि वे सांप्रदायिकता की राजनीति का अंत करना चाहते हैं तो आर्चबिशप अनिल काउटो के बेजा राजनैतिक बयान पर चुप्पी क्यों है? गुजरात और नागालैण्ड में चर्च भाजपा-विरोध और कांग्रेस के पक्ष में सांप्रदायिक गोलबंदी की घृणित कोशिशें करता है तो पूरी कांग्रेस और उसके राहुल जैसे कथित युवा नेता चर्च समर्थक संकीर्णतावादी लबादा क्यों ओढ़ लेते हैं? भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझते चंद राजनेता और समाज को उकसाने-बांटने में लगी संस्थाएं यदि राहुल और कांग्रेस की बैसाखियां बनी हुई है तो यह तय है कि इस देश के बारे में उनकी समझ और राजनैतिक कदमों में जान नहीं है। वैसे, यदि देश की एकता, भोले-भाले समाज की चिंता और विकास ही यदि प्राथमिकता है तो तुतुकुड़ी मामले में चर्च की उकसाऊ भूमिका की पड़ताल के अलावा कांग्रेस को जोसेफ पूर्ति, मार्शल बारला,एच.पी. किंडो, हरमन किंडो आदि की ज्यादा उजागर भूमिका पर अपना पक्ष लोगों के सामने रखना चाहिए।

प्रकृति पूजक जनजातीय समाज को कन्वर्जन के कांटों में घसीटते और देश के संविधान का माखौल उड़ाते ये वे लोग हैं जो पृथकता का पत्थर गाड़ते हुए झारखंड से छत्तीसगढ़ तक आठ अलग-अलग राज्यों में अलगाव का अलाव सुलगा रहे हैं। इन किरदारों पर बुजुर्ग पार्टी सहित तमाम सेकुलर कहलाने वाले दलों की राय जानना देश के लिए दिलचस्प हो सकता है।

देश की राजधानी में नई केंद्र सरकार के लिए दुआएं करते आर्चबिशप, तटीय औद्योगिक ताने-बाने को आग लगाने में मिशनरी भाव से लगे पृथकतावादी और शांत वनांचलों में संविधान के सीने पर पत्थर गाड़ते भारत विरोधियों के आगे कौन नतमस्तक है? राहुल के नेतृत्व में कम से कम कांग्रेस को इन मुद्दों पर मुंह जरूर खोलना चाहिए। आखिर यह देश की एकता को मजबूत करने वाले ऐसे मुद्दे हैं जो उसके नेतृत्व की साफदिली और मेधा, दोनों का सबूत दे सकते हैं। तुतुकुड़ी प्रकरण में आम लोगों की मौत का दुख हम सबको है, परन्तु इन आम लोगों को उकसाकर मौत के मुंह में धकेलने वाली ताकतों और मामले का रुख मोड़ने की कोशिश करने वाले चेहरों को उजागर करना भी मीडिया का दायित्व है।

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