देश  में होने वाले आम चुनाव हों या फिर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव, आजादी के बाद से लेकर अब तक देश में हुए  हर चुनाव में भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है, उसकी जड़ें गहरी होती गईं हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह आम जनमानस का लोकतंत्र के प्रति भरोसा है। देश का मतदाता सरकार के कामकाज को देखकर या फिर उम्मीदवार विशेष के कामकाज को देखते हुए मतदान का फैसला करता है, यह बात ठीक है कि कई बार इन फैसलों में जातिगत और धार्मिक समीकरण भी हावी हो जाते हैं लेकिन अगर फैसले सिर्फ जातिगत और धार्मिक आधार पर ही लिए जा रहे होते तो कभी बिहार में यादव बहुल इलाकों में लालू प्रसाद यादव या फिर उनके यादव उम्मीदवारों को हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। अगर चुनाव सिर्फ चेहरे से जीते जाते तो इंदिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता को हार का सामना नहीं करना पड़ता।  भारतीय राजनीति में कभी ठहराव देखने को नहीं मिलता, हर दिन कुछ न कुछ बदलाव होते रहे हैं। इन सभी के बीच बदलते परिवेश और चौबीस घंटे खबरों की दुनिया में मतदाता और भी अधिक परिपक्व हुआ है। चुनाव में किस दल या उम्मीदवार को वोट देना है? इस बात का फैसला वह किसी हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई धर्म के तथाकथित ठेकेदार के कहने पर नहीं बल्कि खुद अपने विवेक से करता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश का मतदाता जब अपने फैसले खुद करता है तो बीजेपी जैसे राजनीतिक दल को धर्म के तथाकथित ठेकेदार के दरवाजे पर दस्तक देने की जरुरत क्यों पड़ी? देश यह जानना चाहता है कि ‘राजनीतिक शुचिता’ की बात और ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ की बात करने वाली बीजेपी को आखिर बुखारी के दरवाजे पर क्यों पहुंची? इस मुलाकात के बाद बुखारी ने मीडिया से कहा कि बीजेपी नेता हमसे मिलने तो आते हैं लेकिन देश में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। पहले भी जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के दरवाजे पर कांग्रेस जैसे कई राजनीतिक दल दस्तक देने जाते थे और उस वक्त भी इस पर सवाल उठते थे और हम अपने राजनीतिक विश्लेषण में इसे ठीक नहीं मानते थे। राजनीतिक विश्लेषण यूं तो कोई रॉकेट साइंस नहीं है लेकिन फिर भी कई बार किसी राजनीतिक घटना को समझना बहुत मुश्किल होता है और यह राजनीतिक घटना चौंकाने वाली है कि आखिर बीजेपी को क्यों चढ़ा बुखारी का बुखार? आखिर किसी भी राजनीतिक दल को फिर चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर कोई और राजनीतिक दल, उसे सैयद अहमद बुखारी जैसे लोगों के दरवाजे पर जाने की जरुरत क्यों पड़ती है? कांग्रेस बनकर देश में कांग्रेस का विकल्प नहीं दिया जा सकता है। दलितों के घर जाकर भोजन करना भी कुछ ऐसा ही कदम है।  मनमोहन सिंह के कार्यकाल के वक्त राहुल गांधी भी कुछ दलितों के घर भोजन कर उनके प्रति अपने कथित अटूट प्रेम की रस्म अदायगी करते थे और अब बीजेपी ने भी दलितों के घर जाकर भोजन करने और रात रुकने का कार्यक्रम तय किया। इस तरह के दिखावटी रवैये से क्या समाज में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है? खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बीजेपी को इस तरह की ड्रामेबाजी से बचने की सलाह दी है। उनका कहना है कि इस तरह के ड्रामे से बेहतर होगा कि समाज के कमजोर तबके के लोगों से निरंतर मुलाकात की जाए। 
यह बात ठीक है कि भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर देशभर में बड़े स्तर पर व्यक्तिगत संपर्क अभियान ‘संपर्क फॉर समर्थन’ की शुरूआत की है। बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी के मुताबिक इस अभियान में तकरीबन 4000 प्रमुख कार्यकर्ताओं में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक एवं संगठन के कई पदाधिकारी शामिल हैं। संपर्क और संवाद किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद जरुरी है और ऐसा करके ही कोई राजनीतिक दल जनता का भरोसा हासिल कर सकता है। मोदी सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने के इस क्रम में  बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने देश के तमाम प्रतिष्ठित और आम लोगों से व्यक्तिगत मुलाकात का सिलसिला शुरु कर दिया है लेकिन इस बात का ध्यान रखना भी जरुरी है कि यह संपर्क और संवाद किसी भी मजहब और जाति के तथाकथित ठेकेदारों से नहीं हो। यह संवाद वोट के उन तथाकथित ठेकेदारों से भी न हो जो समाज के किसी एक खास वर्ग या तबके को बरगला कर अपना राजनीतिक या गैर राजनीतिक उल्लू सीधा करने में जुटे रहते हैं। 
यह बात ठीक है कि गरीब की रसोई में गैस पहुंचाने की बात हो या फिर गांवों को सडक़ और बिजली से जोडऩे की बात या फिर गरीबों को आवास देने की बात, ऐसी कई काम हैं जिसे लेकर मोदी सरकार के प्रति गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का भरोसा बना है लेकिन इन सारी अच्छी-अच्छी बातों के अलावा अब भी गांव में आम आदमी कई मुश्किलों से जूझ रहा है। सरकारी विज्ञापनों में जितनी आसानी से बैंक खातों को आधार से जोडऩे की बात कही जाती है, वह दूर दराज गांव में बैठे व्यक्ति के लिए उतनी आसान नहीं होती और उसे बैंक के अधिकारियों का भी सहयोग नहीं मिलता। इसके लिए जरुरी है कि सरकार हर गांव में शिविर लगाकर आम लोगों के खाते को आधार के साथ जोड़े। ‘संपर्क फॉर समर्थन’ का मकसद तब पूरा होगा जब बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का यह अभियान सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करने तक सीमित न हो बल्कि जमीनी स्तर पर आम आदमी की मुश्किलों को समझने और उसे तत्काल दूर करने के लिए कदम उठाया जाना भी इस अभियान का हिस्सा होना चाहिए। 
‘संपर्क फॉर समर्थन’ का यह काम देश के जाने माने लोगों तक सिमटकर नहीं रह जाए, यह अभियान दलितों के घर जाकर भोजन करने जैसी रस्म अदायगी बनकर ना रह जाए। बीजेपी को यह समझना होगा कि किसी भी मजहब के ठेकेदार से मिलकर देश की जमीनी हकीकत को नहीं समझा जा सकता और ना ही आम जनता का भरोसा हासिल किया जा सकता है। समाज के कमजोर वर्ग के हालात को समझने के लिए ना ही उसके घर जाकर भोजन करना या रात भर रुकना जरुरी है और ना ही यह जानने की जरुरत है कि कमजोर तबके के इस परिवार या व्यक्ति का संबंध किस जाति या मजहब से है? देश के 125 करोड़ से ज्यादा भारतीय नागरिक फिर चाहे वह किसी भी मजहब या जाति से ताल्लुक रखते हों, अगर उनके जीवन स्तर में सुधार होगा तो वह बिना ‘संपर्क फॉर समर्थन’ के भी आपको समर्थन देगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

डा.ॅ शिव कुमार राय

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