उस दिन भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ देव भ्रमण के लिए निकले। उन्होंने देखा कि पाटिलपुत्र में एक विष्णु मंदिर के चबूतरे पर बैठा कबूतर बुरी तरह कांप रहा था। गरुड़ को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पक्षी से इसका कारण पूछ लिया।

कबूतर बोला- अभी यमराज आये थे। मुझे देखकर हंसे और बोले कि कल प्रातःकाल मुझे अभागे की मौत आ जाएगी। सो मैं प्राण संकट की बात सोचकर दुखी हूं।

गरुड़ को दया आई और साथ ही यमराज को चुनौती देने की बात भी उन्हें सूझी। गरुड़ ने कबूतर को पंजों में दवाया और सुदूर यात्रा पर निकल पड़े तथा मलयगंध पर्वत की एक सुरक्षित गुफा में जाकर उसे रख दिया।

दूसरी उड़ान में गरुड़ यमलोक पहुंचे और यमराज को बताया कि वे किस प्रकार कबूतर को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा चुके हैं।

यम ने विष्णु वाहन का आदर−सत्कार किया और मृत्यु संबंधी लेखा-जोखा मंगाया। पूर्व व्यवस्था लिखी हुई थी कि पाटिलपुत्र के विष्णु मंदिर में रहने वाला कबूतर अमुक तिथि को मलयगंध पर्वत की गुफा में सर्प द्वारा भक्षण किया जायगा। वह मृत्यु मुहूर्त कुछ घड़ी पूर्व ही पूरा हुआ है।

गरुड़ चकित रह गए और लौट कर पर्वत पर पहुंचे तो देखा कि सांप कबूतर को पूरा निगल चुका है। गरुड़ ने सोचा कि मैं तो इसकी रक्षा करने के उद्देश्य से यहां लाया था, लेकिन अब मेरे ही कारण इसकी जान चली गई। यह सोचते हुए उन्हें दुख भी हुआ।

यह बात विष्णु भगवान तक पहुंची। उन्हें गरुड़ की उदासी और मनोव्यथा को जाना और समझाते हुए बोले—गरुड़, जन्म की तरह मरण भी निश्चित है। नियत समय पर मरने से कोई बचता नहीं। इस बात को यदि प्राणी समझ सके होते तो मृत्यु से डरकर साहसिक सत्कर्म करने से न चूकते और शोक−सन्ताप में जिस तरह सिर घुनते हैं, उसकी आवश्यकता न पड़ती।

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