अब देशभर के कॉलेजों में नए सत्र के लिए विद्यार्थियों के दाखिले की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। प्रमुख विश्वविद्यालयों के नामवर कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए जबरदस्त मारामारी हो रही है। 90 फीसद से अधिक अंक लेने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को भी यकीन नहीं हो रहा है कि उन्हें उनकी पसंद के कॉलेज और विषय में दाखिला मिल ही जाएगा। यह तो तस्वीर का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष तो और भी खराब और भयावह है। उसे जानकार छात्र-छात्राओं के अंधकारमय भविष्य की चिंता होने लगती है। दरअसल, देश के चोटी के विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के पद बड़ी संख्या में रिक्त पड़े हुए हैं। यहां पर चोटी के वियालयों से मतलब केन्द्रीय विश्वविद्यालयों से है। अभी हाल ही में एक आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार देश के 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 33 फीसद अध्यापकों के पद खाली हैं। सबसे भयावह स्थिति इलाहाबाद और दिल्ली विश्वविद्यालय की है। यह स्थिति जनवरी महीने तक की है। कभी देश का सबसे बेहतरीन माने जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तो लगभग 64 फीसद अध्यापकों के पद भरे जाने हैं। अब दिल्ली विश्वविद्यालय का भी हाल सुन लीजिए। इसमें अध्यापकों के करीब 47 फीसद स्थानों को भरा जाना है। अब आप जरा सोच लीजिए कि हमारे विश्वविद्यालय में किस तरह की अराजकता और अव्यवस्था फैली हुई है। जब विश्वविद्यालयों में अध्यापक ही नहीं होंगे, तो फिर उन बच्चों को पढ़ाएगा कौन? दाखिले के लिए कड़ी धूप में धक्के खाने का मतलब क्या रह जायेगा। तदर्थ शिक्षक चलाते विश्वविद्यालय अपने अध्यापकों की कमी को पूरा करने के लिए इन विश्वविद्यालयों ने एक आसान और भ्रष्ट रास्ता चुना हुआ है। ये शिक्षकों की तदर्थ आधार पर नियुक्तियां कर लेते हैं। उन्हीं से अपने कक्षाएं चलवाते हैं। योग्यता से भी समझौता और कम पैसे देकर और कभी भी निकल दिए जाने के डर से शोषण भी। फिलहाल देशभर के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में हजारों तदर्थ शिक्षक काम कर रहे हैं। इन तदर्थ अध्यापकों को वो सब कुछ करना होता है,जो नियमित शिक्षक करते हैं, पर इन्हें पगार के नाम पर मिलती है दो कौड़ी। अगर बात फिर से इलाहाबाद की ही करें, तो वहां पर जूनियर रिसर्च स्कॉलर भी कक्षाएं लेते हैं। उन्हें हर माह पढ़ाने के बदले में मात्र 30 हजार रुपये मानदेय मिलता है। वे पढ़ाते रहेंगें, तो रिसर्च क्या करेंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही लगभग 3,500 तदर्थ शिक्षक हैं। ये सब ठेके पर साल दर साल काम करते चले आ रहे हैं। इन्हें यह उम्मीद लगी रहती है कि कभी इनकी जिंदगी में भी बहार आएगी। यानी इन्हें स्थायी नौकरी मिल जाएगी। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी अध्यापकों की भर्तियां बीते लगभग एक दशक से बंद हैं। कभी-कभार का मामला अलग है। तदर्थ शिक्षकों को चार माह के बाद कुछ दिन के ब्रेक के बाद ही फिर से रख लिया जाता है। अंधकारमय भविष्य से जूझने के कारण अनेक अध्यापक अवसाद और तनाव में रहने लगते हैं। इस कारण ये कई रोगों की चपेट में भी आ रहे हैं। एक तरफ इनकी पगार बेहद कम है, दूसरी तरफ इन्हें किसी तरह के लाभ भी नहीं मिल रहे। मुझे तो यहां तक जानकारी मिली है कि इन्हें मातृत्व अवकाश तक भी नहीं मिलता। प्रॉविडेंट फंड और कर्मचारी बीमा की तो बात ही छोड़ दें। यानी जो व्यक्ति स्थायी अध्यापक की सारी योग्ताओं को पूरा करता है, उसे आप उसके स्थायी सहकर्मी के समक्ष कुछ मानते ही नहीं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में स्थायी अध्यापक डेढ़-दो लाख रुपये मासिक तक की पगार उठा रहे हैं और क्लास लेते हैं तदर्थ शिक्षकों से भी कम। उन्हें तमाम भत्ते और अन्य सुविधाएं भी मिल रही हैं। अब रिटायर हो रहे अध्यापकों को भी लगभग एक लाख रुपये तक की पेंशन मिलती है। पर तदर्थ अध्यापकों की किसी रोग का शिकार होने या गर्भवती होने पर नौकरी तक जाना तय है। दरअसल, हो यह रहा है कि सब अपनी खाल बचाने पर लगे हैं। इन विश्वविद्यालयों ने तदर्थ यानी 'एड हॉकÓ शिक्षकों की बहाली कर रखी है, ताकि ये लगे कि कक्षाएं सही ढंग से चल रही हैं। हालांकि वास्तव में यह बात नहीं है। किस्मत के मारे ये बेचारे किस्मत के मारे शिक्षक शोषण, मानसिक यंत्रणा और अधिक काम के शिकार हो रहे हैं। इन विषम परिस्थितियों में आप किसी अध्यापक से अपना सर्वश्रेष्ठ देने की आशा कैसे कर सकते हैं। जिस शख्स के सिर पर हर वक्त नौकरी जाने का भय लगा रहेगा, तो उससे आप उम्मीद क्या करेंगे। इन्हें बिना कोई कारण बताए नौकरी से बाहर किया जा सकता है। इनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों से भी बदतर है। जिन दिनों कॉलेजों में गर्मियों का अवकाश रहता है, तब इनके पास कोई काम ही नहीं होता। इन्हें जुलाई के माह में फिर से किसी कॉलेज में जगह मिल जाती है। यानी इनके जीवन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अवरोध ही अवरोध रहते हैं। इनकी नौकरी कॉलेज के प्रधानाचार्य या फिर विभागाध्यक्ष के रहमों-करम पर ही चलती है। ये बेचारे अपनी न्यूनतम और जायज मांगों के लिए भी आवाज तक नहीं उठा पाते। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि इन्हें कॉलेजों में अपने वरिष्ठ अध्यापकों की क्लास लेने के लिए भी मजबूर किया जाता है। इन्हें साल दर साल पढ़ाने के बाद भी तीस हजार रुपये ही वेतन मिलता है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता किआप पीएचडी हैं या एम फिल। आपको तो जूझना ही है। तो किया क्या जाए किसी भी विश्वविद्यालयके लिए यह जरूरी है कि वो अपने यहां तदर्थ शिक्षक कम से कम रखे और उन्हें भी समय-समय पर नियमित करता रहे। उन्हें स्थायी अध्यापकों के बराबर ही वेतन और अन्य लाभ भी मिलें। हां, इसके साथ ही विश्वविद्यालयों को यह भी देखते रहना होगा कि सभी शिक्षक अपनी कक्षाएं लें। उन अध्यापकों पर कठोर एक्शन हो, जिनकी कक्षाओं में पढऩे वाले विद्यार्थियों का प्रदर्शन बार-बार खराब आ रहे हों। स्थायी नौकरी मिलने का मतलब शिक्षक यह न समझें लें कि अब वे मौज करते रहेंगे। दुर्भाग्यवश हमारे देश के विश्वविद्यालयों के अनेक अध्यापकों में यह मानसिकता काफी हद तक जगह बना चुकी है कि स्थायी बनने के बाद अब काम करने की जरुरत ही नहीं है। स्थायी नौकरी का पत्र मिलने के बाद ये आंदोलन और क्रांति करने के मूड में रहने लगते हैं। राजनीति ज्यादा करते हैं। देखा जाए तो तब इन्हें अपने दायित्व का और बेहतर तरीके से निर्वाह करना चाहिए। पर यह आमतौर नहीं होता। आपको गिनती के ही ऐसे शिक्षक मिलेंगे जो स्थायी नौकरी के बाद भी गंभीर शोध कर रहे हों। इस मानसिकता पर कठोर प्रहार करने की आवश्यकता है। पर सबसे पहले तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को तुरंत ये देखना होगा कि सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में लंबे समय से पड़े रिक्त पद भरे जाएं। यूजीसी भी घोर काहिली का शिकार है। उसके ऊपर दायित्व है कि वह देश के तमाम सरकारी विश्वविद्यालयों के कामकाज से लेकर उनके पाठ्यक्रम वगैरह पर भी नजर रखे। उन फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ एक्शन ले, जो बच्चों के करियर के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। क्या यूजीसी इस लिहाज से अपने काम को अंजाम दे रही है? कतई नहीं। जिस दिन से यूजीसी में तरीके से काम होने लगेगा, उसी दिन से देश के विश्वविद्यालयों की हालत में भी सुधार होने लगेगा।
(लेखक राज्यसभा सदस्य और बहुभाषी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष हैं)

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