क्या  किसान राजनीतिक साजिश के शिकार बन रहे हैं? क्या किसान राजनीतिक हथकंडे बन रहे है? अगर यह सही है तो फिर किसानों का भला होने वाला नहीं है, किसान अपनी विश्वसनीयता खोयेंगे, जब विश्वसनीयता खोयेंगे तब जाहिर सी बात है कि उन्हें जनसमर्थन से भी हाथ धोना पड सकता है, किसानों की असली समस्या बढ़ सकती है, किसान जिस राजनीतिक साजिश के शिकार हो रहे हैं, किसान जिस राजनीतिक हथकंडे के शिकार हो रहे हैं, उसकी जड़ केन्द्रीय सरकार के विरोधियों के पास है। यह सच्चाई है कि किसान आज की व्यवस्था में सबसे ज्यादा पीडित हैं, सबसे ज्यादा दमित हैं, सबसे ज्यादा पिछडे हुए हैं और इनकी स्थिति तो मजदूरों से भी बदत्तर हो गयी है। पूरे देश के अंदर में किसान कर्ज में डूबे हुए हैं और किसान कर्ज अदायगी न होने से अवसाद ग्रसित होकर आत्महत्याए कर रहे हैं। किसानों की ऐसी स्थिति कोई एक-दो दिन में तैयार नहीं हुई है, इसके लिए प्राय सभी भूत-वर्तमान की सरकारें जिम्मेदार रही हैं। सबसे बडी बात यह है कि किसान की समस्याएं सिर्फ केन्द्रीय सरकार से जी जुडी हुई नहीं है बल्कि किसान की समस्याएं राज्य सरकारो से भी जुडी हुई हैं, समय पर बिजली देने का कार्य राज्य सरकारों का है, सस्ते कर्ज की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के उपर होती है, सस्ती बिजली उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के उपर होती है पर राज्य सरकारें भी केन्द्रीय सरकार की मानसिकता के सहचर होकर किसानो को राहत देने से इनकार कर देती हैं। मान लिया जाये कि नरेन्द्र मोदी सरकार किसान विरोधी हैं, किसानों को राहत देने के लिए मोदी सरकार ने जमीनी कार्यवाही नहीं की है पर पश्चिम बगाल और पंजाब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यो विपक्ष की सरकारें है फिर विपक्ष किसानो को राहत देने के लिए आगे आया क्यो नहीं?  किसान विश्वसनीयता कैसे खो रहे हैं, किसानों के सामने विश्वसनीयता का संकट कैसे खडा हो गया है?  अभी-अभी किसानों का जो आंदोलन खडा हुआ है वह किसी तरह से गरीब, फटेहाल और जर्जर किसानो का आंदोलन नहीं लगता है, किसानों का यह आंदोलन अमीर किसानो का लगता है, किसानों का यह आंदोलन राजनीतिक दल द्वारा तैयार और संचालित लगता है। किसानों का यह आंदोलन सिर्फ और सिर्फ केन्द्रीय सरकार की छवि को खराब करना है, केन्द्रीय सरकार को खलनायक घोषित कराने जैसा है। इसलिए ऐसा माना जा रहा है और इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा रहा है कि किसान हिंसा पर उतारू हो गये हैं, किसान जोर जबरदस्ती पर उतर आ रहे हैं। जो गरीब किसान अपने उत्पादन को लेकर बेचने के लिए शहर या बाजार मे जा रहे हैं उन्हें मारा-पीटा जा रहा है, उन्हें रोका जा रहा है, उनके उत्पादन को लूट कर सडकों पर फेक दिया जा रहा है। किसानो के उत्पादन लूट कर सडकों पर फेकने की कई तस्वीर सामने आयी है और सबसे बडी बात यह है कि ये तस्वीरे कोई झूठी नहीं थी और न ही ये तस्वीरें फोटोशॉप में जाकर डिजाइन की गयी थी। अगर कोई गरीब किसान अपने उत्पादन को शहर या बाजार जाकर बेचना चाहता है तो तथाकथित किसानों  के संघों को रोकने का अधिकार है क्या? खुद बडे किसान जो कर रहे हैं उससे किसी भी प्रकार की सहानुभूति उत्पन्न होने वाली नहीं है, किसी भी प्रकार की हमदर्दी हासिल होने वाली नहीं है। बडे किसान सब्जियो को सरेआम सडकों पर फेक रहे हैं, बडे किसान सरेआम दूध को सडको पर फेक रहे हैं, यह सब अन्न का और गरीब का अपमान है। अगर किसान अपनी सब्जियों को और अपने दूध को गरीब लोगोंं के बीच बांटते तो निश्चित तौर पर किसान संगठन ज्यादा सहानुभूति पाते और ज्यादा हमदर्दी हासिल करते। पर बडे किसानों को अपनी हंता करवाई की चिंता है नहीं।
जब किसान राजनीति हथकंडे के सहचर बन जायेगे तब राजनीति भी उन्हें या तो बेनकाब करेगी या फिर उनकी समस्याएं और भी बढायेंगी। एक प्रश्न जो महत्वपूर्ण तौर सामने आ रहा है वह किसी भी स्थिति में किसानों के लिए अच्छा नहीं है और किसानों की एकता भंग करने जैसा है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि वह प्रश्न कौन है और उस प्रश्न से किसानो की एकता किस प्रकार से भंग होती है? वह प्रश्न बडे किसान और छोटे किसान का है। यह विभाजन अगर हो गया, अगर सरकार ऐसी कोई विभाजनकारी दृष्टि बना लेती है तो फिर बडे किसानों की समस्याएं कुछ ज्यादा ही संकटग्रस्त होंगी। बडे किसानेां के खिलाफ देश का आर्थिक जगत पहले से ही गर्म रहा है, असहिष्णु रहा है। आर्थिक जगत की हमेशा मांग रही है कि बडे किसानो पर इनकम टैक्स लगाओ और बडे किसानो को मिल रही सुविधाओ मे कटौती करे। पर कोई सरकार आर्थिक जगत की यह मांग सुनी नही है। यह सही है कि देश के अंदर में किसानों की आत्महत्याओं का ग्राफ देखेंगे और उसका विश्लेषण करेगे तो पायेंगे कि अधिकतर वही किसान आत्महत्याएं की है जो बडे किसान की श्रेणी में आते थे और जिनके उपर बैको का कर्ज था। जबकि छोटे किसानों को तो बैंक कर्ज ही नहीं देते हैं, छोटे किसान तो खुद की मजदूरी पर खेती करते हैं। इसलिए किसानों के बीच यह विभाजन कोई नहीं चाहता है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान ही अधिक किसान आंदोलन के चपेट में क्यों है? मध्य प्रदेश और राजस्थान में हाल के दिनों मे विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। खासकर कांग्रेस की यह उम्मीद है कि अगर किसानों को विरोधी बना दिया जाये तो फिर मध्य प्रदेश और राजस्थान मे कांग्रेस की सरकार बन सकती है। अप्रत्यक्ष तौर कांग्रेस की गंभीर सकियता है। सिर्फ इतनी सी ही बात नहीं बल्कि कई जगहो पर तो किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेसी करते देखे गये हैं। क्या कांग्रेस सही में किसान हितैषी हैं। मोदी की सरकार तो मात्र चार साल से है। देश के उपर तो अधिकतर समय कांग्रेस की ही सरकार रही है। कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में कौन सा किसानों का विकास किया था। मोदी के पहले कांग्रेस की दस साल सरकार चली थी। उस दस साल की कांग्रेसी सरकार में भी किसानों की समस्याएं आज जैसी ही थीं, उस दस साल के कांग्रेसी सरकार में भी किसान आत्महत्या कर रहे थे। अभी तक ऐसा कोई तुलनात्मक अध्ययण सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि उस कांग्रेस की दस साल की सरकार वर्तमान मोदी की सरकार से बहुत अच्छी थी और किसानों के लिए बहुत अच्छे कार्य की थी। सिर्फ  कर्ज माफी से ही किसानो की समस्याएं नहीं सुलझेगी। कई बार किसानों के कर्ज माफ हुए हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार में आते के साथ ही दो लाख तक के कर्ज माफ किये हैं, महाराष्ट्र में भी किसानों के कर्ज माफ हुए हैं। किसानो के कर्ज माफी पर मध्य प्रदेश की सरकार ने भी बहुत कार्य किये है। मोदी की सरकार की भी कई योजनाएं हैं। धान खरीद के मूल्य बढाये हैं, गेहूं खरीद के मूल्य बढ़ाये है, गन्ना खरीद के मूल्य बढाये हैं।  यह अलग बात है कि मोदी के लाभकारी योजनाएं किसानों तक नहीं पहुंची हैं, यह नौकरशाही और भ्रष्टचार की समस्याएं हैं। फिर भी किसान हमारे अन्न दाता है, किसान हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ हैं, किसान हमारी खुशहाली के केन्द्रविन्दु हैं। अगर किसान हमारी अर्थव्यवस्था के रीढ नहीं होते तो फिर हमारी अर्थव्यवस्था कभी का विध्वंस हो सकती थी। इसलिए किसानो की समस्याओ की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। किसानों को उनके उपज के लागत मूल्य तो मिलनी ही चाहिए। किसानों को राजनीतिक मोहरा बनना भी किसी स्थिति मे हितकारी नहीं है। ऐसा होने पर उनका नुकसान ही हो सकता है। किसानों अपनी लडाई स्वतंत्र होकर क्यो नहीं लड सकते हैं?

विष्णु गुप्त

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