महाभारत में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण ने हर मौके पर पांडवों का साथ दिया और कृष्ण के कारण ही पांच पांडव सौ कौरवों की सेना का मुकाबला कर सके। सवाल उठता है कि जब पग-पग पर श्रीकृष्ण पांडवों के साथ रहे, तो वे उस समय कहां थे जब युधिष्ठिर और उनके भाई, दुर्योधन के जाल में फंसकर जुआ खेल रहे थे और एक के बाद एक हार का सामना करते जा रहे थे? तब श्रीकृष्ण क्यों नहीं आए उन्हें सद्बुद्धि देने? यहां पढ़िए इसी का जवाब -

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने यही सवाल श्रीकृष्ण से किया था। तब श्रीकृष्ण ने बताया था कि वे उस समय शाल्व से युद्ध कर रहे थे। दरअसल, कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था। इसका बदला लेने के लिए शिशुपाल के दोस्त शाल्व ने द्वारिका पर हमला कर दिया था। शाल्व के पास सौभ नामक एक विमान था, जो उसके इशारों पर चलता था। शाल्व ने भगवान शिव की घोर तपस्या से यह विमान हासिल किया था। यह विमान चालक की इच्छानुसार किसी भी स्थान पर जाने में सक्षम था। यह विमान सामान्य लोगों को नजर भी नहीं आता था।

 

युधिष्ठिर के प्रश्न का जवाब देते हुए श्रीकृष्ण ने बताया, 'उस समय तो मैं पांडवों के साथ इंद्रप्रस्थ में ही था। शिशुपाल की मौत से बौखलाए शाल्व ने यादवों का कत्लेआम शुरू कर दिया। तब द्वारिका में मौजूद उद्धव, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और सात्यकि आदि ने बहुत समय तक शाल्व से युद्ध किया। '

शाल्व ने विमान पर अनेक सैनिकों को सवार कर द्वारिका पर चढ़ाई कर दी। तब कोई योद्धा उसका सामना नहीं कर सका। उधर इंद्रप्रस्थ में यज्ञ की समाप्ति पर अपशकुनों का अनुभव करते हुए कृष्ण और बलराम द्वारिका पहुंचे। बलराम को नगर की रक्षा का भार सौंपकर कृष्ण युद्ध क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने शाल्व के सैनिकों को क्षत-विक्षत कर दिया। शाल्व घायल होकर अंतर्ध्यान हो गया, लेकिन उन्होंने सुदर्शन चक्र से शाल्व को मार डाला। विमान चूर-चूर होकर समुद्र में गिर गया।

यह वही समय था, जब पांडव जुआ खेल रहे थे और एक-एक कर सारी सम्पत्ति हारते जा रहे थे। श्रीकृष्ण युद्ध समाप्त कर लौटे और ज्यों ही सुना कि हस्तिनापुर में दुर्योधन की उद्दण्डता के कारण जूआ खेला जा रहा है और पांडव उसमें सब कुछ हारकर गए हैं, तब तुरंत लौटे। जब तक वे वहां पहुंचते, द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था। श्रीकृष्ण ने तुरंत सहायता दी।

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