यह कैसा मुल्क है कि सेना के जवान जब आतंकवादियों के ठिकानों पर कार्रवाई कर रहे होते हैं तो कश्मीर घाटी के ही कुछ नौजवान सुरक्षा बलों पर पत्थबाज़ी कर सेना के ऑपरेशन को विफल बनाने की कोशिश करते हैं? यह कैसा राष्ट्र है, जहां आए दिन घाटी में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंके जाते हैं और जब सेना उन पर कार्रवाई करती है तो कुछ लोग पत्थरबाज़ों की हिमायत में खड़े हो जाते हैं? घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़ा आतंकवादी बुरहान वानी मारा जाता है तो उसको दफनाते वक्त घाटी में हज़ारों लोग पाकिस्तान के झंडों के साथ आज़ादी के नारे लगा रहे थे। बुरहान वानी जैसे आतंकवादी पर सुरक्षा बलों ने दस लाख रुपये का इनाम रखा था। दरअसल, घाटी में आतंकवादी या फिर आतंकवादियों के समर्थन में खड़े होने वाले या पाकिस्तान के झंडे के साथ आज़ादी के नारे लगाने वाले लोग चिंता का विषय नहीं है क्योंकि इनसे निपटने का काम सेना और सरकार का है। अब यह सेना और सरकार को तय करना है कि आतंकवादियों के साथ कितनी सख्ती बरतनी है या फिर भटके हुए नौजवानों को मुख्यधारा से कैसे जोडऩा है?
घाटी में अलगाववाद के नाम पर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने भी यहां की फिज़ा को बिगाडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी। अरबी भाषा में हुर्रियत का अर्थ आज़ादी है और कश्मीर घाटी में ऑल पार्टी हुर्रियत  कॉन्फ्रेंस ऐसे ही कई संगठनों का गठजोड़ है जो घाटी में आज़ादी का झंडा उठाकर अपनी दुकान चला रहे हैं, वैसे इन लोगों की कारगुजारियों को दुकान कहना, इनकी गतिविधियों को थोड़ा कम करके आंकना होगा, अलगाववाद के नाम पर यह लोग दुकान नहीं बल्कि पूरी इंडस्ट्री चला रहे हैं। इन लोगों के बीबी और बच्चे विदेशों में मौज कर रहे हैं। यह लोग भले ही ऐशो आराम की जिन्दगी जी रहे हों लेकिन घाटी में आम लोगों की जिन्दगी को नरक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इन लोगों के बहकावे में आकर अब अलगाववादी सैलानियों को भी निशाना बना रहे हैं जबकि कश्मीर घाटी में लोगों की रोजी रोटी का एक बड़ा जरिया सैलानियों से होने वाली आमदनी है। पत्थरबाजी से जुड़े लोगों का घाटी के अमन चैन या स्थानीय लोगों के रोजगार से कोई लेना देना नहीं और यही वजह है कि अब सैलानियों को भी पत्थरबाजी का सामना करना पड़ रहा है।  
हालांकि मोदी सरकार के आने के बाद विदेशों से होने वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की फंडिंग पर काफी हद तक रोक लगी है और इनके कुछ नेताओं को पाकिस्तान से होने वाली फंडिंग के मामले में भारतीय खुफिया एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार भी किया गया था। इस्लाम और अलगाववाद के नाम पर घाटी के लोगों को बहकाकर अपनी रोटियां सेंक रहे इन लोगों पर शिकंजा कसना शुरु हो गया है और जल्द ही इसके अच्छे परिणाम भी सामने आएंगे। देश में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार से लेकर पुरानी कई सरकारों के वक्त इन अलगाववादियों को पूरे सम्मान के साथ बातचीत के लिए न्यौता दिया जाता था और यह लोग कभी पाकिस्तान में जाकर वहां के नेताओं से मुलाकात करते तो कभी देश के बड़े नेताओं के सामने आकर अलगाववाद का राग अलापते लेकिन बदलते वक्त में हुर्रियत हाशिए पर आती दिखाई दे रही है और इसके मु_ी भर नेता भी अब चिंता का विषय नहीं है।  मौजूदा दौर में चिंता का विषय देश की सीमाओं की चौकसी का नहीं, चिंता का विषय देश की आंतरिक सुरक्षा भी नहीं लेकिन आज देश की सुरक्षा की सबसे बड़ी चिंता आतंकवादियों या फिर उनके समर्थकों की हिमायत करने वाले नेता है। चिंता का विषय देश के वो तमाम तथाकथित मानवाधिकारवादी हैं जो आतंकवादियों के मानवाधिकार के नाम पर खुद को महान साबित करने में जुटे हैं। चिंता का विषय जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला जैसे लोग हैं जो पत्थरबाजी की घटना को न्यूटन का नियम बताते हैं और उनका कहना है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। इतना ही नहीं फारुख पाक अधिकृत कश्मीर को भी पाकिस्तान का हिस्सा बता चुके हैं। चिंता का विषय फारुक अबदुल्ला के सुपुत्र और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी है जो आए दिन पत्थरबाजों की तरफदारी करते नजर आते हैं। सेना के लिए उमर जैसे नेता अपने ट्वीट में लिखते हैं कि पहले वो लोगों को जीप के सामने बांधते थे और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए गांव के चारों ओर घुमाते थे, अब वे अपनी जीप सीधे प्रदर्शनकारियों के ऊपर चढ़ा देते हैं। 
चिंता का विषय सिर्फ फारुक और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला भर नहीं, ऐसे कई नेता हैं जो तुष्टिकरण या वोट बैंक की खातिर अलगाववादियों और आतंकवादियों की हिमायत करते नजर आते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल खड़े कर चुके हैं, इतना ही नहीं दुनिया के खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद दिग्विजय सिंह ने उसको समुद्र में दफनाए जाने को लेकर भी सवाल खड़े किए थे। इतना ही नहीं दिग्विजय सिंह ने उस वक्त वाराणसी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ओसामा बिन लादेन को 'ओसामा जीÓ कहकर भी संबोधित किया था। चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि देश की सुरक्षा को दांव पर लगाकर कुछ नेता तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे हैं लेकिन इसके साथ ही यह लोग देश की मुस्लिम आबादी को अलगाववादियों के साथ जोड़कर देखने की भूल भी कर रहे हैं। 
क्या वातानुकूलित कमरों में बैठकर आतंकवादियों की हिमायत करने वाले तथाकथित मानवाधिकारवादी घाटी में सेना की तकलीफों से वाकिफ हैं? आए दिन आतंकवादियों के हमले में सेना के जवान शहीद होते हैं, क्या कभी किसी मानवाधिकारवादी ने इन जवानों के परिवार वालों को लेकर कुछ चिंता दिखाई है? पत्थरबाजों के साथ सहानुभूति रखने वाले उमर अब्दुल्ला या फारुक अब्दुल्ला ने क्या कभी आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए सेना के जवान को लेकर सहानुभूति के दो शब्द बोले हैं? क्या पत्थरबाजों की हिमायत करने वाले ऐसे लोगों की अक्ल पर पत्थर नहीं पड़े हैं? आखिर कब तक हम सेना के जवानों की शहादत पर केवल आंसू बहाते रहेंगे? कश्मीर में भटके हुए नौजवानों को मुख्य धारा से जोडऩे की हर पहल का स्वागत होना चाहिए, घाटी में हर नौजवान की रोजी रोटी के इंतजाम पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए, घाटी में अमन चैन की बहाली के लिए हर संभव कदम उठाए जाने चाहिए ताकि देश और दुनिया का हर व्यक्ति कश्मीर की इन वादियों में बेखौफ होकर घूम फिर सके और स्थानीय लोगों का काम धंधा फल फूल सके। आतंकवाद राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा मसला है और ऐसे में केंद्र सरकार की भूमिका राज्य सरकार से कहीं ज्यादा बड़ी है। आज सबसे बड़ी जरुरत इस बात की है कि केंद्र सरकार बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों की हिमायत करने वाले हर शख्स पर कड़ी कार्रवाई करे।  

डा.ॅ शिव कुमार राय

विदेश