पश्चिम बंगाल में राजनीति को जो हिंसक स्वरूप दिखाई दे रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। बंगाल में राजनीति का यह हिंसक चेहरा हाल ही में सम्पन्न हुए पंचायत चुनाव के दौरान दिखाई देने प्रारंभ हुआ था। अब वह वीभत्स रूप में सबके सामने प्रकट हो गया है। केंद्र शासन को अविलम्ब पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर कड़े कदम उठाने चाहिए। अधिक नहीं तो कम से कम सभी राजनीतिक पार्टियों का एक प्रतिनिधि मंडल ही वहाँ भेज देना उचित होगा। पश्चिम बंगाल में खूनी राजनीति की नींव कम्युनिस्ट पार्टी ने रखी थी। माकपा के शासन काल से लेकर अब तक पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास चला आ रहा है। माकपा का काडर भी अपने विरोधियों के दमन के लिए यही सब करता था, जो अभी हो रहा है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा के लिए पुलिस और आपराधिक गिरोहों का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। माकपा से तृणमूल तक सत्ता स्थानांतरित ही नहीं हुई, बल्कि उसके साथ अपने विरोधी की आवाज को नृशंसता से कुचलने के तौर-तरीके भी हस्तांतरित हुए हैं। विरोधियों को इस तरह खत्म करना एक तरह से लोकतंत्र की हत्या करना ही है। लोकतंत्र में विरोधी नहीं होंगे तो निर्वाचन की प्रक्रिया का कोई औचित्य रह नहीं जाता। उल्लेखनीय है कि पंचायत की 34 फीसदी सीटें तृणमूल ने निर्विरोध जीता, क्योंकि उसके आक्रामक कैडरों ने पुलिस-प्रशासन की शह पर विरोधी दलों के उम्मीदवारों को डरा-धमका कर बैठा दिया या फिर उन्हें नामांकन नहीं करने दिया। जहां मतदान हुए, वहां बड़े पैमाने पर धांधली हुई और अधिकतर सीटें तृणमूल के खाते में गयीं। भाजपा के जीते हुए प्रतिनिधि भी डरे हुए हैं। जीतने के बाद मिल रही धमकियों से डर कर उन्होंने दिल्ली में शरण ली है। ताजा घटनाओं में जिस तरह से दो लोगों की हत्या की गयी है, उससे साफ जाहिर है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार न सिर्फ अपराधियों पर अंकुश लगाने में विफल रही है, बल्कि हत्यारों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। हमेशा लोकतंत्र की दुहाई देने वाली ममता बनर्जी खुद ही माकपा की हिंसा का विरोध कर सत्ता में आयी हैं, लेकिन आज वह बिल्कुल वैसी ही राजनीति कर रही हैं। इस हिंसा का स्वरूप वीभत्स है। एक घटना में शव को पेड़ पर लटकाकर लिख दिया गया कि भाजपा का समर्थन करने के कारण इसे मारा गया है। आगे जो भी भाजपा के लिए काम करेगा, उसका यही अंजाम होगा। कुछ दिन पहले माकपा समर्थक दंपतियों को जिंदा जला दिया गया था। एक वीडियो में तृणमूल के किसी कार्यालय में एक महिला को खुलेआम अपमानित किये जाते देश ने देखा था। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंसा पर लगाम लगाने की कोशिश करने के बजाय मुख्यमंत्री और उनके दल के बड़े नेता दूसरी पार्टियों पर ही आरोप लगा रहे हैं। विरोधियों की माने तो पुलिस और अन्य प्रशासनिक महकमों के अधिकारी-कर्मचारी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। बहरहाल, पिछले पांच दशकों में हजारों राजनीतिक हत्याओं का गवाह रहा बंगाल हिंसा के नये और नृशंस दौर में है, जहां हत्या के साथ अंग-भंग और बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। अगले साल आमचुनाव हैं और 2021 में राज्य विधानसभा के लिए मतदान होगा। यदि सरकार नहीं चेतती है, तो जनता को इन घटनाओं का उत्तर अपने मताधिकार से देना चाहिए। 

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