यह बात कुछ अटपटी सी लगती है देश और समाज की तमाम बड़ी समस्याओं केा मात देने कुछ ओहदेदार लोग खुद ही  मौत को गले लगाने से नहीं चूक रहे हैं।  कितने हैरत की बात है कि अपनी बहादुरी और काबलियत के लिए जाने वाले महाराष्ट्र के एक आईपीएस अधिकारी, हिमॉशु रॉय ने अपनी रिवाल्बर से अपने ही घर में आत्महत्या कर ली। गौरतलब है कि इस अधिकारी ने मुबंई के संयुक्त पुलिस आयुक्त और महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख समेत कई अहं जिम्मेदारियों का निर्वहन बड़ी कुशलता के साथ किया था। यह कैसी विडबंना है कि बेहद खतरनाक अपराधियों से लोहा लेने वाला एक दिन खुद ही अपनी बीमारी से हार गया। इसके अलावा एक और अभी हाल ही का वॉकया है जिसमें यूपी के एक अपर पुलिस अधीक्षक राजेश साहनी ने मंगलवार को अपनी ही सर्विस पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली। वह मौजूदा समय में पिथौरागढ़ से पकड़े गये एक आईएसआई एजेंन्ट  के मामले में तफतीश कर रहे थे। मुबंई के ही एक 24  वर्षीय प्रबंधन के छात्र अर्जुन भारद्वाज ने एक होटल के 19वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इनके अलावा राष्ट्रीय फिल्मफेयर अवार्ड विजेता और दंगल गर्ल के नाम से मशहूर रियासत की 17 वर्षीय अभिनेत्री जायरा वसीम चार साल से अवसाद में है। उनका कहना है कि उन्हें कई बार से आत्महत्या करने का विचार परेशान कर रहा है। कहने की जरुरत नहीं कि हमें आजकल ऐसी खबरें रोजाना सुनने और पढऩे को मिल रहीं हैं। आज स्थिति यह है कि  विश्व के कई विकासशील देशों के साथ में भारत भी आज युवाओं में आत्महत्याओं की बढ़ती दर को लेकर परेशान है। कहना न होगा कि मिश्रित अर्थव्यवस्था से जुड़े विकासशील देशों  के अनेक हिस्सों में लगातार युवा आत्महत्याओं की गूंज साफ सुनाई दे रही है। शायद इसी बजह से पूरे विश्व में हर साल 10 सितम्बर को बल्र्ड सुसाइड़ प्रीबेन्शन डे मनाया जाता है। ऐसा क्या है कि बच्चों से लेकर किशोर, छात्र, बड़े-बूढ़े, महिलायें, निर्धन, किसान व व्यापारी के साथ कमजोर से लेकर ताकतवर तक जीवन जीने के मुकाबले मौत को गले लगाना ज्यादा बेहतर समझ रहे हैं। इस सबंध में गौरतलब कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पिछले दिनों पहली बार वैश्विक स्तर पर आत्महत्या को लेकर अपनी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रिपोर्ट ने खुलासा किया कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों  के लोग अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में आत्महत्या की दर अधिक है। परन्तु दूसरी ओर विकासशील देशों में महिलाओं के बीच आत्महत्या की दर अधिक पायी गयी है।  ऑकड़ें बताते हैं कि दुनिया में हर 40 सेकेड़ में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है और हर साल आठ लाख लोग खुदखुशी से मरते हैं। 
डब्ल्यूएचओ के ऑकड़ें यह भी खुलासा करते हैं कि आबादी के प्रतिशत के लिहाज से गुयाना, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के हालात ज्यादा चिंताजनक हैं जहॉ एक लाख की आबादी पर आत्महत्या की दर क्रमश: 44.2, 38.5 व 28.9 रही। रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या को बताया गया है। इस आयु वर्ग में आत्महत्या की दर 35.5 रही है। रिपोर्ट की खास बात यह है कि इसमें अवसाद को आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण करार दिया  है। हालॉकि 15 से 29 वर्ष की किशोरावस्था में बीमारियां तो कम होती हैं। परन्तु यह उम्र का वह पड़ाव है जहॉ युवाओं का सारा ध्यान कैरियर बनाने की ओर अधिक होता है। इसलिए जाहिर सी बात है कैरियर की ओर से निराश युवा अवसादग्रस्त होकर मौत को गले लगाना अधिक पसंद करते हैं।  ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ सुसाइड़ एंड़ प्रींवेशन के निदेशक का भी कहना है कि आत्महत्या को लेकर वैश्विक स्तर पर इससे पहले कोई ऑकड़े जारी नहीं हुए थे।  वह इसलिए क्योंकि इससे पहले आत्महत्या को कोई बीमारी न मानकर इसे लोगों के नकारात्मक व्यवहार का प्रमुख कारण माना जाता था। उनका कहना है कि इस अध्ययन से एक अच्छी शुरूआत हुयी है तथा ऑकड़ों के आधार पर ऐसे मामलों में इसके निदान के प्रयास तेज किये जा सकते हैं। आत्महत्या के मामले में भारत की स्थिति भी कम चिन्ताजनक नहीं है। डब्ल्यूएचओ  के हालिया ऑकड़े  बताते हैं कि  पिछले साल दुनिया में आठ लाख से भी अधिक  लोगों ने आत्महत्या की। हैरत की बात यह है कि इनमें तकरीबन दो लाख भारतीय थे। भारत में प्रति एक लाख लोगों में आत्महत्या की दर 21.1 फीसदी रही। भारत में आत्महत्या से जुड़े नेशनल क्राइम रिकाडऱ् ब्यूरो के  तुलनात्मक आंकड़े भी बताते हैं कि यहॉ आत्महत्या की दर विश्व आत्महत्या दर के मुकाबले बढ़ी है। वास्तविक स्थिति यह है कि पूरी दुनिया में कुल आत्महत्या करने वाले लोगों में 23 फीसदी से भी अधिक लोग भारतीय हैं।  भारत में पिछले दो दशकों की आत्महत्या दर में एक लाख लोगों पर 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज भारत में 37.8 फीसदी आत्महत्या करने वाले लोग 30 वर्ष से भी कम उम्र के हैं। दूसरी ओर 44 वर्ष तक के लोगों के आत्महत्या की दर 71 फीसदी तक बढ़ी है। भारत के प्रान्तीय स्तर पर आत्महत्या से जुडे एन.सी.आर.बी. के ही ऑकडे देखने से पता लगता है कि दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु के साथ में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आत्महत्याओं की कुल धटनाओं का 56.2 फीसदी रिकार्ड किया गया। शेष 43.8 फीसदी धटनायें 23 राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों में दर्ज हुयीं। उत्तर भारत के राज्यों अर्थात पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों मे एक लाख लोगों पर आत्महत्या की दर मात्र पांच आंकी गयी है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण के राज्यों में आत्महत्या की दर अधिक होने के साफ संकेत मिल रहे हैं। 
आत्महत्या से जुड़ी यह समस्या आज  हमें यह सोचने-समझने को मजबूर कर रही है कि आखिर भारतीय संस्कृति से जुडे परिवार, प्रेम, नैतिकता, आदर्श, मानदण्ड, स्नेह, वात्सल्य, पारस्परिक बातचीत तथा साझेदारी जैसी सामाजिक संस्थाओं का मानव जीवन में असर कम क्यों होता जा रहा है? कई बार हम बच्चों, युवाओं, महिलाओं और किसानों के बीच बढ़ती आत्मघाती घटनाओं के लिए परीक्षाओं में तनाव व दबाव, निराशा, भग्नाशा, प्रेम में असफलता, गैर बराबरी, बेरोजगारी, गरीबी व नशे की लत जैसे कारकों को दोषी ठहराते हैं। कड़ुवा सच यह है कि ये दशायें तो कमोवेश प्रकारान्तर से प्रत्येक देश व काल में मौजूद रही हैं। परन्तु पहले लोग इतनी बड़ी संख्या में और इतनी जल्दी मौत के सामने हथियार तो नहीं डाल देते थे। इसलिए आज हमें गला काट होड़ के माहौल में व्यक्ति की उस हताशा भरे जीवन की मनोदशा को भी समझना पड़ेगा जहॉ वह जीवन की तल्ख सचाइयों से मुॅह चुराकर भाग रहा है और लोगों की देखा-देखी  जीवन को हताशा से भर रहा है। सच यह है कि जीवन में हताशा की शुरूआत तनाव से होती है जो उसे खुदखुशी तक ले जाती है। देश की हैल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट भी बताती है कि  बढ़ती हुयी महत्वाकांक्षायें, एक दूसरे से आगे निकल जाने की गलाकाट होड़ तथा मोटी पगार वाली नौकरी की चिन्ता आज लगातार लोगों को सता़ रही है।  डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट में आत्महत्या के निदान के तौर पर सरकारों को सलाह दी गयी है कि आत्महत्या की मीडिय़ा रिपोर्टिंग सही तरीके से हो। दूसरे, देश में अल्कोहल को लेकर ठोस नीति बनाई जाये। तीसरे आत्महत्या के संसाधनों पर रोक लगाते हुए आत्महत्या के प्रयास करने वालों की उचित देखभाल की जाये। कुल मिलाकर कहना न होगा कि आत्महत्या की घटनायें  विशुत्र रुप से समाजशास्त्रीय घटना है। इससे जुड़ा आत्महत्या का समाजशास्त्र बताता है कि जब सामाजिक बदलाव के तीव्र दौर में परम्परागत रूप से स्थापित सामाजिक जीवन को संचालित करने वाले मानक खारिज होने लगते हैं तथा जल्दी से नये समाज के मानक सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से आकार नहीं ले पाते हैं तो नये माहौल में लोग उहापोह की स्थिति में पहचान के संकट से घिरकर बिल्कुल अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। यही स्थिति मानसिक अवसाद और हताशा को जन्म देती है जिसकी अन्तिम परिणति आत्महत्या के रूप में होती है। इसका निवारण न तो कानून के द्वारा संभव है और न ही आत्महत्या करने वाले लोगों को समझाने-बुझाने से।  सही बात यह है कि आज समाज में प्रेम, स्नेह, परिवार व पड़ोस में स्वजनों व पड़ोसी मित्रों के सुख-दुख को मिलकर बांटना, अपने परिश्रम पर पूर्ण भरोसा करना, जीवन में आयी चुनौतियों का डटकर मुकाबला करना तथा सफल लोगों की असफलताओं से सीख लेकर ही आत्महत्या के बढ़ते रूझान पर काबू  पाया जा सकता है। 

विदेश