आनंदराम साहू, महासमुंद। सरकारी स्कूल को लेकर अक्सर नकारात्मक खबरें आती रहती हैं। लेकिन यहां हम आपको एक ऐसे सरकारी स्कूल के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां छात्राएं खुद कैंटीन चलाती हैं। इससे जहां वे रोजगार के गुर सीख रही हैं, वहीं कैंटीन से होने वाले लाभ से जेब खर्च के साथ ही बचत भी कर रही हैं।

सड़क पार की दुकान से खाने की चीज लेने जाते समय एक नन्ही छात्रा जब वाहन की चपेट में आते-आते बची, उसी समय शिक्षकों ने ठान लिया कि स्कूल में ही कैंटीन चलाएंगे, जिससे बच्चों को बाहर न जाना पड़े। छात्राओं से बात की तो वे सहर्ष तैयार हो गईं। आज इस कैंटीन की रोजाना की बिक्री पांच से छह सौ रुपये तक है। मुनाफा छात्राओं के बीच बंटता है। इतना ही नहीं, इस कैंटीन में सेनेटरी नैपकिन मुफ्त में दी जाती है।

जिला मुख्यालय महासमुंद से 10 किमी दूर छोटा सा गांव है खट्टी। यहां का मिडिल स्कूल और यहां की छात्राएं जिले में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। चर्चा हो भी क्यों ना। छात्राएं स्कूल में कैंटीन का सफल संचालन कर एक नया अध्याय जो लिख रही हैं। कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय खट्टी में 154 छात्राएं पढ़ती हैं।

करीब छह महीने पहले एक गंभीर हादसा उस समय होते-होते टला, जब एक छात्रा स्कूल के सामने स्थित दुकान से कुछ सामान खरीदने जा रही थी। तेज रफ्तार से आ रहे वाहन की चपेट में आते-आते बची। इस घटना से स्कूल के प्रधानाध्यापक भागवत जगत भूमिल, त्रिवेणी कोसरे, त्रिवेणी चंद्राकर, अभिषेक सालोमन आदि चिंतित हो गए।

उन्होंने सोचा कि ऐसा क्या किया जाए, जिससे बच्चे स्कूल परिसर से बाहर जाएं ही ना। चर्चा के बाद स्कूल में कैंटीन शुरू करने का निर्णय लिया गया। श्रमदान कर 10 गुना 10 का एक कमरा तैयार कर उसका रंगरोगन किया गया।

शिक्षकों ने सोचा यदि छात्राओं को ही यह जिम्मेदारी दे दी जाए तो वे पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें स्वरोजगार का अनुभव में मिलता जाएगा। बस फिर क्या था। छात्राओं के सामने उन्होंने जैसी ही अपनी बात रखी, 50 छात्राए स्वस्फूर्त कैंटीन संचालित करने के लिए तैयार हो गईं। सभी ने 30-30 रुपए जमा किए।

शिक्षकों ने दो हजार रुपये का योगदान दिया। साढ़े तीन हजार रुपये की प्रारंभिक लागत से कैंटीन का संचालन प्रारंभ हुआ। बाद में 30 छात्राएं और जुड़ गईं। इस तरह 80 छात्राओं को चार समूह सत्यम, शिवम, सुंदरम और मधुरम में विभाजित कर सभी को महीने के एक-एक सप्ताह की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

कैंटीन में बहुत कुछ

कैंटीन में अंकुरित अनाज, चाकलेट, पेन, कापी, नाश्ता के साथ ही बच्चों के खिलौना भी मिलता है। बच्चे अब कुछ भी खरीदने स्कूल के बाहर नहीं जाते। इससे छात्राओं को व्यावहारिक ज्ञान के साथ ही होने वाला मुनाफा बोनस के रूप में मिल रहा है। मुनाफा समूहों में बांटा जाता है। जेब खर्च के साथ बच्चे बचत भी कर रहे हैं। रोजाना तीन से छह सौ रुपये तक की बिक्री इस कैंटीन से होती है। इतना ही नहीं, छात्राएं उधार भी चलाती हैं।

स्वच्छता और सहअस्तित्व

कन्या शाला खट्टी की दो शिक्षिकाएं छात्राओं को स्वच्छता के प्रति विशेष जागरूक करने में जुटी हैं। उन्होंने कैंटीन से बच्चियों को मुफ्त में सेनेटरी नैपकिन दिए जाने की व्यवस्था की है। उन्हें स्वच्छता का पाठ पढ़ाया जाता है।

विदेश