भोपाल. सीहोर के छोटे से गांव भोजनगर की 24 वर्षीय मेघा परमार ने बुधवार सुबह 10:45 बजे विश्व की सबसे ऊंची (29029 फीट) चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर लिया। तिरंगा फहराने के बाद यहां उन्होंने सीहोर की मिट्टी और पत्थर रख दिए। गुरुवार शाम को 16 घंटे का सफर तय कर वे वापस बेस कैंप-1 पहुंच गईं।

मैं आज बहुत खुश हूं। मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना पूरा हुआ है। मैंने बेस कैंप से कैंप नंबर 4 तक का सफर 18 मई को ही पूरा कर लिया था। 7600 मीटर की ऊंचाई और -15 से 20 डिग्री के बीच तापमान था। वातावरण में आॅक्सीजन लेवल कम हो गया तो शेरपा ने मेरे मास्क से ऑक्सीजन सिलेंडर जोड़ा। पर, इसे लगाने के बाद मैं 10 मीटर ही चली कि मेरा दम घुटने लगा, क्योंकि मुझे मास्क से आॅक्सीजन लेने की आदत नहीं थी। शेरपा ने देखा और दौड़कर मेरा मास्क लगा दिया और वो मुझे वापस बेस कैंप ले आए।


19 मई : जब लगा कि मेरा सपना अब पूरा नहीं होगा
सुबह कैंप नंबर 4 के आगे वातावरण में आॅक्सीजन लेवल शून्य होने और मेरे मास्क नहीं लगाने की जिद से परेशान होकर डॉक्टर्स ने एवरेस्ट समिट की अनुमति देने से मना कर दिया। मेरा सपना टूटने लगा। पर, मेरी जिद अटल थी। शाम को शेरपा और डॉक्टर्स ने कैंप से शिखर तक आॅक्सीजन मास्क लगाकर रखने की शर्त के साथ मुझे आगे बढ़ने की अनुमति दी।


20 मई : रवाना होने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा
सुबह डॉक्टर्स ने मेरी जांच की और शिखर के सफर के लिए मुझे फिट घोषित किया। शेरपा ने मुझे 10 से 15 मीटर की चढ़ाई के बाद ऑक्सीजन सिलेंडर बंद कर खुले वातावरण में सांस लेने की प्रैक्टिस कराई। इससे फायदा हुआ। पहले मास्क लगाने पर होने वाली घुटन बंद हो गई। सिलेंडर से आॅक्सीजन लेने के लिए शरीर तैयार हो गया। तय शेड्यूल के मुताबिक 20 मई की रात कैंप नंबर 2 में रेस्ट करना था। लेकिन, सपना पूरा होने के जोश और उत्साह के कारण 21 मई की सुबह कैंप नंबर 3 का सफर कंप्लीट कर लिया। आगे रास्ता कठिन था, थकान भी काफी हो गई थी। इसे कम करने कैंप नंबर 3 में करीब 8 घंटे रेस्ट किया। लेकिन, पीछे मुड़कर नहीं देखा।


22 मई : बर्फीले तूफानों से जूझते हुई कैंप 4 पहुंची
कैंप 3 से रात को जब कैंप 4 की ओर बढ़े तो मौसम स्थिर था। तापमान -10 डिग्री से कम था। पूरी रात बर्फ की सफेद चादर से ढंकी पहाड़ियों पर तेज बर्फीली हवाओं ने कई बार रास्ता रोका। दोपहर होते-होते 22 मई को कैंप नंबर 4 में पहुंची।


23 मई : 3 किमी का सफर 15 घंटे में पूरा हुआ
22 मई की रात 8 बजे कैंप 4 से एवरेस्ट को छूने का सफर शुरू किया। यह कैंप 7900 मीटर की ऊंचाई पर है, जहां शिखर की ऊंचाई महज 948 मीटर बची थी। लेकिन, बर्फी की सीधी चट्‌टानों पर बने करीब 3 किमी लंबे रास्ते को पूरा करने में 15 घंटे लग गए। कैंप 4 से अभी 100 मीटर ही आगे बढ़े थे, तभी दोबारा सांस लेने में तकलीफ होने लगी। तत्काल पीठ पर बैग में रखे आॅक्सीजन सिलेंडर को ऑन किया और मास्क से आॅक्सीजन लेना शुरू किया। इसके बाद 884 मीटर की पूरी चढ़ाई आॅक्सीजन सिलेंडर के सहारे सुबह 10.45 बजे पूरी की। यहां 30 मिनट रुकने के बाद बैस कैंप में वापसी का सफर शुरू किया। आज माउंट एवरेस्ट से वापस आने पर मुझे अपने ट्रेनर रत्नेश पांडेय और इस सफर को साकार करने वाले एसआर मोहंती खासतौर पर याद आ रहे हैं, जिन्होंने हर कदम मेरा हौसला बढ़ाया।


गांव में बेटी के लौटने का इंतजार, जश्न की तैयारी
मेघा के ट्रेनर रत्नेश पांडे ने बताया कि -20 डिग्री तापमान में रहने के बाद सामान्य वातावरण में आने में वक्त लगता है। इसलिए बेस कैंप 3 और 2 में करीब 7-7 घंटे का रेस्ट करने के बाद मेघा नीचे पहुंचीं। उधर, मेघा के गांव में जश्न मनाया गया। अब सब बेटी के घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। पिता दामोदर परमार और मां मंजू ने बताया कि मेघा ने सीहोर की मिट्टी एवरेस्ट के शिखर पर स्थापित कर दी है।

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