यह संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो उद्बोधन दिया, उसे ऐतिहासिक इसलिए माना जायेगा कि उन्होंने पहली बार ऐतिहासिक सच्चाई के साथ कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने 1947 के खूनी विभाजन से लेकर कश्मीर की समस्या तक के लिए कांग्रेस की देश विरोधी नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि कांग्रेस के पापों को भारत हर रोज भुगत रहा है। अभी तक शायद ही साहस के साथ किसी ने संसद में इस कटु सच्चाई को प्रस्तुत किया है। विभाजन में पाकिस्तान बना जो भारत का स्थाई दुश्मन हो गया। आतंकवादी घुसपैठ और कश्मीर के मुस्लिमों में मजहबी जुनून के कारण भारत की सीमा पर संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, 1947 में नेहरू नेतृत्व ने जिस तरह अंग्रेजों की चालों में फंसकर और मजहबी साम्प्रदायिकता के सामने घुटने टेकने के कारण देश का विभाजन हुआ, उसका परिणाम है, आतंकवाद और पाकिस्तान उसी नीति का परिणाम है कि आज देश के अधिकांश मुस्लिम राष्ट्र की मुख्य धारा से कटे हुए दिखाई देते है। इसी प्रकार जातिवाद, वंशवाद और तुष्टीकरण की लोकतंत्र को कमजोर करने वाली बुराइयों को राजनैतिक संस्कृति के लिए केवल कांग्रेस जिम्मेदार है। परिवार की राजनीति भी राजतंत्र या सामंती परम्परा के समान है। विडंबना यह है कि 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस आज एक परिवार के गिरफ्त में है। राजवंश का उदाहरण देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि जिस तरह जहांगीर का बेटा, शाहजहां और उसका बेटा औरंगजेब हुआ, वैसा ही सोनियाजी का बेटा राहुल ही कांग्रेस के अध्यक्ष होंगे इसके अलावा कोई नहीं हो सकता। इसलिए कांग्रेस सामंती प्रवृत्ति की ऐसी पार्टी हो गई है। जिसमें न लोकतंत्र है और न लोकतांत्रिक दृष्टि है। कांगे्रस के ही बाय प्रोडक्ट अन्य  दल पैदा हुए, डॉ. लोहिया को आदर्श मानने वाले मुलायम सिंह ने भी सपा को परिवार की पार्टी बना दिया। न केवल बेटा अखिलेश यादव वरन भाई, बहू आदि पूरे कुनबे की पार्टी सपा हो गई। इसी तरह दलितों के वोटों को बटोरने के लिए कांशीराम और मायावती ने बसपा बनाई और दलित राजनीति ने समाज को बांटने का ही काम किया है। हालांकि मायावती भी दलित राजनीति को उप्र की जनता ने नकार दिया है। दलित राजनीति का यह खतरनाक खेल भी प्रारंभ हुआ है कि दलितों को मुस्लिमों के साथ मिलाकर राजनीति की जाय। दलित जो हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है, उन्हें हिन्दुओं से दूर करने की कोशिश मायावती और असरूद्दीन औवेसी जैसे नेता कर रहे है। इस साजिश को गहराई से समझना हो। महाराष्ट्र से महारों ने इस्ट इंडिया कंपनी की अंग्रेज सेना से मिलकर पेशवाओं को पराजित किया, उसका शौय दिवस महार वर्ग के लोग मनाये, इसका औचित्य दिखाई नहीं देता। 
    अंग्रेजों के खिलाफ चाहे जनजाति के लोगों ने लड़ाई लड़ी हो या पेशवा ने लड़ी हो, उनका शौर्य हमारे लिए प्रेरणादायी है, उन शहीदों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करने की परम्परा होना चाहिए, लेकिन जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया, वहां शौर्य देश का शौर्य नहीं हो सकता। १८५७ में जिस अंगे्रजों के भारतीय सैनिकों ने उस स्वतंत्रता संघर्ष को कुचलने की कोशिश की वे चाहे किसी वर्ग, समुदाय के हो हमारे मानक नहीं हो सकते। ब्राम्हणों, दलितों या जनजातियां, जो समान सांस्कृतिक विचार भूमि पर खड़ी है, उस समरसता मे जातिवाद का जहर घोलने का काम मायावती और मजहबी साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने वाले औवेसी जैसे नेता कर रहे है। यह सामाजिक समरसता के ताने बाने के साथ खिलवाड़ है। जो ऐसा कर रहे है वे सामाजिक एकात्मता के विरोधी है। पूर्व के आलेखों में इस कलम का मत रहा है कि जातियों से नहीं, राजनैतिक जातिवाद से सामाजिक एकता और समरसता को खतरा है।  कांगे्रस ने केवल एक परिवार की गिरफ्त में है बल्कि उसने कभी लोकतंत्र को मन से स्वीकार नहीं किया। इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में ऐतिहासिक सच्चाई को व्यक्त करते हुए बताया कि आजादी के बाद जब प्रधानमंत्री की नियुक्ति का अवसर आया तो कांग्रेस की १५ कमेटियों में से बारह कमेटियों ने सरदार पटेल का प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन किया। तीन कमेटियों ने किसी के भी पक्ष का समर्थन नहीं किया। पं. नेहय क समर्थन में एक भी कांगे्रस कमेटी नहीं थी, इसके बाद भी पं. नेहरू को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यदि सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर का एक भूभाग पर पाकिस्तान काबिज नहीं होता। कांग्रेस के चरित्र १९४७ से ही लोकतंत्र की बजाय, परिवार का रहा है। योग्यता की बजाय बेटा बहू रहे है। जब विपक्ष के नेता खडग़ेजी ने कहा कि कांगे्रस के कारण लोकतंत्र है और उसी कारण आज नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि जिस कांग्रेस ने लोकतंत्र का गला घोटकर तानाशाही थोप दी, अखबारों पर ताले डाल दिये गये, जयप्रकाश नारायण, अटलजी, मोरारजी भाई जैसे नेताओं को जेल में डाल दिया गया, ऐसे कांगे्रस के नेताओं को लोकतंत्र की दुहाई देना शोभा नहीं देता। कांग्रेस की अलोकतांत्रिक राजनीति के कारण ही भारतीय राजनीति में जातिवाद, परिवारवाद और तुष्टीकरण का जहर घुलता गया, जो एक नासूर बन गया है। कांग्रेस की इस राजनीति के कारण परिवारवादी, वंशवादी जातिवादी पार्टिया पनपती गई। जिस प्रकार देश का विभाजन मजहबी साम्प्रदायिकता के कारण हुआ, उसी मजहबी साम्प्रदायिकता के सामने झुककर या एक समुदाय के वोट बटोरने के लिए अल्पंख्यकवाद को संतुष्ट करने की नीति अपनाई गई, मजहबी साम्प्रदायिकता के चेहरे मुल्ला, मौलवी उलेमा आदि रहे है, जबकि आम मुस्लिम इनके नेतृत्व में बंधा हुआ रहा है। इन कट्टर मुस्लिम नेतृत्व को ही मुस्लिम सम्प्रदाय और इनके द्वारा कही गई बातें को ही इस्लामी उसूल माना गया। तीन तलाक से मुस्लिम महिलाएं पीडि़त होती रही, यह उन्हें आतंकित करता रहा। इस मामले में शाह बानू ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, सर्वोच्च न्यायायलय ने गुजारा भत्ता देने का भी निर्णय दिया, लेकिन कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम कट्टरनेताओं के दबाव में अपने बहुमत के बल पर मुल्ला, मौलवियों आदि कट्टर नेताओं को मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार जारी रखने की छूट दे दी। अब सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दे दिया है, लोकसभा में इस बारे में कानून बनाने का विधेयक पारित हो गया है, राज्यसभा में कांग्रेस इस विधेयक को पारित होने में रूकावट डाल रहे है। कांग्रेस के लिए पहले मुस्लिमों के वोट हाथ से जाने का डर था और अब तीन तलाक पर कानून बनने से भाजपा को राजनैतिक फायदा हो का डर है। विडंबना यह रही कि राजनीति राष्ट्रहित और जनकल्याण पर केन्द्रित होना चाहिए वह केवल दलहित पर केन्द्रित हो गई है। दलहित की दृष्टि से राजनैतिक कर्मकांड होने से ही परिवार और जातिवादी राजनीति की विषबेल पनपती रही। इससे भी जनकल्याण के कार्यों में रूकावट पैदा होती रही है। तीन तलाक के बारे में कांग्रेस पर वार करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जब कांग्रेस साठ वर्षों तक सत्ता में रही तो उसने तीन तलाक के कानून क्यों नहीं बनाये? उन्होंने कहा कि जब मुस्लिम पति-पत्नी को प्रताडि़त करने या तीन तलाक से उसका जीवन बर्बाद करने पर उसे जेल होती है तो यह तर्क दिया जाता है कि उसके बाल-बच्चों की देखभाल कौन करेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि हिन्दू दोषी होता है और उसे जेल होती तो फिर उसके बाल-बच्चों की चिंता क्यों नहीं होती। सवाल यह है कि जनता के दु:ख दर्द और जनकल्याण की नीतियों की बजाय केवल वोट की दृष्टि से नीति अपनाने के कारण न लोगों की पीड़ा दूर हुई और मुस्लिम महिला पुरूषों की भी स्थिति १९वीं सदी की बनी हुई है। इस बारे में उल्लेख करना होगा कि जिस अरब की धरती पर इस्लाम पैदा हुआ, जहां के इस्लामी उसूलों को इस्लामी दुनिया मानती है। सउदी अरब से ही बुर्का और महिलाओं को सामाजिक कार्य से दूर रखने की प्रथा प्रारंभ हुई। जिसे सभी मुस्लिम मानते है, यह भी चर्चा होती है कि सउदी अरब का इस्लाम अधिकृत है या एशिया का इस्लाम? सूफी इस्लाम भी दक्षिण एशिया में पैदा हुआ। अब जिस सऊदी अरब की धरती पर कट्टर इस्लाम के उसूलों को अपनाया गया, वहां की महिलाओं को वाहन चलाने और अन्य स्पर्धाओं में छूट दी जाती है। महिलाओं को शिक्षित किया जा रहा है। जिस धरती पर अन्य धर्म वाले अपनी धार्मिक परम्परा का निर्वाह नहीं कर सकते थे, वहां मंत्रों के साथ हिन्दू मंदिर बनाने की अनुमति दी गई। अरब देश आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार है। 


जो नरेन्द्र मोदी की भी कूटनीति पर पैनी निगाह रखते हुए है, वे कह सकते है कि नरेन्द्र मोदी के प्रभावी नेतृत्व का परिणाम है, भारत को चीन, अमेरिका, रूस के समान सुपर पावर माना जाने लगा है। पहले गुट निरपेक्ष की नीति रही, अब वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धान्त के अनुसार दुनिया को अपना मानने की नीति पर दुनिया के देशों का भरोसा भारत पर है। अब अरब मुस्लिम देश भी यह मान रहे है कि नरेन्द्र मोदी का प्रभावी नेतृत्व ही इजराइल फिलिस्तीन के विवाद हल कर सकता है। 

                                                                                                                                                                                                         जयकृष्ण गौड


 

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