जम्मू के बाहरी इलाके सुंजवान के सैन्य शिविर पर हमला और फिर उसके 72 घंटे के भीतर ही श्रीनगर में सीआरपीएफ के शिविर पर हमला कर एक बार फिर आतंकवादियों ने सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है। इन दोनों हमलों में छह जवान शहीद हो गए। करीब पंद्रह महीने पहले उ?ी के सैन्य शिविर पर हुए हमले के बाद आतंकियों द्वारा यह ब?े आतंकी हमले हैं। पठानकोट वायुसेना अड्डे पर भी इसी तरह आतंकियों ने घुस कर हमला किया था। उ?ी हमले के बाद भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तानी सीमा के भीतर चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को तबाह कर दिया था और माना जा रहा था कि उससे सीमा पार चल रहे आतंकवादी संगठनों की कमर टूट गई है। मगर उसके बाद भी आतंकी घुसपैठ और सुरक्षा ठिकानों पर हमले का सिलसिला रुका नहीं है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की नकेल कसने के लिए भारत सरकार को एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा ब?ा कदम उठाना चाहिए। यह बात तो तय है कि आतंकवाद पर भारत सरकार और भारतीय सेना की रणनीति से आतंकी संगठन बौखलाए हुए हैं। पिछले तीन वर्ष में जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना ने चिन्हित कर आतंकियों को खत्म किया है, उससे आतंकी संगठन बेचैन हैं। अपनी उपस्थिति और डर को बनाये रखने के लिए वह इस प्रकार के हमलों की साजिश रच रहे हैं। उनके सब प्रकार के मंसूबों को नाकाम करने के लिए बिना देरी नियोजित ढंग से कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सुंजवान हमले की जिम्मेदारी भी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। सैन्य शिविरों और सुरक्षा ठिकानों पर इससे पहले के हमलों में भी इसी संगठन का हाथ था। इन सबूतों के बावजूद पाकिस्तानी हुकूमत न सिर्फ अपने यहां चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से इनकार करती रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दावा करती फिरती है कि भारत उस पर झूठे आरोप म?ता रहता है। उ?ी हमले के बाद सरकार ने सुरक्षा चौकसी ब?ाने के मकसद से सैन्य खर्च में ब?ोतरी का एलान किया था। सीमा पर बा?बंदी और निगरानी को चौकस बनाने पर बल दिया गया था। इसके बावजूद अगर सीमा पार से आतंकी भारतीय सीमा में घुस कर अपनी मंसूबों को अंजाम देने में कामयाब हो रहे हैं, तो इससे खुफिया एजेंसियों और सेना के बीच तालमेल और सुरक्षा इंतजामों को और बेहतर बनाने की जरूरत रेखांकित होती है। अगर आतंकी सैन्य शिविरों के भीतर घुस कर हमला करने का हौसला कर पा रहे हैं, तो इससे यही जाहिर है कि उनके सूचना तंत्र और रणनीति को भेदना भारतीय सेना के लिए कठिन है। छिपी बात नहीं है कि सीमा पार से आतंकियों को घुसपैठ कराने में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ का हाथ होता है। वे सीमा पर गोलीबारी कर पहले भारतीय सेना का ध्यान बंटाते हैं और फिर पीछे से आतंकियों को सीमा पार करा देते हैं। उनकी इस चाल से पार पाने की कारगर रणनीति बनाने की दिशा में भी सोचना होगा। यह अकारण नहीं है कि पाकिस्तानी सेना लगातार संघर्षविराम का उल्लंघन करती आ रही है। सीमा पार से आतंकियों के जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर दहशत फैलाने का सिलसिला न रुक पाने की एक ब?ी वजह घाटी में अशांति भी है। वहां के स्थानीय लोग जब-तब प्रशासन और सुरक्षाबलों को चुनौती देते रहते हैं। बच्चे तक हाथों में पत्थर लेकर स?कों पर उतर आते हैं। इसके पीछे वजह अलगाववादी संगठनों पर ठीक से नकेल न कसा जाना है। यही वजह है कि सीमा पार से आए दहशतगर्द आसानी से घाटी में पनाह पा जाते हैं। हालांकि हवाला के जरिए आने वाले पैसों पर नजर रखी जाने और अलगाववादी नेताओं के खिलाफ सख्ती के चलते पत्थरबाजी में कुछ कमी आई है, पर दहशतगर्दी को रोकना अब भी चुनौती बनी हुई है। पिछले हफ्ते ही श्रीनगर के एक अस्पताल पर हमला कर आतंकवादी अपने साथियों को छु?ाने में कामयाब हो गए। ऐसे में आतंकियों पर नकेल कसने और स्थानीय लोगों का भरोसा जीतने के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर व्यावहारिक रणनीति बनाने की जरूरत है। 

विदेश