जम्मू कश्मीर पुन: चर्चा में है। उसके दो मुख्य कारण है। पहला- सरकारी निर्देश पर रमजान के दिनों में घाटी में पत्थरबाजों और आतंकियों पर सुरक्षाबलों का एकतरफा संघर्ष विराम। और दूसरा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रदेश को विकास की सौगात। कश्मीर की संकटमयी स्थिति के लिए अक्सर 'असंतोषÓ शब्द का प्रयोग किया जाता है। बीते सात दशकों से जिस 'नाराजगीÓ के कारण घाटी के अधिकतर युवा (स्कूली छात्र-छात्राओं सहित) भारत की मौत की दुआ मांगकर सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसाने और आतंकियों से सहानुभूति रखने के लिए विवश हो रहे है- क्या वह प्रधानमंत्री के विकास मंत्रों या फिर रमजान में एकतरफा संघर्ष विराम जैसे कदमों से दूर हो सकती है? 19 मई को श्रीनगर में किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक विद्युत परियोजना को राष्ट्र को समर्पित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के 'गुमराहÓ युवाओं से मुख्यधारा में लौटने की अपील की। उन्होंने कहा, 'शांति और स्थिरता का कोई विकल्प नहीं है। राज्य के भटके हुए नौजवानों द्वारा उठाया गया हर पत्थर, हर हथियार उनके अपने राज्य को अस्थिर करता है, अब राज्य को इस अस्थिरता के माहौल से बाहर निकलना ही होगा।Ó आगे प्रधानमंत्री कहते हैं, 'मैं चाहता हूं कि सभी लोग जम्मू-कश्मीर के विकास में अपनी ऊर्जा लगाएं। सभी समस्याओं और मतभेदों का बस एक ही समाधान है- विकास, विकास और विकास।Ó अपनी जम्मू-कश्मीर यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने लेह-लद्दाख को जोडऩे वाली जोजिला सुरंग परियोजना और श्रीनगर रिंग रोड का भी शिलान्यास किया था। कश्मीर संकट को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही नहीं, अपितु देश के कई पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने भी इस दिशा में भरसक प्रयास किए हैं। 2004-14 के संप्रगकाल में प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने हिंसाग्रस्त कश्मीर को शांत करने हेतु कई प्रयास किए, जिसमें सरकार द्वारा गठित वार्ताकार समूह ने पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों से बात की। 1999-2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 'कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियतÓ का नारा दिया। 1970 के दशक में अति-सांप्रदायिक शेख अब्दुल्ला से समझौता करके तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें फिर से जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने तो शेख अब्दुल्ला के कहेनुसार ही जम्मू-कश्मीर का भविष्य निर्धारित कर दिया था, जो वर्तमान कश्मीर संकट के बीज से कमतर नहीं है। राजनीतिक पहल के साथ-साथ आर्थिक रुप से भी जम्मू-कश्मीर पर केंद्र की कृपा होती रही है। वर्तमान समय में राज्य में 60 हजार करोड़ रुपये की केंद्रीय परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिसका बड़ा भाग पर्यटन और आधारभूत संरचनाओं को सुदृढ़ और आधुनिक करने में व्यय हो रहा है। प्रदेश को मिलने वाला केंद्रीय ग्रांट भी देश में सर्वाधिक है। अब यदि विकास परियोजनाएं और राजनीतिक प्रयासों से कश्मीर में आमूलचूल परिवर्तन संभव होता, तो वर्षों पहले ही इस भू-भाग में शांति स्थापित हो चुकी होती और देश के अन्य क्षेत्रों की भांति यह सामान्य जनजीवन का मूर्त रूप बन चुका होता। क्या ऐसा हुआ? घाटी में रमजान के दिनों एकतरफा संघर्षविराम की सरकारी घोषणा को आतंकी संगठन लश्कर खारिज कर चुका है, ऐसे में कश्मीर में सुरक्षाबलों का 'ऑपरेशन ऑलआउटÓ का प्रभावित होना स्वाभाविक है। इस सफल सैन्य अभियान के अतंर्गत, इस वर्ष सुरक्षाबल अबतक 70 आतंकियों को ढेर कर चुके है। साथ ही जुलाई 2016 में मारे गए हिज्बुल आतंकी बुरहान वानी के सभी 11 जिहादी साथियों को भी जन्नत पहुंचा दिया गया है। हाल में सुरक्षाबलों ने जिन आतंकियों को ठिकाने लगाया है, उसमें कश्मीर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विषय पढ़ाने वाला सहायक प्रोफेसर मोहम्मद रफी भट भी शामिल था। अब यदि कश्मीर में अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी घाटी में फैले कथित 'असंतोषÓ और 'भटकावÓ के मुख्य कारण है, तो भट जैसे शिक्षित, नौकरीपेशा और आर्थिक रूप से स्वतंत्र युवा- मानवता के शत्रु क्यों बन रहे है? दशकों से कश्मीर में जिस 'असंतोषÓ को अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और विकास के चश्मे से देखा गया है, आज भी ऐसा हो रहा है- वह वास्तव में उस कट्टर इस्लामी मानसिकता से जनित है, जो गैर-मुस्लिमों के बराबरी के साथ रहने में घृणा और असुरक्षा की भावना उत्पन्न करती है। इस रुग्ण मानसिकता से आज न केवल भारतीय उपमहाद्वीप, अपितु शेष विश्व भी त्रस्त है। क्या यह सत्य नहीं कि कश्मीर में पथराव करने वाले, आतंकियों की मदद करने वाले और वह जिहादी, जिन्होंने बीते दो दशकों में न्यूयॉर्क में 9/11, मुंबई में 26/11, कई यूरोपीय नगरों और अमेरिकी शहरों में आतंकवाद की पटकथा लिखी- उन सभी को प्रेरणा देने वाला इस्लामी कट्टरवाद का विषैला दर्शनशास्त्र है? 'काफिर-कुफ्रÓ की अवधारणा से संचालित इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य- हिंसक जिहाद के मार्ग से 'दारुल-हरबÓ विश्व (भारत सहित) को 'दारुल-इस्लामÓ में परिवर्तित कर 'निजाम-ए-मुस्तफाÓ को स्थापित करना है। मानवता विरोधी इसी चिंतन ने 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम अलगाववाद का बीजारोपण किया, 1946 में बंगाल में 'सीधी कार्रवाईÓ और 1947 में भारत के विभाजन की पटकथा लिखी, 1980-90 के कालखंड में कश्मीरी पंडितों के उत्पीडऩ के लिए प्रोत्साहित किया और कालांतर में सैकड़ों इस्लामी आतंकवादी संगठनों को जन्म दिया, जो आज विश्व में वामपंथियों से भी बड़ा खतरा बन चुके है। कश्मीर में विषाक्त इस्लामी चिंतन आज देश की अखंडता, एकता, संप्रभुता, सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए है और छद्म-पंथनिरपेक्षता के नाम पर स्थापित विकृत विमर्श ने इसी मानसिकता को हर बार भारतीय बहुलतावाद और सनातनी संस्कृति को चोटिल करने का अवसर दिया है। विडंबना देखिए कि देश में जिन बुद्धिजीवियों (राजनीतिक और सामाजिक) को अक्सर आतंकवादी का मजहब और कट्टर इस्लाम आधारित उनकी हिंसक कार्यशैली दिखाई नहीं देती है, उनका विवेक रमजान के दिनों में एकाएक सक्रिय हो जाता है और जिहादी पत्थरबाजों व आतंकियों के विरुद्ध सरकार से नरमी बरतने की मांग प्रारंभ कर देते है। क्यों?
देश में इस दोहरे मापदंड की जननी सेकुलरवाद के नाम पर स्थापित वह विकृत विमर्श है, जिसमें पत्थरबाजों और आतंकियों के मददगारों पर सुरक्षाबलों हर प्रतिकार- मानवाधिकारों को कुचलने के सामान हो जाता है और पथराव करने वाले व निरपराधों पर गोली बरसाने वाले जिहादी गुमराह, भटके हुए, गरीब, बेरोजगगार और विकास के आभाव से त्रस्त युवा बन जाते है, जिसमें सुरक्षाबलों के सभी अधिकार (मानवाधिकार सहित) गौण हो जाते है। अभी हाल ही में इसी 'असंतुष्टÓ पत्थरबाजों की फौज ने 7 मई को चेन्नई से श्रीनगर आए पर्यटक आर. थिरूमणि की जान तब ले ली, जब वह श्रीनगर-गुलमर्ग राजमार्ग पर एक वाहन से भ्रमण पर निकला था। हरियाणा से कश्मीर घूमने आया एक युवक भी अनंतनाग से लापता है। इससे पहले, शोपियां जिले के जवूरा क्षेत्र में इन्हीं 'भटकेÓ हुए नौजवानों ने 40-50 स्कूली बच्चों से भरी बस पर भी पथराव कर दिया था। अब सभ्य समाज के लिए थिरूमणि और वह स्कूली बच्चे मासूम है या फिर 'असंतुष्टÓ मजहबी उन्मादी? कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों का संघर्ष भूमि और लोगों पर नियंत्रण का नहीं है, बल्कि उस दर्शन के खिलाफ है, जो हिंसा के बल पर कश्मीर सहित भारत में बहुलतावाद, लोकतंत्र और मजहबी आजादी को समाप्त करना चाहता हैं। इसी जिहाद के लिए पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है, जो वर्तमान समय में इस्लामी आतंकवाद, कट्टरता और गैर-मुस्लिम विरोधी मानसिकता के बड़े वैश्विक केंद्रों में से एक है। निसंदेह, देश के शेष राज्यों की भांति जम्मू-कश्मीर भी विकास धारा में शामिल हो, उसके नागरिकों को भी सभी मौलिक अधिकार व सुख-सुविधाएं मिले- किंतु इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि इन सभी के लिए देश की अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता कर लिया जाए। यह विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और वक्तव्यों से भी स्पष्ट है। आवश्यकता इस बात की है कि कश्मीर सहित देश में उन रूग्ण विचारधारा से संघर्ष किसी भी स्थिति में अविरल रहे, जो विदेशी और भीतरी शक्तियों को बार-बार भारत को खंडित करने हेतु प्रेरित करती है।

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