यह समय सभी स्कूलों में परीक्षाफल के साथ-साथ आने पाल्यों के दाखिलों का समय है। सच यह है कि हिन्दी के प्राथमिक स्कूल खाली हैं और प्रीस्कूली शिक्षा से जुड़ी सस्थाओं में बच्चों के प्रवेश कराने को लेकर भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। देश में इस समय आप किसी भी राजमार्ग से निकल जायें आपको वहां बड़े-बड़े ढांचों के अंग्रेजी स्कूल दिखाई पड़ ही जायेंगें। अब शहरी इलाकों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे स्कूलों के खोलने की गलाकाट होड़ है। पिछले दिनों लर्निग ब्लॉक के एक सर्वे से यह बात सामने आयी कि सरकारी शिक्षा धीरे-धीरे निजी स्कूलों की ओर खिसक रही है। यही बजह है कि प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ रहा है। ऑकड़ों से यह भी खुलासा हुआ कि विगत सालों में 22 लाख बच्चे सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में चले गये। इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी अंकित हैं कि उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, मेघालय एवं उत्तराखण्ड समेत आठ राज्यों में प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में 40 से 50 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। ऐसी संभावनायें हैं कि निजी अंग्रेजी स्कूलों में नामांकन की यदि यही रफ्तार बनी रही तो देश में 2020 तक नामांकन की यह दर 55 फीसदी तक पहुॅच जायेगी।
कहने की जरुरत नहीं कि आज प्रीस्कूल शिक्षा कई खाचों में बंटी है। एक ओर ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के प्राथमिक सरकारी स्कूल हैं जो केवल गरीब व पिछड़े परिवारों के बच्चों तक सीमित होकर रह गये हैं। इन स्कूलों में अभी तक बच्चों को न तो हाजिरी की और न ही फेल होने की कोई चिन्ता थी। यह एक बहुत ही कड़वा सच है कि प्राथमिक शिक्षा के इस सरकारी तन्त्र ने अधिकांश परिवारों में बच्चों को दूसरे प्रदेशों में जाकर बाल श्रमिक बनने को प्रोत्साहित किया। यही बजह रही है कि इन विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण शून्य हो गया तथा शिक्षक निर्भय होकर शिक्षण कार्य के अलावा अन्य सभी काम करने को तत्पर हो गया। दूसरी तरफ सरकारी प्राथमिक शिक्षा के कमजोर तन्त्र का फायदा मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा ने खूब उठाया। यही बजह रही कि शहरों से लेकर गॉव गॉव तक प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ सी आ गयी। इसी का परिणाम यह भी हुआ कि देश के अनेक उद्योगपति रातों रात शिक्षाविद कहलाने लगे। इन अंग्रेजी स्कूलों की खासियत यह है कि ये औपचारिक शिक्षा की किताबी पढ़ाई शुरु होने से पूर्व प्रीस्कूल शिक्षा से जुड़ी अनौपचारिक शिक्षा पर आधारित हैं। इन स्कूलों की प्रीस्कूल पढ़ाई के स्तरों को देखें तो ज्ञात होता है कि बच्चे की इस अनौपचारिक पढ़ाई के पॉच चरण हैं। इनमें प्रीनर्सरी, नर्सरी, केजी, एलकेजी (लोअर किंडरगार्डन), यूकेजी (अपर किंडरगार्डन) जैसे स्तरों से जुड़ी शिक्षा प्रमुख है। दरअसल देखा जाये तो अनौपचाारिक शिक्षा का यह प्रतिमान पश्चिम से चलकर भारत आया है। सच यह है कि प्रीनर्सरी से यूकेजी तक की शिक्षा का यह प्रतिमान एक तरह से बच्चे को परिवाार के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा का स्थानापन्न है। प्रीस्कूल अंग्रेजी शिक्षा का इतिहास बताता है कि इस शिक्षा का प्रादुर्भाव 18 वीं शताब्दी में औद्योगिक व्यवस्था से जन्मित फैक्ट्री व्यवस्था के आने से शुरु हुआ तथा इसके मुख्य केन्द्र लंदन,जर्मनी,कनाड़ा इत्यादि रहे। इससे जुड़ा इतिहास यह भी बताता है कि ऐसे माता पिता जो फैक्ट्रियों में कार्यरत थे उनके परिवार बिल्कुल एकल थे। ऐसे परिवारों में जन्मित बच्चों के लिए न तो उनके पालन पोषण और न ही उनकी प्राथमिक शिक्षा का कोई प्रबंध था। इस प्रकार के एकल परिवारों के बच्चों के शारीरिक विकास, खेलकूद, दिमागी विकास के साथ उनके शरीर को गतिमान बनाने तथा उन्हें अनौपचारिक पारिवारिक माहौल देने के लिए इस प्रकार की शिक्षा का प्रबंध वहॉ पश्चिम के उद्योपतियों के द्वारा किया गया। वह इसलिए ताकि ऐसे कार्यशील परिवारों के बच्चों को इन स्कूलों में परिवार जैसा माहौल मिल सके और ये कामगार बच्चों की तरफ से निश्चिंत होकर अपना कार्य कर सकें। संदर्भित ऑकड़े यह भी बताते हैं कि पश्चिम के अनेक देशों में जनसंख्या वृद्धि लगभग शून्य हो गयी है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वहॉ युवाओं के मुकाबले बृद्धों की संख्या बढऩे लगी। उम्र के इस पड़ाव पर बरिष्ठ नागरिकों को  वृद्धाश्रम में जाने को मजबूर होना पड़ा। लिहाजा बच्चों के सामाजीकरण करने और उन्हें दुनियावी जिन्दगी से रुबरु कराने वाला कोई बचा ही नहीं। इस सामाजिक व शैक्षिक टूटन का फायदा इस प्रीस्कूल शिक्षा ने खूब उठाया जो अभी भी लगातार जारी है। सच यह है कि अब भारत में भी यह प्रीस्कूली शिक्षा बहुत समृद्धता के साथ काफी फल-फूल रही है। इस बात को यहां कहने में काई हिचक नहीं कि 1991 के पश्चात देश में उदारीकरण की प्रक्रिया लागू होने के बाद देश के उच्च मध्यम वर्ग की क्रय क्षमता तेजी से बढ़ी है। कामकाजी परिवारों के बढऩे से देश में सेवा क्षेत्र का विस्तार भी तेजी से हुआ है। परिवारों में बच्चों की संख्या एक या दो होने और ऐसे एकल परिवारों में कोई बड़ा बूढ़ा न होने से भी बच्चों के प्राथमिक स्तर पर उन्हें शुरुआती जिन्दगी का ज्ञान न मिलने की बड़ी भारी समस्या खड़ी हुयी है। इससे जुड़ा कड़वा सच यह भी है कि परिवारों के एकल होने व उच्च मध्यम वर्ग की आमदनी में तीव्र बढ़ोत्तरी होने से ये प्रीस्कूल बाजार की तर्ज पर ऐसे परिवारों से अनौपचारिक शिक्षा देने के बदले भारी कीमत बसूलने को तत्पर हुए हैं। इन स्कूलों की फीस के ढ़ॉचे का अवलोकन करने से ज्ञात हुआ कि प्रीस्कूल शिक्षा के पॉचों चरण यानि प्रीनर्सरी  से लेकर यूकेजी तक का कुल व्यय तकरीबन 10 लाख के आस पास आता है। बच्चों का उठना-बैठना, खाना-पीना, बाशरुम जाना तथा थोड़ी बहुत देश दुनिया की सामाजिक, शैक्षिक व लयात्मक संगीत व कुछ अंक गणना इत्यादि की कितनी बड़ी कीमत ये स्कूल वसूल रहे है इसका अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है।  देखने में यह भी आ रहा है कि इन संस्थाओं में माँ बाप से भारी भरकम रकम बसूलने के बाद भी बच्चों के हितों से जुड़े कायदे कानूनों की अनदेखी वहॉ आम बात हो गयी है। कहना न होगा कि एकल कामकाजी परिवारों ने अपने बच्चों को इन प्रीपेटरी संस्थाओं में भेजना शुरु तो कर दिया है,परन्तु वहॉ किसी भी प्रकार का निगरानी तंत्र न होने से वहॉ  दो प्रकार के नुकसान सीधे-सीधे दिखायी पड़ रहे हैं। एक तो यह कि बच्चों में कितना गुणात्मक विकास हो रहा है इसकी जानकारी न तो इन संस्थाओं के पास और न ही उन बच्चों के अभिभावकों के पास है। दूसरे इन  इन ड़े बोर्डिंग स्कूलों के बच्चे अपने मॉ-बाप के नैसर्गिक प्रेम व बात्सल्य से बंचित हो रहे हैं। बाल मनोविज्ञान बताता है कि पॉच साल की उम्र बच्चों के विकास की सबसे संवेदनशील अवधि होती है। यह वह अवस्था है जब बच्चा परिवार और दुनियावी जिन्दगी के बीच तालमेल बैठाता है। शायद यही वह समय है जब परिवार, समाज, प्रकृति,मूल्य,सामाजिक संबध इत्यादि उसके भविष्य की दिशा तय करते हैं। नि:संदेह ये संस्थायें कामकाजी परिवारों के लिए पैसे के बलबूते स्थानापन्न बनी तो हैं, परन्तु ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चों की सामाजिक, सांस्कृतिक व भावनात्मक नींव कमजोर हो रही है।  ये सभी कार्य पूर्व में  भारतीय शिक्षा पद्धति में घर के बुर्जुग किया करते थे। आप माने या न माने आज युवा पीढ़ी की तंगदिली इन स्कूलों के साथ साथ अंग्रेजी की इस प्राथमिक शिक्षा को बड़ा बाजार बनने में अच्छी खासी मदद कर रही है। इस समय भविष्य की वैश्विक जरुरतों और वर्तमान की प्रतिस्र्पधा को ध्यान में रखते हुए बाल मनोविज्ञान को समझना बड़ा जरूरी है। आज वक्त की जरुरत यह  है कि  माँ-बाप  बच्चे के समय को सामाजीकरण की प्रक्रिया में खुद पिरोयें।  साथ ही उससे संवाद बनाकर उसे अपने भावनात्मक  ऑचल व बात्सल्य का आवरण प्रदान करें। ये आधुनिक डे बोर्डिंग अथवा स्कूल  हमारी कामकाजी जिन्दगी अथवा समय की जरुरत का सुरक्षा कवच तो हो सकते हैं। परन्तु नैसर्गिक मॉ:बाप और परिवारों के भावनात्मक माहौल के स्थानापन्न ये स्कूल कदापि नहीं हो सकते। इसलिए आज मॉ-बाप के इन स्कूलों को भारी रकम चुकाने के बाद भी अपने बच्चों के बचपन को बचाने की चुनौती अभी भी बरकरार है। इस गंभीर मुद्दे पर अबिलम्ब सोच बनाने की जरुरत है।


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       राजनाथ सिंह 'सूर्य'

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