अनौपचारिक शिखर सम्मेलन द्विपक्षीय संबंधों के मानक और आदर्श बनते जा रहे हैं। इस संदर्भ में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात भी बहुत हद तक आदर्श ही रही। राष्ट्रपति पुतिन के बुलावे पर प्रधानमंत्री मोदी अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में शिरकत करने रूस पहुंचे थे। ध्यान रहे कि आपसी संबंधों को नया आधार देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में वुहान में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाकात की थी, जिसके परिणाम सुखद रहे हैं। प्रधानमंत्री की इस अनौपचारिक मुलाकात से रूस के साथ भी संबंधों को नयी ऊर्जा मिलेगी, यह विश्वास मजबूत हो जाता है। यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है, क्योंकि निकट भविष्य में प्र्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की बार-बार भेंट होनी है। वैश्विक मंचों पर होने वाली मुलाकातों के लिए यह अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आधार बनेगा। रूसी राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी इसी साल जून में होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन में पुतिन से मिलेंगे, इसके बाद दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और अर्जेंटीना में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भी दोनों नेताओं की मुलाकात तय है। इसी साल अक्टूबर में होने वाले वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन में शिरकत करने के लिए भी पुतिन भारत आएंगे। दुनिया के कई हिस्सों में इस समय अशांति का दौर चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय विवादों के चलते कई क्षेत्रों में तनाव फैला हुआ है। इस अंतरराष्ट्रीय अशांति और तनाव की मुख्य वजहों में कोरियाई प्रायद्वीप में मची हलचल, दक्षिण चीन सागर में चीन का सैन्यीकरण और अमेरिका-चीन के बीच छिड़ी आर्थिक जंग के अलावा ईरान के साथ परमाणु समझौते से अमेरिका का पीछे हटना हैं। लिहाजा ऐसे में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सोची में हुई ताजा मुलाकात और निकट भविष्य में होनी वाली मुलाकातें काफी मायने रखती हैं। मोदी के अनौपचारिक दौरे की पृष्ठभूमि में तीन अहम बातें थी- पहली, अमेरिका ने हाल ही में भारत को चेताया था कि रूस से बड़े पैमाने पर सामरिक साजो-सामान और व्यापारिक वस्तुओं की खरीद के चलते अमेरिकी की तरफ से भारत पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। भारत को प्रतिबंध की यह चेतावनी अगस्त 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित और जनवरी 2018 में दूसरी बार लागू किए गए कानून 'काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज थ्रू सेक्शन एक्टÓ के तहत दी गई थी। दूसरी, चीन के साथ छेड़ी गई ट्रेड वार (व्यापारिक लड़ाई) में अमेरिका का रुख नर्म नजर आ रहा है। अमेरिका ने अपने देश में आयात होने वाली चीनी वस्तुओं पर प्रस्तावित नई टैक्स दरों को फिलहाल लागू करने से टाल दिया। तीसरा, यूरोपीय संघों के असंतोष के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान पर साल 2015 से पहले वाले प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के लिए तैयार बैठे हैं। सभी जानते हैं कि अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वार से वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी, जिससे दोनों देश प्रभावित होंगे। वहीं अगर ईरान पर साल 2015 से पहले वाले प्रतिबंध फिर से लगाए जाते हैं तो उससे भारत की चाहबहार बंदरगाह विकास परियोजना प्रभावित होगी। अमेरिका-रूस और ब्रिटेन-रूस के बीच उभरती वैश्विक चुनौतियों, पश्चिम एशिया-अफगानिस्तान की तनावपूर्ण स्थिति और चीन-पाकिस्तान के गठजोड़ के चलते भारत-रूस के संबंधों को बढ़ावा देकर पहले जैसे मजबूत करने की आवश्यकता है। सोची शिखर सम्मेलन इसी उद्देश्य के तहत हुआ। सोची शिखर सम्मेलन के लिए  रवाना होने की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करके कहा, 'मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति पुतिन के साथ वार्ता भारत और रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकारपूर्ण सामरिक साझेदारी को और मजबूत करेगी।Ó प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी अब एक 'विशिष्ट विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारीÓ में बदल गई है जो एक 'बहुत बड़ी उपलब्धिÓ है। उधर, रूस के राष्ट्रपति ने भी भारत के प्रधानमंत्री का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया और भारतीय हितों के प्रति गंभीरता दिखाई है। दरअसल, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की रूस के प्रति नाराजगी के चलते पुतिन को भी अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। पुतिन अब खुद रूस और भारत के संबंधों को पुन: निर्मित कर रहे हैं। 

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