'कांग्रेस' मुक्तÓ भारत का मतलब किसी राजनीतिक दल विशेष से मुक्ति पाना नहीं है और वैसे भी लोकतंत्र किसी एक दल विशेष या विचारधारा विशेष की जागीर नहीं है। लोकतंत्र में सभी दल और सभी राजनीतिक विचारधाराएं आकर मिल जाती है और यही लोकतंत्र की ख़ासियत भी है और लोकतंत्र भी तभी मज़बूत होता है। अब सवाल यह उठता है कि अगर लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों की अहमियत है तो फिर 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का मतलब क्या है? दरअसल 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का मतलब भ्रष्टाचार से आजादी है। 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का मतलब उस तानाशाही से आज़ादी है जो किसी भी दल विशेष के आंतरिक लोकतंत्र का ख़ात्मा करती हो। 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का मतलब देश या प्रदेश का नेतृत्व वंशानुगत आधार पर नहीं बल्कि ज़मीन से जुड़े किसी व्यक्ति को योग्यता के आधार पर देना है। 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का मतलब देश में सुशासन का एक नया मार्ग प्रशस्त करना है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 'कांग्रेसÓ बनकर 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत का सपना साकार हो सकता है? किसी राज्यपाल की मदद से अगर राजनीतिक जोड़ तोड़ कर कर्नाटक में भाजपा की सरकार बन भी जाती तो क्या इसे 'कांग्रेस मुक्तÓ राज्य कहा जा सकता था?  इसमें कोई दो मत नहीं कि कर्नाटक की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़े दल के रुप में चुना लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो जोड़ तोड़ या फिर तथाकथित तौर कुछ विधायकों की आत्मा की आवाज़ पर लिए गए समर्थन के बदले यह बेहतर विकल्प नहीं होता कि भाजपा कर्नाटक विधानसभा में सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाती? 
कर्नाटक में केंद्र सरकार और राज्यपाल की भूमिका पर भले ही कांग्रेस जैसी पार्टी विधवा विलाप कर रही हो लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राज्यपाल के पद के दुरुपयोग की कहानी कांग्रेस के इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। देश में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार केरल में ईएमएस नम्बूदरीपाद की अगुवाई में 1957 में चुनी गई लेकिन प्रदेश में कथित मुक्ति संग्राम की आड़ में उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने 1959 में इसे बर्खास्त कर दिया। आंध्र प्रदेश में पहली बार 1983 में एन.टी. रामाराव के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी लेकिन 1984 में तेलुगू देशम पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव को अपने इलाज के लिए विदेश जाना पड़ा था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी सरकार को बर्खास्त करवा दिया था। हालांकि बाद में रामाराव फिर मुख्यमंत्री के तौर पर बहाल हो गए। ऐसे एक दो नहीं बल्कि कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस पार्टी ने राज्य में विरोधी दल की सरकारों की गैर लोकतांत्रिक ढंग से हत्या की। देश की जनता कांग्रेस की गैर लोकतांत्रिक हरकतों से पूरी तरह वाकिफ है, देश की जनता कांग्रेस के शासन में हुए भ्रष्टाचार से अनभिज्ञ नहीं है, देश की जनता कांग्रेस की वंशानुगत राजनीति को भी समझती है और यही वजह है कि देश के एक बड़े हिस्से में जनता कांग्रेसियों की जोड़ तोड़ की राजनीति को पूरी तरह नकार चुकी है। 
आजादी के पहले कांग्रेस एक विचारधारा थी जिससे हर भारतीय जुड़ा हुआ था लेकिन आज़ादी के बाद कांग्रेस एक राजनीतिक दल में तब्दील हुई और एक कांग्रेस पार्टी से कई कांग्रेस पैदा होती गईं। देश की राजनीति में उस कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व बना रहा जिसकी कमान नेहरु गांधी परिवार तक सिमटकर रह गई। इस कांग्रेस पार्टी में कोई भी फैसला पार्टी के अन्य सदस्यों की आम राय से नहीं बल्कि नेहरु गांधी परिवार की मर्जी से लिया जाता है। नेहरु गांधी परिवार के लिए कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसी हो गई। पंडित जवाहरलाल नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी से लेकर सोनिया और राहुल गांधी तक पार्टी में एक ही परिवार का दबदबा कायम रहा। देश की राजनीति से लेकर प्रदेश की राजनीति तक, कोई भी फैसला इस परिवार की मर्जी के बिना संभव नहीं था। आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को देश में राजनीतिक तानाशाही नजऱ आ रही है लेकिन अपनी ही पार्टी के इतिहास को उलट पलटकर देखें तो उन्हें पता चलेगा कि उनकी कांग्रेस पार्टी ने कभी पूरी तानाशाही दिखाते हुए लोकसभा के कार्यकाल को पांच साल से  बढ़ाकर छह साल कर दिया था। इसी कांग्रेस पार्टी ने न्यायपालिका के कई अधिकारों में कटौती कर उसे कमज़ोर बना दिया था। यह वही कांग्रेस है जो मध्य प्रदेश में अपनी जड़े मज़बूत कर चुके अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाकर पंजाब का राज्यपाल बनाकर भेज देती है। ऐसा नहीं है कि इंदिरा और राजीव गांधी के बाद सोनिया और राहुल गांधी की कांग्रेस में कोई बड़ी तब्दीली आ गई है। आज भी कांग्रेस उसी ढर्रे पर चलती दिखाई दे रही है, अगर पार्टी से जुड़ा कोई भी ज़मीनी नेता अगर उभरने की कोशिश करता है तो उसके पर कतरने में पार्टी जरा भी देरी नहीं करती और यही वजह है कि पार्टी पिछले कई बरसों से देश को मज़बूत सरकार या मज़बूत विपक्ष नहीं दे सकी। यह वही पार्टी है जिसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री उनकी काबिलियत के आधार पर नहीं बल्कि  इसलिए बनाया था कि ताकि वह नेहरु गांधी परिवार से अलग हटकर कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकें, वरना खुद कांग्रेस के कई बड़े नेता मानते हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब मुखर्जी बेहतर विकल्प होते।
अब बात उस 'कांग्रेस मुक्तÓ भारत की जिसका जिक्र अक्सर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश में विकास को एक नई दिशा दी है। सड़क मार्ग हो या फिर गांवों को इंटरनेट से जोडऩे की बात, देश के हर गांव को बिजली से जोडऩे की यात्रा हो या फिर गरीब की रसोई में गैस पहुंचाने की बात, ऐसे कामों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त है जिसने देश की राजनीति में सुशासन की एक नई परिभाषा लिखनी शुरू कर दी है। जात-पात और मज़हब की राजनीति से ऊपर उठकर जब देश का प्रधानमंत्री 125 करोड़ भारतीयों की बात करता है तो हर भारतीय खुद को गौरवान्वित महसूस करता है। नोटबंदी से लेकर आधार कार्ड से जुड़े बैंक खातों में सीधे सब्सिडी पहुंचाने जैसी पहल का आम आदमी ने स्वागत किया है। लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा जैसे तमाम राज्यों में अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है तो इसमें लोगों का स्थानीय नेतृत्व से कहीं ज़्यादा भरोसा देश के प्रधानमंत्री पर रहा है। प्रधानमंत्री जी देश के आम आदमी से बात करो तो वह देश में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव महसूस कर रहा है लेकिन अगर कर्नाटक जैसे किसी भी राज्य में सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी, अगर कांग्रेस के दिखाए रास्ते पर ही चलेगी तो फिर कांग्रेस मुक्त भारत यानि भ्रष्टाचार से मुक्त भारत का सपना अधूरा ही रह जाएगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)    

  
 
 

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