देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि से लोग परेशान हैं और कहीं न कहीं तेल के दाम में वृद्धि केंद्र सरकार के विरुद्ध नाराजगी का कारण भी बन रही है। यह असंतोष और अधिक बढ़े उससे पहले ही केंद्र सरकार को तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए कुछ उपाय करने ही चाहिए। पेट्रोल-डीजल की कीमतों का सीधा संबंध आम आदमी की जेब से है। तेल के दाम बढऩे से माल ढुलाई से लेकर रोजमर्रा में उपयोग आने वाली वस्तुओं के दाम भी बढ़ते हैं। इसलिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे पर केवल वाहन उपयोग करना ही भारी नहीं पड़ता, बल्कि अन्य जगह भी जेब हल्की होती है। केंद्र सरकार को याद करना होगा कि जब कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी, तब जनता में असंतोष का कारण पेट्रोल-डीजल के दाम भी थे। इसलिए मोदी सरकार को गंभीरता से विचार कर पेट्रोल-डीजल के दामों को नियंत्रण करने की कोई नीति बनानी चाहिए। भले ही अभी कंपनी कह रही हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में वृद्धि हुई है, इसलिए उन्हें भी भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं। कंपनियों के इस तर्क के साथ यह भी ध्यान आता है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत निचले स्तर पर पहुँचते हैं, लेकिन उसका लाभ आम जनता को नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दामों में बहुत कटौती नहीं करती हैं। बहरहाल, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों पर सरकार का कहना है कि तेल की कीमतों के मामले में वह कोई दखल नहीं देती, इस बारे में सारे फैसले ऑयल मार्केटिंग कंपनियां ही करती हैं। सरकार अपने बचाव में भले ही यह तर्क दे, लेकिन वह अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती। कंपनियों की मनमानी रोकना और जनता के हित का ध्यान रखना सरकार की ही जिम्मेदारी है। उल्लेखनीय है कि जून 2017 से पहले तक तेल की कीमतें हर 15 दिन पर तय होती थीं लेकिन अभी देश के सारे पेट्रोल पंपों पर फ्यूल की कीमतें रोज जारी होती हैं। रुपया-डॉलर अनुपात और अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों के आधार पर रोज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव होता है। 2014 में राजग सरकार के आने के बाद से सरकारी खजाना भरने के लिए 2015 की छमाही में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने का निर्णय लिया गया। उस वक्त वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही थी लेकिन जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। अप्रैल, 2014 में पेट्रोल पर लगने वाला उत्पाद शुल्क 9.80 रुपये प्रति लीटर था, जो 2015-2016 में कई बार बढ़ोतरी के बाद अब 21.48 रुपया हो गया है। वहीं डीजल पर अप्रैल, 2014 में एक्साइज ड्यूटी 3.65 प्रति लीटर लगती थी, जो अब 17.33 प्रति लीटर हो गई है। सरकार को सरकारी खजाने की चिंता छोड़ कर जरा आम आदमी की जेब की भी फिक्र करनी चाहिए। सरकारी खजाना भरने के लिए ऐसे उपाय सरकार को करने चाहिए, जिनका बहुत असर आमजन पर न पड़े। महंगाई के इस दौर में सामान्य व्यक्ति राहत की सांस ढूंढ रहा है और उसे मोदी सरकार से बहुत उम्मीद हैं। 

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