मध्यप्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राज्य है, जिसे लोग प्रकृति का प्रदेश भी कहते हैं । मध्यप्रदेश की धरा वन की संरक्षिका भी है क्योंकि सर्वाधिक वन मध्यप्रदेश में ही है जो सिर्फ मध्यप्रदेश के लिए ही नहीं देश के लिए भी लाभदायक है । इन वनों के सच्चे साथी है यहां कि जनजातियां जो वनो को देवी और देवता के रुप में पूजते है ।


 मध्यप्रदेश सर्वाधिक जनजाति वाला प्रदेश है जिनकी जनसंख्या लगभग 1.5 करोड़ है । जनजातीय जीवन सामान्य जीवन से बिल्कुल अलग होता है, उनका रहन -सहन, खान - पान, वेशभूषा, पूजन विधि सब कुछ अलग होता है । आइये जानते जनजातियों के बारे में जनजातीय संग्रहालय के माध्यम से - श्यामला हिल्स में स्थित जनजातीय संग्रहालय में मध्यप्रदेश के साथ - साथ छत्तीसगढ़ के लोकरंग देखने को मिलते हैं ।
                        

जनजाति से ही हमें बोध हो रहा है कि जन की जाति । जनजातीय समाज अपने जीवन उपयोगी समस्त संसाधनों की आपूर्ति प्रकृति से करते हैं । जनजातीय समाज का जीवन सरल नहीं होता प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति से लेकर उपभोग तक मेहनत का काम होता है । उनका रहन - सहन बेहद ही दुष्कर होता है ।जनजातीय संग्रहालय के माध्यम से दर्शाया गया है कि किस तरह वे जीवन यापन करते हैं । संग्रहालय की प्रथम दीर्घा में जनजातीय आवास की दीर्घा सजायी गई है ।

गोण्ड़ जनजाति का जीवन अन्य जनजातियों से थोड़ा सरल होता है । गोण्ड़ जनजाति के घर अन्य जनजाति के मुकाबले बड़े होते है जिसमें कलात्मक कारीगरी की गई होती है । दीवार से लेकर छत के छज्जे तक सब कुछ गढ़ा गया होता है । घर के अंदर दैनिक जीवन में उपयोगी सामान का भण्डारण ( चकिया, सूपा, मिट्टी का चूल्हा, नाहडोरा आदि) होता है । गोण्ड़ों के घर में दरवाजे कलात्मक और फर्श मिट्टी एवम गोबर से लिपे पुते होते हैं । इनके घरों में अनाज को रखने के लिए लिलार कोठी होती है जो जमीन से डेढ़ फीट ऊँची होती है
  
बैगा जनजाति का घर साधारण सा होता है जिसमें दरवाजे कलात्मक और फर्श एवं घर की बाहरी तथा भीतरी दीवारे मिट्टी एवं गोबर से लिपी - पुती होती है । बैगा जनजाति के घर की सबसे बड़ी पहचान इसकी छत होती है जो दो ढ़ाल वाली होती है जिस पर कवेलु छवे होते है । इनके घर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके घर के आंगन में कूडा ( जमीनी ओखल ) होता है ।

भील जनजाति के घर मध्यम आकार के होते है । घर की आंतरिक दीवार और दरवाजे कलात्मक होते है । घर की दीवार  और फर्श को गोबर एवं मिट्टी से लिपा - पोती की जाती है तथा घर की अंदरुनी दीवारों पर कलात्मक चित्रों को उकेरा जाता है । भीलों के घर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनका घर पूर्वाभिमुख होता है । भीलों के घर को एक बात होती है जो इसे अन्य जनजातीयों से अलग करती है वो यह कि इनका घर मिट्टी के ऊँचे टीले पर बना होता है  ।

सहरिया जनजाति मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग मे प्रमुखता से पाई जाती हैं । यह प्रायः बेहद आलसी प्रवृत्ति के लोग होते है इनके घरों के मुख्य द्वार ऊँचे एवं मिट्टी का उपयोग करते हुए  कलात्मक बनाया जाता है ।

घरों की प्रदर्शनी से बाहर निकलकर हम वस्तुओं की प्रदर्शनी वाले भाग में जाते हैं ।

मगरोहन - मगरोहन का निर्माण साल्हे की लकड़ी से होता है जिसमें लकड़ी को साबुत रखा जाता है, क्योंकि जिस प्रकार मगरोहन का निर्माण अखंड लकड़ी से होता है उसमें कहीं भी जोड़ नहीं होता है उसी प्रकार वैवाहिक जीवन को शाश्वत रखने की कामना की जाती हैं ।

कंगन - गोण्ड जनजाति में कंगन का विशेष महत्व है । जब नववधू ससुराल में प्रवेश करती है तो उसे कंगन पहनाया जाता है । विवाह के पश्चात पहली बुआई के लिए बीज वधु तैयार करती है वो भी कंगन पहनकर । 

बाँसिन कन्या - गोण्ड जनजाति में बांस को कन्या की तरह बोया जाता है और पालते -पोषते है | इसके के पीछे एक कहानी है कि एक बार एक परिवार के छःह भाइयों को भूख लगी तो उन्होने  एक मात्र बहन को मार दिया पाँचों बड़े भाइयों ने उसे खा लिया जबकि सबसे छोटे भाई ने उसे जमीन में गाड़ दिया । अगले जन्म में वही बहन बाँस के रुप में पैदा हुई ।

धरती - गोण्ड जनजाति के लोग धरती  को बूढ़ादेव की मैल से निर्मित मानते है ।

बाबदेव - भील जनजाति में बाबदेव नामक रस्म को निभाया जाता है जिसके अंतर्गत दिपावली, दिवासा, हरियाली अमावस्या आदि अवसर पर टेराकोटा से बने बिल्ली, सुअर, कुत्ता, घोडा आदि का गांव से बाहर ढ़ेर लगाया जाता है ।

पिठौरा - घर की खुशहाली के लिए भील जनजाति के लोग पिठौरा देव के अनुष्ठान के लिए लखेरा या चित्रकार को बुलाकर घर की दीवारों पर चित्रकारी करवाते है ।

पीडी खूँट - जब पीढ़ी समाप्त हो जाती है तो भील  जनजाति के लोग अंजन की लकड़ी की दो खूँट या पलिया गाड़ देते है ।

गातला -  भील जनजाति के लोग किसी व्यक्ति की असमय मृत्यु हो जाने पर मृतक को जमीन मे दफना दिया जाता है और प्रस्तर पर उसकी तस्वीर उकेरी जाती है ।

माडिया स्याम - माडिया जनजाति में मृतको के लिए बनाया जाता है । 

 संग्रहालय में स्थापित कुछ देवी - देवताओं, स्मारक, स्तंभ आदि के बारे में कुछ जानकारी -

टटल देवी - टटल देवी हाथ -पैर जोड़ने वाली देवी कहा जाता है । पिछले 30-40 वर्षो से टटल देवी ज्यादा प्रचलित हो गई । टटल देवी से लोग मन्नत माँगते है कि उनके टूटे हुए हाथ या पैर जुड़ जायेगे तो वे लकड़ी से बने हाथ और पैर दान करेंगे ।

मढ़ई - यह एक प्रकार का प्रतिमा विहीन मंदिर होता है ।

पागलदेव  स्तंभ - जिस प्रकार सामान्य जीवन में न्याय प्राप्त करने करने के लिए न्यायालय होते है ठीक उसी प्रकार गोण्ड जनजाति में पागलदेव नामक एक स्थान होता है जहाँ चौगान नामक चबूतरा होता है । इसी स्थान पर न्याय लिया जाता है ।

सरगनसेनी - देवी - देवताओं को प्राप्त करने के लिए के लिए एक सीढ़ी होती है जो  चारों ओर से कांटों आदि से घिरी होती है । काँटों भरी बाधाओं को पार करने के बाद  सीढ़ी के माध्यम से देवी या देवता तक पहुँच सकते हैं ।

गोण्ड एवं बैगा जनजाति में महारानी और मरही देवी की बहुत ज्यादा मान्यता है जो क्रमशः तालाब के तट पर और श्मशान में निवास करती है ।

संग्रहालय में आगे की बढ़ने पर मेहमान राज्य छत्तीसगढ़ की झांकी देखने को मिलती है जिसमें कुछ प्रमुख झांकी इस प्रकार हैं -

रजवार आँगन - छत्तीसगढ़ की रजवार जनजाति के आँगन बहुत आकर्षक होते है । यह जनजाति अपने आँगन को बहुत सारे रंगों से सजाते है ।

सिंह ड्योढ़ी - दंतेश्वरी देवी को बस्तर की माँ कहते है दंतेश्वरी देवी का मंदिर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में स्थित है, इसके मुख्य द्वार की प्रतिकृति इस संग्रहालय में उकेरी गई है । जिसमें सिंह के मुख की आकृति प्रदर्शित है ।

दशहरा रथ - भारत के सुप्रसिद्घ दशहरा में से एक बस्तर का दशहरा है, जहाँ दशहरा का उत्सव रथ को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया जाता है और उसे नगर भ्रमण कराया जाता है ।

डंगई लाट - छत्तीसगढ़ की जनजातीय समाज में त्यौहार इत्यादि होने पर भगवान को ध्वज भेंट करने की परंपरा है जिसमें सभी ध्वजों को एक ही स्थान पर लगाया जाता है इसे ही डंगई लाट कहते है ।

शीतला माता - छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज में शीतला माता को स्वास्थ्य को संतुलित रखने वाली देवी के रुप में पूजा की जाती है ।

मावली माता - मावली माता को बस्तर की देवी के रुप में पूजा जाता है ।

पनिका - पनिका छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख जनजाति है जो अपने आपको कबीर का वंशज कहते है तथा उन्हीं की आराधना करते है । इनका प्रमुख कार्य कपड़े की बुनाई करना है ।

                            पनिका जनजाति का घर मिट्टी से निर्मित होता है और कबेलु से छवा होता है । इनके घर में सूत कातने के औजार मुख्य रुप से देखे जा सकते है । यह जनजाति बीजक को परम ग्रंथ के रुप में मानती है ।

बिमन दीया - बिमन दीया एक प्रकार की कलाकृति है जो छत्तीसगढ़ की पहचान है । जहाँ लोहे को आग में तपाकर दीये की आकृति वाली कलाकृति बनाते है । बिमन दीया भी इसी प्रकार की कलाकृति है जो तीन फुट ऊँची होती है जिसमें कई दीया लगे होते हैं । छत्तीसगढ़ की जनजातीय समाज बिमन दीया में भगवान का निवास मानते हैं ।

भित्तिचित्र और जाली - रजवार जनजाति की स्त्रियाँ दीवारों पर चित्र बनाती है तथा दीवारों के बीच - बीच में कलात्मक जाली का निर्माण करती है । कलात्मक जाली का निर्माण मिट्टी से किया जाता है ।

जब हम किसी सफ़र पर निकलते है तो एक प्रारंभिक बिंदु होता है और एक अंतिम बिंदु होता है जहाँ सफर का अंत होता है ठीक इसी प्रकार संग्रहालय के अंतिम पड़ाव पर आ गये है जहाँ हम आदिवासी बच्चों के खेल देखते हैं जो इस प्रकार हैं -

पलटी, मछली /केकड़ा पकड़िया, चौपड़, गिल्ली डंडा, किल्ल पो, घर-घर, पंचगुट्टा, पिट्ठू, बुडवा लसंगडा, पोशंबा आदि ।

यही है हमारा अपना जनजातीय संग्रहालय |

(लेख - विनय कुशवाहा)

स्त्रोत: Vinay swachhand.blogspot.com

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