पानी  की कमी के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणी की है। किंतु, राजनीतिक विमर्श में डूबे समाज पर न्यायालय की 'चेतावनी भरी टिप्पणीÓ का कोई असर नहीं हुआ। बेबात बतंगड बनाने में हम सिद्धहस्त हो चुके हैं, इसलिए गंभीर विषयों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता। दिल्ली के भूजल स्तर में खतरनाक ढंग से आ रही गिरावट पर सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताई है। न्यायालय ने टिप्पणी की है कि भूजल में आ रही गिरावट के कारण दिल्ली में 'वॉटर वॉरÓ संभव है। पानी पर युद्ध। हम यह बात बहुत लंबे समय से सुनते आ रहे हैं कि दुनिया में तीसरा विश्व-युद्ध हुआ तो वह पानी को लेकर होगा। दुनिया में आ रहे जल संकट को देखकर ही विद्वानों ने यह कहा है। उसी बात को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के संदर्भ में उल्लेखित किया है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि भारत के दूसरे प्रमुख शहर, यहाँ तक कि गाँव भी जल संकट से गुजर रहे हैं। जल संकट विकराल रूप में हमारे सामने है, किंतु हम फिर भी नहीं चेत रहे हैं। न तो जिम्मेदारों को कोई परवाह है और न ही सामान्य व्यक्ति को कोई फिर्क है। हम भी पानी की कीमत तब समझते हैं, जब चार दिन घर में पानी की आपूर्ति नहीं होती, अन्यथा हम पानी की बर्बादी में शामिल रहते हैं। यह भी कि चार दिन पानी के लिए तरसने के बाद जैसे ही फिर से पानी की आपूर्ति प्रारंभ होती है, हम फिर से पानी की कीमत भूल जाते हैं। उपभोग की प्रवृत्ति ने जल संकट पैदा किया है। हमारे पुरुखों ने वर्षभर के उपयोग के लिए पानी संग्रहण की व्यवस्था दी थी। तालाब बना कर जल संग्रहण किया जाता था। कुओं का उपयोग सिर्फ पेयजल के लिए किया जाता था। किंतु, आज हमने जल संग्रहण करना बंद कर दिया है और धरती के सीने में छेद करके उसका समूचा अमृत निचोड़ ले रहे हैं। तेजी से विकसित हो रहे नये शहरों के कारण भी भूजल स्तर में भयंकर गिरावट आ रही है। इमारतों के जंगल खड़े करने के लिए पेड़ों की बलि तो ली ही जा रही है, साथ में पानी की आपूर्ति के लिए गहरे बोर करके धरती का जल भी निकाला जा रहा है। दुनिया में जिस तरह कई देशों में पानी को लेकर नीति बनना प्रारंभ हो गई है, उसी तरह भारत में भी जल संकट से निपटने के लिए ठोस नीति बननी चाहिए। देश में जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'स्वच्छताÓ के लिए अभियान चला कर एक वातावरण बदला है, उसी तरह जल संग्रहण के लिए भी अभियान चलाने की आवश्यकता है, ताकि आम आदमी भी अपनी भूमिका को समझे। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन का उदाहरण हमारे सामने है। सरकार ने केपटाउन की जनता को पानी उपलब्ध कराने में असमर्थता जाहिर कर, शहर खाली करने के लिए निर्देश जारी कर दिए हैं। यह स्थिति हमारे यहाँ भी आ सकती है, यदि हम समय से सावधान नहीं हुए। देश के कई हिस्सों से गर्मी के मौसम में पानी के लिए लगी लंबी कतारों, मीलों दूर से एक घड़ा पानी लेकर आती महिला, और सूखे कुओं का फोटो हमें डराता है। इन चित्रों से हमें डरना भी चाहिए। देश के कई हिस्सों से पानी के कारण होने वाले झगड़े के समाचार भी सुनने में आते हैं। जल संकट इतना विकराल हो जाए कि उससे निपटना संभव न हो, उससे पहले हम सबको, सत्ता और समाज को, समाधान के लिए विचार-विमर्श और प्रयास करना प्रारंभ कर देना चाहिए। 

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