मोदी मैजिक की एक और शानदार सफलता। कर्नाटक में मिली इस सफलता से नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अभी उनका मैजिक चूका नहीं है, उनके मैजिक में अभी भी दम-खम है, जनता की विश्वसनीयता उनसे जुडी हुई है, उनके राजनीतिक कर्म-वचन से जनता आकर्षित होती है, विपक्ष की नकारात्मक राजनीति से जनता परहेज ही करती है। जब तक नरेन्द्र मोदी की चुनावी सभाएं शुरू नहीं हुई थी तब तक मीडिया तलवारें भाज रही थी, कह रही थी कि मोदी मैंजिक में दम नहीं दिख रहा है, मौदी मैजिक कर्नाटक मे चलेगा नहीं, नरेन्द्र मोदी का कांग्रेस मुक्त बनाने का अभियान कर्नाटक में थम जायेगा, कांग्रेस मोदी मैजिक को थाम लेगी, आदि आदि। मोदी ने कोई एक-दो नही बल्कि कर्नाटक मे पूरे 19 सभाएं की थी, एक अनुमान के अनुसार करीब 150 सीटों पर मोदी की सभाएं और मोदी के भाषण असर दिखाये। जहां भाजपा एक दम कमजोर थी वहां भी भाजपा ने मजबूति दिखायी। कांग्रेस भी मोदी को भ्रष्ट, मोदी को तानाशाह, मोदी को कारपोरेट धरानों का दलाल, मोदी को अराजक, मोदी को जनविरोधी बताने की पूरी हुंकार भर रही थी, इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेस कह रही थी कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश की छवि गिरी है, विदेशी मोर्चे पर असफलता मिली है। यह देश का चुनाव नहीं था, यह चुनाव राज्य का था, कर्नाटक में भाजपा सत्ता में भी नहीं थी, सत्ता में तो कांग्रेस थी, कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ पूरे पांच साल तक सत्ता मे थी। इसलिए कांग्रेस को अपने काम को रखना चाहिए था, अपने काम पर जनता से जनादेश मांगना चाहिए था, अपने विकास को आईकॉन बनाना चाहिए था। पर कांगेस ने अपने काम, अपने विकास और अपनी अस्मिता को चुनाव का विषय नहीं बनायी। चुनाव का विषय नरेन्द्र मोदी को बना दिया, नरेन्द्र्र मोदी से ही जवाब मांगा जाने लगा। राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्वारमैया तक नरेन्द्र मोदी को कोसने और नरेन्द्र मोदी को धेरने की कोई कोशिश नहीं छोडी थी। जनता के बीच संदेश गया कि कांग्रेस सिर्फ मोदी विरोध पर खडी है। अब जब कर्नाटक चुनाव का परिणाम सामने आ गया है तब कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को आत्ममंथन जरूर करना चािहए, सिर्फ मोदी को विरोध के केन्द्र में रखने और अनावश्यक विषय पर हंगामा करने का दुष्परिणाम बार-बार सामन आयेगा। पर इस सच्चाई को अब भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल स्वीकार करेगें? असली प्रश्न यही है। कर्नाटक विधान सभा चुनाव का केन्द्र विन्दु एक ही था। केन्द्र विन्दू हिन्दू की अस्मिता थी। दोनो मुख्य राजनीतिक पार्टियो भाजपा और कांग्रेस के केन्द्र विन्दू में हिन्दू ही थे। भाजपा जहां हिन्दुओ की एकत्रीकरण पर जोर लगा रही थी वहीं कांग्रेस कभी भाजपा को हिन्दू विरोधी तो कांग्रेस कभी हिन्दुओं की एकता को खंडित और भ्रमित करने की चुनावी राजनीति को गति दे रही थी। हिन्दुओं के बल पर  चुनाव जीतने की कोशिश थी। भाजपा हिन्दुत्व की राजनीति की चैम्पियन है, भाजपा हिन्दुत्व के बल पर ही सत्ता स्थापित करती रही है। इसलिए हिन्दुत्व की राजनीति की कसौटी पर भाजपा को हराना मुश्किल है। फिर भी कांग्रेस के रणनीतिकार खुशफहमी में थे। कांग्रेस के रणनीतिकार भाजपा को हिन्दू विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहे थे। प्रश्न खडा किया जा रहा था कि भाजपा ने भगवान राम का अपमान किया है, आज तक भाजपा ने राम मंदिर बनाने का वायदा पूरा नहीं किया है। यह सही है कि भाजपा राम मंदिर के विषय पर ही सत्ता के केन्द्र में आयी थी और हिन्दुओं की राम मंदिर निर्माण की इच्छा भी पूरी नहीं हुई है। पर हिन्दू इसको लेकर बहुत ज्यादा क्रोधित नहीं है। यह सही है कि कट्टरवादी हिन्दू तो जरूर इस विषय को लेकर नरेन्द्र मोदी को कोसता है और नरेन्द्र मोदी व भाजपा के प्रति भडास निकालता है पर जब चुनाव सामने आता है तब हिन्दू कट्टरपंथियों के सामने नरेन्द्र मोदी और भाजपा को समर्थन देने का ही एक मात्र विकल्प होता है। इसलिए चाह कर भी कट्टरवादी हिन्दू भाजपा से अलग नहीं हो पाते हैं। यह भी बात सही है कि कट्टरवादी हिन्दू कांग्रेस और कांग्रेस के सहयोगी सेक्यूलर गिरोहो को ही राम मंदिर न बनने देने का असली खलनायक मानते हैं। क्या कांग्रेस कभी भी राम मंदिर बनने देने की रणनीति का समर्थन कर सकती है? फिर हिन्दुओं को राम मंदिर निर्माण के प्रश्न पर तोडने की यह कैसी इच्छा कांग्रेस की थी। कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल गांधी को भगवा रंग में रंग दिये। कभी राहुल गांधी माथे पर चंदन टिका लगा रहे थे, तो कभी राहुल गांधी भगवा चादर शरीर पर डाल कर फोटो खिचवा रहे थे तो कभी राहुल गांधी को कर्नाटक के मंदिर-मठ घूमाये जा रहे थे। राहुल गांधी के रणनीतिकार यह चक्कर मे थे कि कुछ प्रतिशत हिन्दुओं के वोट भी काट लिया जाये तो फिर भाजपा का काम तमाम हो जायेंगा। पर कांग्रेस के रणनीति कार यह भूल गये कि यह सूचना क्रांति का दौर है। इस सूचना क्रांति के दौर मे असलियत पर पर्दा डालना मुश्किल है। सोशल मीडिया पर सक्रिय हिन्दू कट्टरपंथियो ने राहुल गांधी के हिन्दू विरोधी बयान घर-घर तक पहुंचा दिये, राहुल गांधी द्वारा गौरक्षकों को हत्यारा कहने वाले बयान घर-घर तक पहुंचा दिये, राहुल गांधी द्वारा सिर पर मुस्लिम छेदा टोपी लगाये हुए फोटो घर-घर पहुंचा दिये गये। अतएव इसका दुष्परिणाम ही सामने आये। इस स्थिति को आम जनता तक जानती है पर कांग्रेस के रणनीतिकार क्यों और कैसे नहीं जानते हैं? 
         दूसरी सबसे बडी भूल कांग्रेस को हिन्दुओ की एकता को तोडने की थी। कांग्रेस ने हिन्दुओं की एक प्रभुख जाति लिंगायत पर दांव लगाया था। लिंगायत पर दांव लगाना कांग्रेस के लिए आत्मघाती चुनावी रणनीति साबित हुई है। लिंगायत कर्नाटक की प्रमुख जाति रही है और सत्ता भी लिंगायत के आस-पास ही घूमती है। कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्वारमैया लिंगायत नहीं हैं। पिछली बार यदियुरप्पा ने भाजपा से बगावत की थी और अलग चुनाव लडा था। यदियुरप्पा ने करीब 10 प्रतिशत वोट काटे थे, इसलिए भाजपा की सत्ता कांग्रेस के हाथों में आ गयी थी। उस समय लिंगायतों की एकता टूटी थी जिसके कारण लिंगायत जाति पूर पांच सालों तक दुष्परिणाम झेली। पूरे पांच साल तक लिंगायत जाति अपने आपा को उपेक्षित और अपमानित समझती रही। इसका कारण यह था कि लिंगायतों की राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई थीं, इसके लिए लिंगायत जाति यदियुरप्पा का भाजपा के प्रति बगावत और लिंगायत की एकता खंडित होना माना था। सिद्वारमैया की चालांकि देखिये। पूरे पांच साल तक सिद्वारमैया ने लिंगायतों के सिने पर बैठ कर मूंग दली और फिर चुनाव आने के समय लिंगायतों को चारा डालने में लग गये। लिंगायत एक जाति हैे पर सिद्वारमैया ने लिंगायत को हिन्दुओ से एक अलग धर्म घोषित कर दिया।

 लिंगायत इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। लिंगायतों ने इसे चुनावी चारा समझा। चारा मछली को फंसाने के लिए डाला जाता है। लिंगायत मछली बन कर प्राण देने के लिए तैयार नहीं हुए। गैर लिंगायत जातियों में यह संदेश गया कि सिद्वारमैया के सत्ता केन्द्र मे जब लिंगायत है तो हम छोटी-छोटी जातियों का कांग्रेस की राजनीति में कौन सी बिसात होगी? फलस्वरूप कर्नाटक की छोटी-छोटी जातियां भी कांग्रेस से दूर हो गयी।
जद एस एक तीसरी शक्ति बनी रही। पहले भी वह तीसरी शक्ति थी और इस चुनाव में भी तीसरी शक्ति रही है। उसकी जातीय आधार अभी भी कायम है। खासकर भाजपा जद एस की जातीय आधार में सेंध लगाने मे नाकामयाब रही हैं। जद एस और बसपा के बीच चुनावी समझौता हुआ था। दलितों के वोट जद एस को मिले हैं, ऐसा माना जा रहा है। जद एस के सुप्रीमो एचडी देवगौडा पिछडी जाति से आते है। फिर यह कहा जा सकता है कि दलित और पिछडा गठजोड के माध्यम से सत्ता स्थापित करने का चुनावी समीकरण कोई कमाल नहीं कर सका। 
        लोकतंत्र में हार को स्वीकार कर आगे बढने की परमपरा है। पर पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक कांग्रेस अपनी हार को पचा नहीं पा रही है। गुस्से का शिकार बन जा रही है। अपनी शक्ति सिर्फ गुस्से में उतार देती है। कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरे विपक्ष को अब नकारात्मक राजनीति को छोडकर सकरात्मक राजनीति की ओर आगे बढना चाहिए। नरेन्द्र मोदी और हिन्दुत्व का अति और अनावश्यक विरोध आत्मघाती समझा जाना चाहिए।
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