पाकिस्तानी सेना का भारत से मैत्री की इच्छा जताना निश्चित रूप से अविश्वसनीय सी बात ही लगती है। उसका सारा इतिहास ही भारत विरोध से भरा पड़ा है। पर पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने हाल ही में आशा व्यक्त की कि भारत के साथ सैन्य सहयोग कर शांति और समृद्धि हासिल की जा सकती है। तो क्या पाकिस्तान भारत के साथ अब दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहता है? अब बड़ा सवाल ये है किक्या भारत पाकिस्तानी आर्मी चीफ बाजवा की पेशकश को गंभीरता से लेगा? मतलब यह है कि क्या पाकिस्तान के साथ वार्ता की मेज पर बैठने के लिए राजी होगा? यह एक कठिन सवाल है। इनके उत्तर ढूंढने से पहले हमें पाकिस्तानी सेना के गुजरे दौरे के पन्ने खोलने होंगे। देखना होगा कि अबतक उसका भारत के प्रति रुख किस तरह का रहा है।
पूर्ववर्ती से बेहतर बाजवा
पर यह मानने में हर्ज नहीं होगा कि बाजवा अपने पूर्ववर्ती राहील शरीफ से अधिक शरीफ और समझदार लगते हैं। वे गाहे-बगाहे भारत के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी नहीं करते रहते। राहील शरीफ तो किसी गुंडे की तरह से बोलते थे। वे बंदरभभकी देने के मामले में उस्ताद थे। हालांकि उनकी भारत से निजी खुन्नस की भी एक बड़ी वजह थी। दरअसल उनके अग्रज 1971 की जंग में भारतीय सैनिकों द्वारा मारे गए थे। इसलिए उनका भारत से गिला करना कुछ हदतक सही भी माना जा सकता है। इसके साथ ही यह भी स्वीकार कीजिए कि पाकिस्तान में अब स्थिति यह बन गयी है कि अंतिम फैसला सेना ही लेती है। वहां पर प्रधानमंत्री तो एक नाम भर का ओहदा ही होता है। इसे हमने और दुनिया ने अयूब खान से लेकर जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ तक के दौर में देखा है। इन सेनाध्यक्षों ने जब चाहा निर्वाचित सरकारों का तख्तापलट कर दिया। हालांकि अब तो दुनिया बदल चुकी है। अब वैश्विक दबाव के चलते सेना भी निर्वाचित सरकार का तख्ता पलटने से बचती है। पर यह सच है ही कि पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व निर्विवाद है। इस पृष्ठभूमि में क्या हम पाकिस्तान आर्मी चीफ के प्रस्ताव को गंभीरता से ले लें? इस सवाल का उत्तर तलाश करने से पहले यह तथ्य जेहन में रखा जाए कि भारतीय सेना के पाकिस्तान की सरहद में घुसकर किए गए सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान सेना की बुरी तरह से टूट गई है। उसे अपनी और भारत की शक्ति का अहसास हो गया है। उसे मालूम चल गया कि अब भारत घर में घुसकर मार सकता है। उसका मनोबल पूरी तरह से टूट चुका हैढ्ढ कारगिल के दौर तक तो हम घुसपैठियों को निकाल भर रहे थे। अब हम दुश्मन को उसके घर में जाकर ढेऱ कर सकते हैं। अब हमारी शक्ति को चीन भी पूरी तरह जानने लगा है। डोकलम विवाद के दौरान उसने आक्रमक कदम आगे बढ़ाने के बाद एकदम से पीछे का रुख कर लिया था। तो पाकिस्तान सेना को अब भारत की शक्ति और साहस का पूरी तरह अहसास हो गया है। इसलिए उसकी तरफ से मैत्री का प्रस्ताव आ रहा है।
मैत्री के मार्ग में बाधा क्या
दरअसल दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने के रास्ते में पाकिस्तानी सेना और जैश-ए-मोहम्मद ने हमेशा अवरोध ही खड़े किए हैं। पंजाब के पठानकोटके एयरफोर्स बेस पर हुए हमलों के बाद जैश- ए- मोहम्मद के नेता मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी से यह बात सीधी तरह से साफ हो गई थी। जैश और पाकिस्तान सेना भारत को क्षति पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिशें करते ही रहे हैं। जैश को ताकत पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से ही मिलती है। आईएसआई पाकिस्तानी सेना का अहम अंग है। वहपाकिस्तानी सेना के इशारों पर ही काम करती है। आईएसआई चीफ को पाकिस्तान सेनाध्यक्ष को ही रिपोर्ट करना होता है। बीते कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तान सेना आईएसआई की तरफ से जैश सरीखे संगठनों को पंजाब मेंआतंकवादके दौर के बचे-खुचे गुटों को फिर से खड़ा करने की कोशिश करती रही है। आईएसआई की ख्वाहिश यही रही है कि जैश के आतंकी गुरदासपुर-पठानकोट-जम्मू सेक्टर में अपना खूनी खेल बढ़ाएं। कहते हैं कि भारतीय संसद पर हमले के बाद अपनी खूंखार छवि बनाने वाले जैश के पर आईएसआई ने कतरे थे। क्योंकि, इसके प्रमुख मौलाना मसूद अजहर ने पाकिस्तान सेना को ही चुनौती देनी शुरु कर दी थी। जैश- ए- मोहम्मद तो  लश्कर ए तोयबा से भी ज्यादा खतरनाक संगठन है।
पाकिस्तान आर्मी
आईएसआई और जैश की भारत विरोधी तिकड़ी जगजाहिर है। तो आखिकार अब क्या हो गया? अब यह तिकड़ी भारत से मेल-मिलाप क्यों चाहती है? ये तिकड़ी घनघोर भारत-विरोधी रही है। जनरल अयूब खान से लेकर राहील शरीफ सभी पाकिस्तान आर्मी चीफ भारत विरोधी ही रहे हैं।पाकिस्तान की सेना में पाकिस्तानी पंजाबियों का वर्चस्व साफ है। उसमें80 फीसद से ज्यादा पंजाबी हैं। ये भारत से नफरत घोर करते हैं। इस भावना के मूल में पंजाब में देश के विभाजन के समय हुए खून-खराबे को देखा जा सकता है।पाकिस्तान का पंजाब प्रान्त इस्लामिक कट्टरपन की प्रयोगशाला है। वहां पर हर इंसान अपने को दूसरे से बड़ा कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में ही लगा रहता है।
पाकिस्तान आर्मी ने अपने ही देश में चार बार निर्वाचित सरकारों का तख्तापलटा। अयूब खान, यहिया खान, जिया उल हक और परवेज मुशरऱ्फ नेपाकिस्तानी सेना को एक माफिया के रूप में विकसित करने में भरपूर मदद की है। देश में निर्वाचित सरकारों को कभी कायदे से काम करने का मौका ही नहीं दिया। जम्हूरियत की जड़ें जमने ही नहीं दीं। वर्ष1956 तक देश का संविधान तक नहीं बन पाया। जब बना भी तो चुनाव नहीं हो पाए और सेना ने सत्ता हथिया ली।पाकिस्तानी सेना ने देश के विश्व मानचित्र में सामने आने के बाद अहम राजनीतिक संस्थाओं पर भी अपना प्रभाव बढ़ाना शुरु कर दिया। भारत से खतरे की आड़ में हीपाकिस्तान में लगातार सैनिक शासन पनपता रहा है।1947 के बाद सेपाकिस्तान में लगभग तीस साल तक सैन्य शासन रहा और सेना ने शक्ति के केंद्रीयकरण को ही बढ़ावा दिया। जब सेना का शासन नहीं रहा, तब भी इस केंद्रीयकरण का प्रभाव बना रहा।
तो यह है भारत-पाकिस्तान संबंधों का सच। इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान आर्मी चीफ बाजवा ने भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। भारत इस प्रस्ताव पर खुले दिमाग से विचार तो करेगा ही। करना भी चाहियेढ्ढ दूध का जला छाछ भी फूंककर ही पीता है निश्चित रूप से कोई भी फैसला हड़बड़ी में तो नहीं ही लिया जाएगा। एक राय यह भी सामने आ रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालिया चीन यात्रा के बाद अब पाकिस्तान को यह लगने लगा है कि अब उसे भारत से मेल-मिलाप का रास्ता अपना ही लेना चाहिए। इसी में उसकी खैर हैढ्ढ चीन के शहर वुहान में राष्ट्रपति शी और पीएम मोदी ने जिस गंभीरता और आत्मीयता से चर्चा की उसे पाकिस्तान ने भी देखा। दोनों देश मानते हैं कि अब आपसी मसले हल करने के लिए युद्ध कोई विकल्प नहीं है।बेशक मोदी- शी के बीच हुई बैठक ने द्विपक्षीय संबंधों में एक नया सुखद अध्याय खोला है। बाजवा के वक्तव्य से लग रहा है कि भारत-चीन वार्ता से पाकिस्तान अब जाग गया है। उसे समझ में आ गया है कि अब भारत से संबंध सुधार लेने में ही उसे लाभ है।

आर.के. सिन्हा

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