दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिसके सब या कुछ बासिंदे अपने ऊपर आक्रमणकारी लुटेरों, अपहरणकर्ताओं के प्रति निष्ठावान हों भारत को छोड़कर। भारत में लुटेरों, अपहरणकर्ताओं की सत्ता के दौरान उनके इरादों और कृत्यों के प्रति अनुरक्ति यदि कुछ लोगों में रहे तो उसे उनकी विवशता माना जा सकता है, लेकिन एक सार्वभौमिक सर्वसत्ता सम्पन्न नागरिक भावना के आधार पर निर्मित एक संविधानयुक्त गणराज्य में यदि कोई ऐसे तत्वों के प्रति निष्ठा रखता है जो उसकी संस्कृति, परम्परा और पूर्वजों के प्रति हेय भावना रखता हो, उसकी देश बाह्य सत्ता के प्रति अनुकूलता हो तो क्या उसे विदेशी सत्ता को अत्याचारी आचरण के समान बर्दाश्त किया जाना चाहिए। हमारे देश में उदारवादिता का मुखौटा लगाये कट्टर रूढि़वादियों का देश विरोधी हरकतों को नजरअन्दाज कर दिए जाने का आहवान करने वालों की भी एक जमात है जो देश को खण्डित करने वालों की अभिव्यक्ति, दूसरे शत्रु देशों की जय जयकार, सामाजिक विषमता को बढ़ावा देने वालों को नजरन्दाज, शांति व्यवस्था को भंग करने के लिए हथियार उठाने वालों के प्रति उदार रहने की पैरवी करते हुए अपने आपको मानवाधिकारवादी आवरण में छिपाकर तोडफ़ोड़ को प्रोत्साहित करने वाले बौद्धिक जगत में अपनी शासकीय अनुकूलता का लाभ उठाकर अय्याशी का जीवन बिताते हुए समाज को दिशा देने वालों की श्रेणी में खड़े रहना चाहते हैं। ऐसे मानवाधिकारवादी जो वस्तुत: धिक्कारवादी हैं,अपनी वाचालता के सहारे समाज में एकता और समरसता के प्रयास को हेय बताकर जातीय या साम्प्रदायिक अथवा क्षेत्रीय भावनाओं को उभारते रहते हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के हस्तक.बनकर जिन लोगों ने स्वयं संग्राम से अंग्रेजों के खिलाफ मुखरित करने तक के लिए अपने को प्रस्तुत किया था, वे देश बाह्य निष्ठा के प्रभाव में आजादी के बाद भारतीयत्व..को हीनता युक्त साबित .करने के प्रयास से सत्ता की अनुकूलता से हावी हो गए लेकिन उनका मुखौटा उतरता गया। देश के अवाम ने उनको पहचान लिया। विभाजक लुटेरे और भारतीयत्व को दीनत्व दर्शाने वालों ने अपने मुखौटे के भीतर छिपाए मुस्लिम मानसिकता को नए रूप में उजागर करना शुरू कर दिया जिसको सेक्युलरिज्म का नाम दिया गया। इस नए मुखौटे के पीछे देशहित विरोधी आचरण, लूट, भ्रष्टाचार, कुशासन को छिपाने के प्रयास का भी पर्दाफास हो गया। अब उनका भरोसा बिखराववादियों को बढ़ावा देने के लिए विकृत मानसिकता को उभारने में हो गया है। इसलिए.चाहे पानी हो या सीमा , जातीय वर्गीकरण इन संवर्गों,संविधान के मूल मंत्र एक देश एक जन के लिए अनुकूल सबका साथ सबका विकास की उभारती भावनों को अपमानी बनाने के लिए विस्तार में इसी प्रकार बोलना शुरू कर दिया है। जैसे गांवों में खाफ होते हैं। एक जानवर ऐसा भी है जिसकी बोली के पीछे नगर के सभी हुआं-हुआं करने लगते हैं।
भारत की अस्मिता को चोट पहुंचाने की हरकतों को बर्दाश्त करते रहने की विवशता कब तक बनी रहेगी और इस विवशता की जकडऩ को बनाए रखने की दुश्वारियों को कब तक उदारता के नाम पर छुट्टा छोड़ा जाता रहेगा। पोषित आस्था के उत्सवों देश के प्रति निष्ठा के  प्रतीक गायन वन्देमातरम् को साम्प्रदायिक गान बताने वालों को बर्दाश्त करने जाने का परिणाम यह हो रहा है कि अब देश में देश का साम्प्रदायिक घृणा का उन्माद पैदाकर लाखों की हत्या करवाकर देश का बंटवारा कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति निष्ठावान बने रहने का आग्रह 1947 के पूर्व के समान एक वर्ष में स्थायित्व प्राप्त तथ्य के रूप में बने रहने पर तनाव बढ़ाने वाला घोषित करने वाला शोर भी सुनाई पडऩे लगा है। जिस जिन्ना ने भारत में अलग से मजहबी राज्य न बनाये जाने पर सीधी कार्यवाही की धमकी देकर पाकिस्तान बनवाया, उसकी याद को स्थायी आदर्श बनाए रखने के लिए महात्मा गांधी एवं अन्य महापुरुषों के चित्रों के बीच में स्थापित रखने का क्या औचित्य है? कहा यह जाता है कि चित्र 1936 में तब लगाया गया था जब उन्हें छात्रसंघ की मानद सदस्यता प्रदान की गई थी और क्योंकि यह पाकिस्तान बनने के पहले लगाया गया था, इसलिए उसे हटाने का कोई औचित्य नहीं है। अब तक जब इसको किसी ने आग्रह नहीं किया हो, अब क्यों किया जा रहा है। अंग्रेज यह पूछ सकता था कि वर्ष 1885 में कांग्रेस ने जब स्वराज्य की मांग नहीं की थी तो 1930 में पूर्ण स्वराज्य की मांग उठाने का क्या औचित्य है। जिन्ना भारत के एक जन एक देश का हमारी संवैधानिक मान्यता को खण्डित करने वाला व्यक्ति था, उसके प्रति जो निष्ठावान हैं, वे 1947 के पूर्व की लीगी मानसिकता के प्रतीक हैं जो आरक्षण की मांग में पृथकमतदान तक का आग्रही बन कर उभर रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद शाह जो द्विराष्ट्रवाद सिद्धान्त प्रणेता,पोषक और अंग्रेजी सत्ता से तादात्म्य बनाकर रखने के लिए सदैव आग्रही रहे हैं। उनकी भावना को हिंसात्मक तरीका अपनाकर मोहम्मद अली जिन्ना ने देश के विभाजन को उन लोगों की सहायता से अंजाम दिया था, जिनकी सत्ता बहुमत में आज भी भारत में ही रह रही हैं। उनमें एक देश एक जन जैसी सर्व समावेशी भावना की अभिव्यक्ति होने का दावा निरन्तर खोखला साबित होने के बावजूद उसे इनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं मजहबीहठ की स्वीकारोक्ति की आड़ में एक और विभाजन की राह पर चल पड़ा है। इस राह को पकडऩे वाले पहले इस्लामी आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम जिसने सिन्ध के राजा दाहिर की बेटियों अपहरण किया था, से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक को जिसने लाखों हिन्दुओं की हत्या करायी,अपना आदर्श मानते हैं। महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, औरंगजेब, नादिर शाह के प्रति निष्ठावान तो बने ही हैं। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते हैं और उसके पक्ष में खड़े होकर न केवल भारतीय सैनिकों पर पत्थर मारते हैं, बल्कि देश के बाहर चल रहे इस्लामी सत्ता की विश्वव्यापी स्थापना के लिए आतंकी बनकर हत्याओं को अंजाम देने वाले गिरोह में शामिल होना गौरव की बात समझते हैं। आजादी के पूर्व दंगे में बम विस्फोट, अपहरण कर धर्म परिवर्तन को अंजाम देने वालों की ऐसी जमात खड़ा कर रहे हैं, जो पृथकतावादी मानसिकता को बढ़ावा दे रहा है।  आम धारणा है कि यह भावना मुल्ला- फैला रहे हैं लेकिन अलीगढ़ विश्वविद्यालय जैसी आधुनिकतायुक्त विक्षिप्त लोगों का जो लगाव जिन्ना के जिन्न को लेकर प्रगट हुआ जिसकी अभिव्यक्ति जामिया...मीलिया के वाइस चांसलर तक ने की है। इस बात का सबूत है कि इस देश में पाकिस्तानी भावनायुक्त निष्ठा का व्याप्त संवैधानिक समानता की व्यवस्था के बावजूद तिरोहित .नहीं हुआ। सेक्युरिज्म के मुखौटे लगाकर जो  हरप्रकार का विभाजन, भ्रष्टाचार, और दुराचार के पोषक हैं वे सभी ऐसे तत्वों के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं। स्वराज्य लाने के लिए इन तत्वों से आर-पार की लोकतांत्रिक लड़ाई को सैनिक बनने की नितान्त आवश्यकता है। आजादी के लिए जो जद्दोजहद हुई थी उससे भी यही अधिक भारतीयता के प्रति आग्रह को नकारने वाले ही जिन्ना को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। इन संस्थाओं को पहचान कर उनको उनकी औकात पर लाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों ने जिन्ना के चित्र पर औचित्य -अनौचित्य की बहस को पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर  हमलेÓ की साजिशों मे का जो प्रयास किया है, वह मूल मुद्दे से ध्यान बंटाने का पहला प्रयास नहीं है। यदि हम सिंहावलोकन करें तो सेक्युलरिज्म का मुखौटा लगाये लोगों ने सदैव ऐसे ही मूल मुद्दे से भटकाकर विभ्रम पैदा करने का प्रयास किया है।

राजनाथ सिंह 'सूर्य'

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