माँ के नाम से ही राहत का अहसास होता है । जीवन मे शीतल छाया माँ ही तो जिसके सानिध्य में व्यक्ति अपने कर्मो को सपन्न करते हैं । माँ एक पहेली जैसी होती हैं जो गलतियां होने पर डांटती है और सहम जाने पर लुलार देती हैं । जब माँ डांटती है तो उसके उस व्यवहार में भी ममता की झलक देखने को मिलती है । गुस्सा होकर भले ही कितना भी कुछ कह दे पर शांत होने पर मना लेती है । माँ के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है क्योंकि यह तभी समझ आता है जब आप माँ से दूर रहते हैं । माँ एक कड़ी होती है जो आपको आपके परिवार से जोड़ती है । माँ के पास विनिमय नाम से कोई शब्द नहीं है वह तो केवल और केवल देना जानती है, लेना नहीं । 

                                          माँ की महत्ता मनुष्य ही नहीं भगवान भी समझते है,तभी तो समय समय पर भगवान इस धरा पर जन्म लेते हैं । चाहे वह कृष्ण, बुद्ध, मोहम्मद साहब या जीसस हो सभी ने माँ के गर्भ से जन्म लेकर संसार को ज्ञान दिया । माँ कभी भी अपनी संतानों में भेद – भाव नही करती चाहे एक बच्चा कितना भी श्रेष्ठ हो । माँ  का यही स्वरुप हमें कई बार देखने को मिला है चाहे यशोदा हो या चाहे और  कोई । माँ एक प्यारी सी कहानी है जिसका व्यवहार  कहानी में आये उतार – चढ़ाव की तरह है । 

माँ तो माँ होती है । भारतीय सभ्यता में माँ को कई रुप दिये है, पृथ्वी को धरती माँ, गाय को गऊ माता कहते है आदि । माँ में वो ताकत होती है जब आप उसके पास होते है तो असहनीय कष्ट भी क्षीण हो जाता है शायद इसलिए भगवान श्री राम ने लंका को छोड़ते हुए अपनी जन्मभूमि को चुना और लक्ष्मण से कहा –

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी । 

भगवान राम ने भी अपनी मातृभूमि को चुना । इससे सिध्द होता है कि माँ  सर्वोपरि होती है । माँ  शिशु की प्रथम गुरु होती है वो ही उसमें समाज एवं  पारिवारिक ज्ञान पैदा करने में मदद  करती है ।

माँ  सहनशीलता की निशानी होती है, बच्चे चाहे उसे जितना भी कष्ट दे वह उसे सहकर भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होती है । माँ  वही होती है जो जो आपको जीवन भर आलंब प्रदान करती है । आपकी विषम परिस्थितियों में  हमेशा आपके साथ  खड़ी रहती है । माँ का अर्थ क्या होता है इसका बोध तो सभी को होता है क्योंकि माँ ही है जो कभी जताती नहीं है । 

माँ का स्थान सबसे अलग और अनोखा होता है । माँ  कभी अन्नपूर्णा होती है तो कभी गौरा होती है तो कभी शक्ति । माँ का स्थान सभी वर्गो में  श्रेष्ठ होता फिर चाहे वह पशु -पक्षी हो  या जीव-जंतु । माँ को स्थानान्तरित करने वाला कोई शब्द नहीं है । माँ की महिमा का बखान तो सभी  करते हैं इससे भगवान भी अछूते नहीं है । 

(लेख: विनय कुशवाहा)

स्त्रोत: vinaysakt.wordpress.com

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