राष्ट्रपति  चुनाव के लिए प्रचार अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों पर नजर डालें, तो ईरान के साथ परमाणु करार तोडऩे का अमेरिकी फैसला कहीं से भी अप्रत्याशित नहीं है। हालांकि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन अंतिम क्षण तक ट्रंप को मनाने का प्रयास करते रहे कि भले ही कुछ बदलाव करने पड़ें, लेकिन अमेरिका को समझौते के साथ ही रहना चाहिए। लेकिन ट्रंप नहीं माने। आखिरकार यूरोपीय नेताओं ने एक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि वे समझौते से पीछे नहीं हटेंगे। जाहिर है, अमेरिका का यह फैसला नाटो सहयोगियों के बीच मतभेद का कारण बन गया है। दूसरी तरफ, ईरान ने भविष्य में भी समझौते की शर्तों के अनुसार अपने दायित्व का पालन करते रहने का भरोसा दिलाया है। रूस और चीन भी समझौते के साथ हैं। यानी इस घटनाक्रम से साझी व्यापक कार्ययोजना (जेसीपीओए) खासी  कमजोर तो जरूर हुई है, लेकिन खत्म नहीं हुई है।
ईरान परमाणु समझौता कोई द्विपक्षीय करार नहीं है। इस पर ईरान के साथ पी5+1 देश यानी अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने भी हस्ताक्षर किए हैं। समझौते को जुलाई, 2015 में प्रस्ताव 2231 के तहत सुरक्षा परिषद की मंजूरी भी मिल चुकी है। यह प्रस्ताव अब भी प्रभावी है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्र में उसकी गतिविधियों को समझौता तो?ने का आधार बनाया है। मगर मिसाइल कार्यक्रम तो सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का हिस्सा है। एक तर्क यह भी है कि सुरक्षा परिषद के स्वीकृत प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। रही बात ईरान के परमाणु कार्यक्रम की, तो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने भी माना है कि ईरान परमाणु समझौते के तहत अपने दायित्वों को बखूबी निभा रहा है।
बहरहाल, अमेरिका को सऊदी अरब और इजरायल का साथ मिला है। इससे क्षेत्र में तनाव ही बढ़ेगा। यह सही है कि इस्लामिक स्टेट का प्रभाव दिनोंदिन कम हो रहा है, पर सीरिया और यमन में उथल-पुथल अब भी जारी है। सऊदी अरब और कतर के बीच कायम तनाव के कारण खाड़ी देश भी बंटे हुए हैं। स्पष्ट है, तनाव में यह नया इजाफा किसी के हित में नहीं है। 
अमेरिका ने यह फैसला ऐसे वक्त पर लिया है, जब उसके मुखिया उत्तर कोरियाई शासक से मिलने की तैयारी कर रहे हैं। फैसले का यह वक्त उत्तर कोरिया को भी गलत संदेश दे रहा है, जो परमाणु क्षमता को अपनी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है।  जाहिर है, करार तोडऩे का असर अमेरिका का ईरान पर फिर से परमाणु प्रतिबंधों के रूप में दिखेगा। संभव है, तीन से छह महीने में ये प्रतिबंध लगा भी दिए जाएं। हालांकि ये बंदिशें एकतरफा ही होंगी, लेकिन इसका असर ईरान के साथ कारोबार करने वाले अन्य मुल्कों की कंपनियों पर भी पड़ेगा। ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाले तो सारे ही देश इससे प्रभावित हो सकते हैं। फिलहाल, ईरान 22 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है। पिछले दिनों बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में सुधार के मद्देनजर पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और रूस ने तेल-उत्पादन में कटौती पर सहमति जताई थी, मगर इससे आने वाले दिनों में तेल की कीमतें चढ़ेंगी ही। 
यह सच है कि अमेरिकी शेल तेल कंपनियां और अन्य ओपेक निर्यातक देश बाजार में ईरान की हिस्सेदारी पाटने का प्रयास करेंगे, लेकिन इस सबके कारण उत्पन्न हुआ अनिश्चय का माहौल बाजार में अस्थिरता पैदा करेगा। तेल कीमतों में वृद्धि वैश्विक आर्थिक सुधारों को भी प्रभावित कर सकती है। इसका असर तेल आयातक देशों के कारोबार और करेंट अकाउंट बैलेंस यानी चालू खातों पर पड़ेगा। फरवरी, 2016 में तेल की कीमत घटकर 27 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी, जो अब बढ़कर 70 डॉलर प्रति बैरल से पार चली गई है। ब्रेंट क्रूड भी अब 77.72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है।  ट्रंप का फैसला कई बड़े देशों के आर्थिक हितों को प्रभावित करने वाला है। प्रतिबंध हटने के बाद यूरोपीय कंपनियों ने तेजी से ईरान के बाजार का रुख किया था। एयरबस ने नागरिक विमानों की आपूर्ति के लिए 20 अरब डॉलर से भी अधिक का करार किया था, जिनमें से तीन पहले ही आ चुके हैं। हाल ही में, ईरान ने एटीआर एयरक्राफ्ट की डिलीवरी ली है। मर्सिडीज, वोल्वो, प्यूजोट जैसी कंपनियां वहां अपनी गाडिय़ां बेच ही नहीं रही हैं, बल्कि उन्होंने अपने निर्माण-कारखाने भी स्थापित कर लिए हैं। बोइंग ने भी 20 अरब डॉलर से अधिक बड़ा ऑर्डर हासिल किया है।  अमेरिकी फैसला ईरान की घरेलू राजनीति को भी प्रभावित करता हुआ दिख रहा है। 2017 के चुनाव में राष्ट्रपति हसन रूहानी भारी बहुमत से जीते। इसका एक कारण यह समझा जाता है कि उनकी विदेश नीति, खासकर परमाणु समझौता लोकप्रिय है। अब ईरान के नरम धड़े पर दबाव आ सकता है। रही बात भारत की, तो क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा में सुधार के लिए हम ईरान के साथ मिलकर काम करने को उत्सुक रहे हैं। चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए हमने ईरान के साथ समझौता किया है, ताकि अफगानिस्तान तक हमारी पहुंच सुनिश्चित हो सके। भारत अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर भी उत्सुक है, क्योंकि इससे मध्य एशिया और रूस के बाजारों तक पहुंचने में समय और संसाधन कम खर्च होंगे। तेल कंपनी ओवीएल (ओएनजीसी विदेश लिमिटेड) तो ईरान के साथ फरजाद-बी गैस फील्ड के विकास पर बातचीत कर ही रही है। ईरान चूंकि हमारे लिए भू-रणनीतिक महत्व रखता है, इसलिए हमें उसके साथ रिश्तों में निरंतरता बनाए रखने की जरूरत भी होगी। भारतीय प्रवक्ता ने इसीलिए जोर देकर कहा है कि ईरान के परमाणु मसले को संवाद व कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्वक हल किया जाना चाहिए। 
बहरहाल, ताजा घटनाक्रम कितनी दूर तक असर डालेगा, इसका पूरा अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। यह काफी कुछ समझौते से जुड़े रहने के तीनों यूरोपीय देशों के वादे पर निर्भर करेगा। यदि तीनों यूरोपीय देश इस समझौते पर टिके रहते हैं, तो राष्ट्रपति रूहानी को भी इस करार को जारी रखने के अपने फैसले पर कायम रहने में आसानी होगी, वरना उन पर इसे रद्द करने का दबाव बढ़ता जाएगा।         
(ईरान में भारत के पूर्व राजदूत)

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