कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक लाभ के लिए जिस प्रकार न्यायालय सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाया है, उसकी देशभर में निंदा हो रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग के प्रकरण में उपराष्ट्रपति से मुँह की खाने के बाद कांग्रेस को सर्वोच्च न्यायालय में भी पराजय का सामना करना पड़ा। यह भारतीय संविधान की ताकत है कि उसके कारण कांग्रेस न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार करने में सफल नहीं हो पा रही है। न्यायपालिका पर उसका प्रत्येक हमला नाकाम हुआ है। यह सुकून की बात है कि संविधान में हमारे देश की न्यायपालिका, विशेषतौर से उच्च न्यायिक पदों को सरकार के दमन और राजनीतिक दलों की साजिशों से बचाने के पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। हालाँकि, जब से रामजन्मभूमि मामले की सुनवाई तीव्र होने की बात सामने आई है, तब से कांग्रेस पूरी ताकत से न्यायपालिका को दबाव में लेने की कोशिश कर रही है। इसके लिए उसने असंतुष्ट न्यायाधीशों का भी उपयोग करने का प्रयास किया है। बहरहाल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल मुख्य न्यायाधीश के पीछे प्राणपण से पड़ गए हैं। पहले उन्होंने महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में लगभग ६५ कांग्रेसी और मोदी सरकार विरोधी सांसदों के हस्ताक्षर कराए। उसके बाद आधे-अधूरे आरोपों के आधार पर महाभियोग का प्रस्ताव लेकर उपराष्ट्रपति के पास पहुँचे। वह चाहते थे कि उपराष्ट्रपति महाभियोग पर विचार करने के लिए एक समिति बना दें, ताकि मुख्य न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय की जरूरी सुनवाइयों से अलग किया जा सके। किंतु, उपराष्ट्रपति ने संविधान प्रदत्त शक्ति के आधार पर महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। लेकिन, कांग्रेस ने इस पर भी राजनीति की। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के साथ उपराष्ट्रपति पर भी राजनीतिक हमला बोल दिया। कांग्रेस ने आरोप लगाए कि उपराष्ट्रपति ने नियमों से बाहर जाकर प्रस्ताव को खारिज किया। सोचिए, यदि उपराष्ट्रपति ने मामले को जाँच समिति के पास भेजने का निर्णय दे दिया होता, तो होता यह कि अपने बाकी के कार्यकाल के दौरान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को खाली बैठने को मजबूर होना होता (वह 2 अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं)। जिन महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा कर रहे हैं, वह मामले ठप पड़ जाते। उनमें से कम से कम एक मुकदमा, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ऐसा है, जिसे लेकर कपिल सिब्बल की ख्वाहिश यह है कि सुनवाई 2019 के चुनाव तक टल जाए, वो ख्वाहिश पूरी हो जाती। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय में पहुँची इस याचिका की सुनवाई के लिए जब मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ बना दी, तब फिर कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की नीयत सामने आ गई। वह इस याचिका की सुनवाई न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर की अदालत में ही करवाना चाहते थे। यहाँ स्पष्ट है कि उन्हें अपनी याचिका में शामिल सबूतों, तर्कों और तथ्यों पर भरोसा नहीं है, इसलिए वह मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेसवार्ता करने वाले न्यायाधीश की अदालत में ही मामले की सुनवाई चाहते हैं। न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर की अदालत में इस याचिका पर सुनवाई होती और निर्णय होता कि महाभियोग के प्रस्ताव पर उपराष्ट्रपति ने गलत निर्णय लिया है, तब जनता में अविश्वास का ही वातावरण बनता। किंतु, न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर जानते हैं कि याचिका में लगाए गए आरोपों में तथ्य और तर्क की उपस्थिति बहुत कमजोर है। इसलिए उन्होंने अपनी अदालत में कांग्रेस नेता सिब्बल के इस प्रकरण की सुनवाई नहीं की। न्यायाधीश चेलमेश्वर में यह निर्णय लेकर उचित ही किया। किंतु, उसके बाद कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने जिस प्रकार से अपनी गलती न मानकर न्यायपालिका पर ही हमला बोला है, वह बहुत निंदनीय है। कुल मिलाकर यह संविधान की बड़ी जीत है कि राजनीति उसकी व्यवस्था पर चोट नहीं कर सकी है। 

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