कर्नाटक  विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए हैं, सबने त्रिशंकु विधानसभा की ओर इशारा किया है। हालाँकि सभी सर्वेक्षण के नतीजे चुनाव में भाजपा को बड़ी पार्टी के रूप में उभरते हुए देख रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक भी इन्हीं सर्वेक्षण के नतीजों के साथ हैं। उनका भी यही मानना है कि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। किंतु, कर्नाटक की जमीन और वातावरण कुछ ओर ही संकेत कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रचार अभियान ने उस वातावरण को और अधिक अनुकूल बनाया है, जिसमें पूर्ण कमल के खिलने के आसार बन गए हैं। उत्तर कर्नाटक में 224 में से 104 विधानसभा सीटें हैं, इसे लिंगायत बहुल इलाका माना जाता है। उत्तर कर्नाटक को भाजपा का मजबूत गढ़ कहा जाता है। वहीं तटीय कर्नाटक, जहां 33 सीटें हैं और लिंगायतों की आबादी कम है, वहां भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला दिखता है। बेंगलुरु, जो राज्य का कॉस्मोपॉलिटन शहर माना जाता है, वहां पर 28 सीटें हैं। इनमें से 18 शहरी विधानसभा क्षेत्र हैं। यहां पर गैर कन्नड़ मतदाता ज्यादा तादाद में हैं। इसी वजह से इसे हिंदुत्व का गढ़ कहा जाता है। वहीं मैसूर इलाके में 59 सीटें हैं। यहां पर कर्नाटक के दूसरे मजबूत सियासी समुदाय वोक्कालिगा की संख्या काफी है। वोक्कालिगा समुदाय आम तौर पर जनता दल सेक्यूलर के साथ खड़ा होता आया है। इसकी वजह है पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी। यह भी ध्यान देना होगा कि पहले देवेगौड़ा भाजपा को समर्थन नहीं देने पर अड़े थे, किंतु अब उन्होंने संकेत दिए हैं कि वह भाजपा के साथ जा सकते हैं। उन्होंने यह अनायस नहीं कहा है, बल्कि उन्हें भी अब यह समझ आ रहा है कि प्रदेश में भाजपा बहुमत की ओर बढ़ रही है। अब वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का विचार कर लेना चाहिए। जनता में उनको लेकर आक्रोश है। उसका कारण है कि उन्होंने पिछले कुछ समय में भाषा और धर्म के नाम पर लोगों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया है। पहले उन्होंने कन्नड़ का विषय उठाकर कन्नड़ भाषायों और दूसरे भाषा-भाषियों में वैमनस्य पैदा करने का प्रयास किया। उसके बाद उन्होंने लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देकर धार्मिक चाल चली। किंतु, उनकी इस चाल से हिंदू समाज में सही संदेश नहीं गया। उनके इस कदम को हिंदू धर्म को तोडऩे के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही सिद्धारमैया ने पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-जनजाति और अल्पसंख्यकों को मिलाकर इंद्रधनुषी वोटबैंक बनाने की कोशिश की। इसे अहिंदा यानी अल्पसंख्यतरु, हिंदुलिदावारु और दलितारु का नाम दिया गया। ऐसे प्रयोग किताबी तौर पर तो बहुत आकर्षक लगते हैं, किंतु ये जमीनी तौर पर उतने कामयाब नहीं होते। एंटी-इन्कंबेंसी की वजह से सिद्धारमैया की सियासी चुनौती और बढ़ गई है। खास तौर से उन मौजूदा विधायकों की वजह से जो दोबारा उम्मीदवार बनाए गए हैं। इसके मुकाबले पिछले कुछ समय में भाजपा वहाँ मजबूत हो हुई है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं वहाँ पहुँच गए हैं और अपने कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे हैं। भाजपा ने वहाँ साढ़े पाँच लाख कार्यकर्ताओं का काडर खड़ा कर लिया है, जो राज्य के 55 हजार बूथों की निगरानी करेंगे। यह बूथ प्रबंधन ही इस समय भाजपा की ताकत बन गया है। इसलिए इस बात की कम ही संभावना है कि वहाँ त्रिशंकु विधानसभा बनेगी। भाजपा की स्थिति को देख कर तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि कर्नाटक में भी कमल खिल सकता है, यदि कोई अनावश्यक मुद्दा बीच में उठ कर खड़ा न हो जाए। 

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