अलीगढ़  मुस्लिम विश्वविद्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लगाई गई है? यह प्रश्न बहुत वाजिब है। यह आश्चर्य का विषय भी है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद तक भारत विभाजन के प्रमुख गुनहगारों में शामिल जिन्ना की तस्वीर एक शिक्षा संस्थान में सुशोभित हो रही है। मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ भारत विभाजन का ही गुनहगार नहीं है, बल्कि हजारों लोगों की हत्या का भी दोषी है। भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय के उपकुलपति तारिक मंसूर को पत्र लिखकर उचित ही प्रश्न पूछा है कि क्या मजबूरी है कि जिन्ना की तस्वीर विश्वविद्यालय में लगाई गई है? उन्होंने पत्र में यह भी कहा है कि अगर वह विश्वविद्यालय में कोई तस्वीरें लगाना चाहते हैं तो उन्हें महेंद्र प्रताप सिंह जैसे महान लोगों की तस्वीर संस्थान में लगानी चाहिए, जिन्होंने विश्वविद्यालय बनाने के लिए अपनी जमीन दान में दी थी। भाजपा सांसद के इस पत्र ने दो काम किए हैं- एक, देश की जनता को यह बता दिया कि हमारे यहाँ कुछ शिक्षा संस्थान ऐसे भी हैं, जहाँ भारत के गुनहगार अब भी सम्मान पा रहे हैं। दो, इस प्रकरण पर मचे हो-हल्ला ने एक बार फिर भारत विरोधी और पाकिस्तान प्रेमी गैंग को देश के सामने ला दिया है। इस प्रकरण पर तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी पूरी निर्लज्जता से जिन्ना की तस्वीर का बचाव कर रहे हैं। उनका एक तर्क है कि विश्वविद्यालय के छात्रसंघ ने मोहम्मद अली जिन्ना को आजीवन सदस्यता दी थी, इसलिए उनकी तस्वीर 1938 में संस्थान में लगाई गई थी। तस्वीर छात्रसंघ के हॉल में लगी है, इसलिए उसे हटाने का कोई तुक नहीं बनता। यह तर्क वही लोग दे रहे हैं, जो हिंदू महासभा द्वारा नाथूराम गोडसे की तस्वीर लगाने का विरोध करते हैं। हिंदू महासभा के लोग गोडसे को अपना नेता मानते हैं, वह अपने निजी भवन में भी उनकी तस्वीर लगा लेते हैं तो देश में कोहराम मच जाता है। जब आपको निजी भवन में भी गोडसे की तस्वीर मंजूर नहीं है, तब आप एक शासकीय शिक्षा संस्थान में भारत विभाजन के गुनहगार की तस्वीर का पक्ष किस मुँह से ले रहे हैं? मुस्लिम लीग की स्थापना के पहले जिन्ना का विचार क्या था? कट्टरपंथियों की गिरफ्त में आने से पहले जिन्ना सेकुलर था या नहीं? यह अलग विषय हैं। जिन्ना के प्रारंभिक जीवन के आधार पर उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। विभाजन का दंश भोगने वाले एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की छवि को सर्वाधिक नुकसान जिन्ना प्रकरण ने ही पहुँचाया था। देश की जनता किसी भी सूरत में नहीं चाहेगी कि भारत में उस व्यक्ति के प्रति कोई सहानुभूति व्यक्त करे, जिसके कारण सीमारेखा के दोनों ओर की भूमि रक्त से लाल हो गई थी। हम शिक्षा परिसरों में उन महापुरुषों की तस्वीर सजाते हैं, जो हमें प्रेरणा देते हैं, जिनका बलिदान/योगदान हमें देशप्रेम सिखाता है। आखिर जिन्ना की तस्वीर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को किस बात की प्रेरणा दे रही होगी? उत्तरप्रदेश सरकार को सख्ती दिखाते हुए भारत विभाजन के गुनहगार की तस्वीर बिना देरी विश्वविद्यालय से हटवानी चाहिए। इस प्रकरण पर राजनीति कर रहे और जिन्ना की तस्वीर का समर्थन कर रहे लोगों को भी एक बार विचार करना चाहिए कि वह कहाँ खड़े हैं?  

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