जम्मू-कश्मीर में जिन पत्थरबाजों का पक्ष मानवाधिकार और सेकुलर समूह लेता है, उन्होंने बीते दिन शोपियां इलाके में कायराना और नीचता भरे काम को अंजाम दिया है। दक्षिण कश्मीर के शोपियां इलाके में पत्थरबाजों ने एक स्कूल की एक बस पर हमला बोला। इस बस में 50 बच्चे सवार थे। मासूम बच्चों की चीख से भी पत्थरबाजों का हृदय नहीं पसीजा। किसी क्रूर अपराधी की तरह उन्होंने पथराव जारी रखा। इस पथराव में कई बच्चे गंभीर घायल हुए हैं। यह ध्यान रखना होगा कि पत्थरबाजी की यह घटना दिन में 9 बजकर 25 मिनट पर हुई। इसलिए यह तो साफ है कि पत्थरबाजों को यह देखने में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी कि वह जिस बस पर हमला कर रहे हैं, वह स्कूली बच्चों की बस है। वह सामान्य सवारी बस नहीं थी। पत्थरबाजों की इस हरकत से यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी संवेदनाएं जम्मू-कश्मीर को लेकर नहीं हैं। वह भाड़े के पत्थरबाज हैं। पाकिस्तान और आतंकवादी समूहों से पैसा और आदेश पाकर वह पत्थरबाजी करते हैंं। पैसे के लिए वह अपने लोगों को भी निशाने पर ले सकते हैं। हमें पाकिस्तान के पेशावर की घटना को याद करना चाहिए। वहाँ अपने मन की बातें पूरी नहीं होने पर आतंकवादियों ने फौजियों के बच्चों को भी नहीं छोड़ा था। इसकी एक मिसाल 16 दिसंबर, 2014 को पेशावर में आर्मी स्कूल पर तालिबानियों ने हमला बोला था। हमले में 140 छात्र मारे गये थे। इस हमले में पाकिस्तान की एसएसजी (स्पेशल सर्विस ग्रुप) की भागीदारी थी। एसएसजी के मुदस्सर इकबाल ने एक वीडियो में स्वीकार किया कि पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए हमले में उसने हिस्सा लिया था। आतंकवाद का अड्डा बन चुके पाकिस्तान की फौज ने अपने बच्चों की मौत से कोई सबक नहीं लिया। संभवत: उनके लिए आतंकवाद के विरुद्ध खड़ा होना मुश्किल होगा, क्योंकि पाकिस्तान अब आतंकवाद का पर्याय बन गया है। आतंकवाद के चंगुल में बुरी तरह फंसा है, उससे निकलना उसके लिए आसान नहीं है। किंतु, जम्मू-कश्मीर की स्थिति अभी ऐसी नहीं है। इसलिए इस क्रूरतम घटना के बाद जम्मू-कश्मीर के लोगों को समझ लेना चाहिए कि यह पत्थरबाज उनके लिए ही खतरा बन रहे हैं। उनको संरक्षण देने से आम कश्मीरियों को पीछे हटना चाहिए। कश्मीर घाटी और खासतौर से दक्षिण कश्मीर कट्टरपंथी भावनाओं की जकड़ में है। हुर्रियत के रुढि़वादी नेता पाकिस्तान के आईएसआई की शह पर बरसों से नौजवानों को बरगलाने के काम में लगे हैं। इन नेताओं को अपने काम में कट्टरपंथी मौलानाओं से मदद मिलती है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं में तेजी आयी है। अवंतीपोरा और श्रीनगर के डल झील में पर्यटन बसों और कैब पर पत्थरबाजी हुई है। इस साल अप्रैल में श्रीनगर में पत्थरबाजी की घटना में सीआरपीएफ के दो जवान मारे गये और तीन घायल हुए, इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है? पूर्व में सरकार ने पत्थरबाजों को माफी दी थी, ताकि वह ठीक राह पर लौट सकें। लेकिन, पत्थरबाजों ने अपनी प्रवृत्ति नहीं बदली। पत्थरबाजों से निपटने के लिए कठोर कदम ही उठाने होंगे। 

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