प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक चुनाव प्रचार की शुरुआत बहुत जोरदार ढंग से की है। अपने पहले ही दौरे में उन्होंने तीन रैलियों को संबोधित किया और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर जोरदार हमला किया। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया है। राहुल गांधी की क्षमता को भी प्रश्रांकित किया है। कर्नाटक चुनाव प्रचार अब गति पकड़ेगा और वहाँ का परिदृश्य भी बदलेगा। अब तक आए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों का आकलन है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बहुमत से दूर रहेंगे। भले ही भाजपा बहुमत से दूर रहेगी, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार अभियान में उतरने के बाद यह आकलन बदल सकता है। प्रधानमंत्री मोदी माहौल बदलने के लिए जाने जाते हैं। अगले आठ दिन में वहां वह 12 और रैलियां करने वाले हैं। मोदी की इन रैलियों के साथ ही राज्य में चुनाव प्रचार अपने आक्रामक दौर में प्रवेश कर चुका है। इन चुनावों की एक खास बात यह भी है कि इनमें मोदी को प्रतिपक्षी खेमे में अतीत की अपनी ही चुनावी शैली की परछाई दिख सकती है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वे वहां के विधानसभा चुनावों में केंद्र के बरक्स गुजरात गौरव का मसला जोर-शोर से उठाते थे। इस बार कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरामैया कर्नाटक में यही रणनीति अपनाते दिख रहे हैं। केंद्र की सरकार के मुकाबले में वह क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल को चुनाव की धुरी के तौर पर पेश करने की कोशिश में हैं। लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग एक स्वतंत्र धर्म की मान्यता देने की घोषणा करके उन्होंने भाजपा के वोटबैंक में सेंध लगाने की जो कोशिश की। उसका दावा है कि यह दांव कांग्रेस के किसी काम नहीं आएगा, लेकिन मतदान से पहले इस बारे में कोई भी पक्के तौर पर क्या कह सकता है? यह भी साफ दिख रहा है कि भाजपा ने भले ही येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर रखा है, पर चुनाव वह पूरी तरह प्रधानमंत्री मोदी के पीछे खड़े होकर ही लड़ रही है। खुद येदियुरप्पा ने भी पिछले दिनों कहा कि उनकी पार्टी शानदार जीत इसलिए हासिल करेगी क्योंकि प्रदेश में मोदी लहर चल रही है। यह भी महत्वपूर्ण है कि देवगौड़ा और कुमारस्वामी की अगुआई वाली जेडीएस भले ही अपना पूरा जोर लगा रही हो, पर लड़ाई को तिकोना वह नहीं बना पा रही। कुछेक सीटों पर जेडीएस और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई जरूर है, पर जेडीएस और भाजपा में मुख्य लड़ाई बताई जा सके, ऐसी एक भी सीट खोजना मुश्किल है। मतलब यह कि चुनाव बाद के समीकरण चाहे जैसे भी बनें, चुनाव से पहले जेडीएस की भूमिका भाजपा विरोधी वोटों में हिस्सा बंटाने तक ही सीमित है। चुनावी बिसात पर चालें इसी वर्तमान और संभावित समीकरण को ध्यान में रख कर चली जा रही हैं। नतीजा 15 मई को पता लगेगा, पर भाजपा और कांग्रेस, दोनों के ही लिए यह साल की सबसे कठिन लड़ाई है। 

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