कठुवा में जो साक्ष्य लोगों को नहीं बताये गए उनको हमने आपको बताया आज इस कड़ी में हम बताएंगे आपको आगे की कहानी कुछ तथ्य जिन पर से परदा उठाना अभी बाकी है. आज हम आपको चार्जशीट के वो झोल बताने जा रहे हैं जिनको देखकर साफ लगता है की पुलिस ने किस तरह से मामले को तोड़ा और मरोड़ा और इसके बाद चार्जशीट बनाई कठुवा से अश्वनी मिश्र की रिपोर्ट की दूसरी किश्त :

चार्जशीट में लिखा है . .. और तथ्य कहते हैं

13 जनवरी को विशाल जंगोत्रा ने सुबह 8 बजे के बाद बच्ची का बलात्कार किया।

गांव के सरपंच रहे कांत शर्मा ने इस बात को सिरे से खारिज किया हैं। वे बताते हैं कि पुलिस जिस दिन की घटना दिखाकर गांव के लोगों को फंसा रही है, उस दिन लोहड़ी थी। लोग सुबह से आरती-पूजन करने आने लगे थे। इसके अलावा एक दिन पहले से ही भंडारे की तैयारी चल रही थी और अगले दिन भंडारा हुआ था। तब इसी कमरे में दर्जनों व्यक्तियों का आना-जाना रहा और हरेक चीज का उपयोग हुआ। ऐसे में कोई यह कैसे कह सकता हूं कि उस दिन बलात्कार हुआ बिल्कुल झूठ है।

वाहन नहीं मिला तो जंगल में फेंका शव।

जिस जगह पर बच्ची का शव मिला, सांझीराम का घर उससे बमुश्किल 80 मीटर की दूरी पर है और यहीं से 80 मीटर लगभग देवस्थान है। कोई भी अपराधी किसी का बलात्कार और हत्या करने के बाद शव को अपने घर के बिल्कुल नजदीक क्यों फेंकेगा?

मंदिर में बच्ची का सिर्फ एक बाल।

गांव के लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही। गांव के लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब लड़की को दो-तीन दिन तक मंदिर में रखा गया तो वहां क्या सिर्फ एक बाल ही मिलेगा! क्या यह संभव है? इससे षड्यंत्र का संदेह और ज्यादा गहरा हो रहा है।

तीन दिन तक मासूम बच्ची को रखा गया देवस्थान में।

देवस्थान के तीन दरवाजे हैं। दो बड़ी खिड़कियां और चार बड़े रोशनदान। अंदर बाबा कालीवीर, बाबा सुरगल, राजा मंडलीक, बाबा बिरफा नाथ जैसे कुल देवता विराजित हैं। डोगरा समुदाय में इन देवताओं की बड़ी मान्यता है। इसके अलावा देवस्थान स्थित कमरे की चाबियां दो गांवों के लोगों के पास रहती हैं। रसाना और पाटा गांव। रसाना में करीब 25 परिवार रहते हैं और पाटा में भी यही स्थिति है। इन गांवों के लोग सुबह 6 बजे से लेकर 10 बजे और पूजा शाम 6 बजे से 9 बजे तक पूजा करने आते रहते हैं। ऐसे में तीन दिन तक बच्ची को छिपाए रखने की बात गले से नहीं उतर रही।

सांझीराम ने बच्ची को अपनी पशु बांधने की जगह पर भी रखा।

सड़क से बिल्कुल सटे दो कमरे हैं, जिसमें (दार्इं ओर) भूसा रखने के लिए दड़बा जैसा बना हुआ है, जिसका प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि कुछ घंटों में ही किसी का दम फूलने लगे। इसके अलावा पशु बांधने की यह जगह प्रवेश द्वार से बार्इं ओर बिल्कुल खुली है। आस-पास रिहाइश है। हल्की-सी आवाज भी सारा राज खोल देती है। ऐसे में गांव के सरपंच रहे कांत शर्मा इस पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि जब पुलिस जांच कर रही थी तब उसने अपनी रिपोर्ट में इसी दड़बेनुमां कमरे में बच्ची को रखने का जिक्र किया था लेकिन जैसे ही जांच अपराध शाखा के हाथ में आई उसने प्रवेश द्वार के बार्इं ओर बने कमरे में बच्ची रखने की बात दर्ज की है और अपना ताला जड़ दिया।

चार्जशीट के सम्बन्ध में वहां के एक पुलिस अधिकारी ने नाम न देने की शर्त पर यह भी कहा कि चार्जशीट किसी उपन्यास से कम नहीं है। कहानी बड़ी अच्छी तरह गढ़ी गई है। तकनीक रूप से चार्जशीट के केन्द्र में घटना होती है। लेकिन इसमें बाहरी चीजों को प्रमुखता दी गई है। जैसे पीड़ित का मजहब, ‘गुज्जर-बक्करवालों को भगाने की साजिश चल रही थी आदि।’ यहाँ सवाल उठता है कि पुलिस ने इस तरह की चार्जशीट क्यों बनाई. अब जब चार्जशीट पर सवाल उठ रहे हैं तो सरकार और उसके मंत्री सीबीआई जाँच से क्यों बचना चाह रहे हैं. रसाना के ही रिंकू शर्मा (35)अपने पूरे घर के साथ धरने पर बैठे हुए हैं। वे कहते हैं कि यह अपराध का मामला है। कोई भी व्यक्ति ऐसा घृणित अपराध करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए। यहां बैठा हरेक व्यक्ति चाहता है कि उस बच्ची को न्याय मिले। लेकिन यहां तो मामले को मजहबी रंग दिया जा रहा है। पुलिस से लेकर मुख्यमंत्री तक ने इसे सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां का प्रशासन देश में यह फैला रहा है कि कठुआ की जनता आरोपियों के पक्ष में है, जो सरासर गलत है। हमारी इतनी ही मांग है कि घटना की सीबीआई से निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि सच सामने आए और जो वास्तविक दरिंदे-हैवान हैं, उन्हें फांसी की सजा हो।’’ क्या केन्द्रीय एजेंसी की जांच मांगना अपराध है? जम्मू अधिवक्ता संघ और कठुआ अधिवक्ता संघ ने घटना की सीबीआई जांच कराने के लिए पिछले दिनों जम्मू बंद का आह्वान किया था। इसे लेकर कई जगह प्रदर्शन भी हुए। प्रदर्शन और बंद शासन-प्रशासन का कहना है कि यह तो आरोपियों के समर्थन में लोग अपनी राजनीति चमका रहे हैं। यहां तक कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस पर कहा था,‘‘शर्म की बात है कि ये लोग बलात्कार के मामले में राजनीति कर रहे हैं। वे बच्ची के साथ न्याय होते नहीं देखना चाहते।’’ जबकि हकीकत में अधिवक्ताओं ने जम्मू बंद का आह्वान घटना की सीबीआई जांच, जम्मू से रोहिंग्याओं को निकालकर कहीं और बसाने एवं सरकार द्वारा जनजातीय नीति पर एक आदेश को वापस लेने के लिए किया था। जम्मू अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष बी.एस.सलाथिया घटना के बारे में बताने से पहले मीडिया को कठघरे में खड़ा करते हैं। वे कहते हैं,‘‘मीडिया ने जम्मू के अधिवक्ताओं की भूमिका ऐसी दिखाई जैसे वे आरोपियों का समर्थन कर रहे हों।

जब चार्जशीट को लेकर असंतुष्ट लोग सीबीआई जाँच की मांग कर रहे हैं तो मुफ्ती सरकार ऐसा करने के लिए तैयार क्यों नहीं हो रही ? यहां तक की सीबीआई जांच की मांग पर राज्य के लोकनिर्माण मंत्री और पीडीपी के आधिकारिक प्रवक्ता नईम अख्तर स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि क्या किसी घटना के अपराधी और उनके समर्थक कौन तय करेंगे कि अपराध की जांच करेगा। इसलिए इस घटना की सीबीआई जांच की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके शब्दों से साफ है की वह बिना जांच हुए ही आरोपियों को दोषी मान चुके हैं.

राज्य में पहले भी कई मामलों को सीबीआई के सुपुर्द किया गया है। जैसे-6 जनवरी,1993 को सोपोर में बीएसएफ की 94 बटालियन पर 46 नागरिकों की हत्या के आरोप लगे थे, जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। ऐसे ही 2009 में शोपियां में दो महिलाओं की हत्या और बलात्कार के आरोप सुरक्षाबलों पर लगे थे, जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। 2000 में पथरीबल में फर्जी मुठभेड़ के आरोप को लेकर और 1998 में पुंछ में 18 लोगों की हत्या के मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया गया था। स्थानीय लोग सवालिया लहजे में पूछते हैं तो फिर इस मामले में ऐसा क्या है जिसे मुख्यमंत्री महबूबा सीबीआई के सुपुर्द नहीं करना चाहती हैं? ऐसा नहीं है की राज्य में पहले कभी किसी मामले की सीबीआई जांच नहीं हुई. कई मामलों की जांच भी हुई और लोगों को न्याय भी मिला लेकिन इस मामले में सीबीआई जांच से बचने की कोशिश और पुलिस की चार्जशीट पर उठती उंगलियां किसी गहरी साजिश की तरफ इशारा करती हैं.

विदेश