मैं जानता हूं कि वामपंथी संसदीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं करते यह मेरा नहीं बल्कि बाबासाहब भीमराव अंबेडकर का कहना है। अंबेडकर जी अपनी तमाम उम्र उन कुरीतियों से लड़ते रहे जिन्हें इस समाज और देश में होना ही नहीं चाहिए था। वे हमेशा एकता, अखंडता, समरसता, भेदभाव और छुआछूत से रहित समाज की कामना करते थे। उन्होंने अपने देश के प्रति सदा समर्पण का भाव रखा। भारत की क्षति को अपनी क्षति स्वीकार किया है। वे तब भी आहत हुए थे जब भारत का विभाजन किया जा रहा था और तब जब इस देश में छुआछूत और भेदभाव जैसे से असामाजिक मुद्दे व्याप्त थे।

अंबेडकर एक प्रतिभावान, कुशाग्र बुद्धि के धनी थे वे चाहते तो आसानी से किसी उच्च पद नौकरी करते परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया सदैव अपने समाज,धर्म और इस देश के लिए आंदोलन किया ताकि देश की आन-बान-शान को नुकसान न पहुंचे।डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय के खंड 5 में लिखा है, 'डॉ. अंबेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।

अंबेडकर जी हमेशा से कुरीतियों जिनमें छुआछूत और भेदभाव था इसके खिलाफ थे जो हिन्दु धर्म को कलुषित कर रहा था। वे हमेशा से ही दलित के लिए संघर्ष में इस बात को उठाते रहे कि उन्हें सार्वजनिक पेयजल स्त्रोतों पर जाने की स्वतंत्रता हो, मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति हो। संघ भी इसी विषय पर कार्य कर रहा है 'एक मंदिर, एक कुंआ, एक श्मशान'। इस विचारधारा के साथ समाज को सदैव आगे बढ़ाया जा सकता है साथ ही साथ समरसता की भावना को समाज में बनाया जा सकता है।

आज से लगभग 70 साल पहले अंबेडकर जी ने अनुच्छेद 370 को हटाने की बात कही थी परंतु किसी ने भी उनकी इस विषय पर ध्यान नहीं दिया। वे चाहते थे कि यह देश अखंड रहे ताकि इस देश के सभी नागरिक सुरक्षित रहे। आज 2018 में भी इसी बात को लेकर बहस जारी है कि हमें 370 को हटाना चाहिए। संघ भी देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए इस प्रकार की कामना करता है।

सीधे-सीधे तौर पर देखा जाए तो संघ और अंबेडकर जी के बीच में एक समानता जरूर दिखाई देती है। छुआछूत, भेदभाव और जाति व्यवस्था को खत्म करना। जिस प्रकार संघ किसी प्रकार से जाति को मानने से इंकार करता है ठीक उसी प्रकार अंबेडकर जी जातिप्रथा के विरोधी थे। वे हिन्दु धर्म के किसी भी प्रकार से विरोधी नहीं थे। यदि वे हिंदु धर्म के विरोधी होते तो वे बौद्ध धर्म को क्यों चुनते जबकि उनके सामने इसाइयत और मुस्लिम धर्म के विकल्प खुले थे। उन्होंने अपने जितने भी आंदोलन किए सभी असामाजिक मुद्दों को लेकर किए गए थे।

संविधान में एक समान सिविल संहिता की बात कही गई है जिसमें सभी नागरिकों समान अधिकारों दिए जाने का वादा है। यह सब संभव हो सका है डॉ अंबेडकर के कारण वे चाहते थे कि देश के हर वर्ग तक अधिकार पहुंचे। इसी कारण उन्होंने समाज के पिछड़े लोगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान की बात कही है। संघ भी यूनिफार्म सिविल कोड की बात करता है।

आज संस्कृत का लोहा पूरा विश्व मान रहा। संस्कृत के विषय में नई-नई रिसर्च सामने आ रही है किसी संस्कृत को कम्प्यूटर की सरलतम भाषा के रूप में बताया है तो कोई इस भाषा सर्वाधिक वैज्ञानिक बताता है। बाबासाहब को भी संस्कृत से लगाव था।10 सितंबर 1949 को डॉ. बीवी केस्कर और नजीरूद्दीन अहमद के साथ मिलकर बाबा साहब ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह पारित न हो सका। यह तो हमारे देश की विडंबना है कि सारी भाषाओं की जननी का ही सम्मान नहीं हो रहा है। संघ भी चाहता है कि हमारे देश की भाषा संस्कृत हो जो हमें और ज्यादा सुसंस्कृत कर सके।

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