डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक जाना-माना नाम, जिन्हें हम बाबा साहेब के नाम से भी जानते हैं। डॉ. अम्बेडकर समानता और ज्ञान के प्रतीक थे। वे प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने नये भारत की परिकल्पना की थी। बाबा साहेब ने निर्धन और वंचित वर्ग का सदैव ध्यान रखा और उन्हें समानता का दर्जा दिलाने की निरंतर कोशिशें की।  बाबा साहेब ने देश के युवा वर्ग को शिक्षा हासिल करने का महत्वपूर्ण सूत्र दिया। साथ ही पढ़ों और पढ़ाओं के उद्देश्य से शिक्षा के महत्व को सर्वोपरि रखा। वे राष्ट्रीयता के महानायक होने के साथ ही कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने आर्थिक रूप से विपन्न और शोषित समुदाय में सामाजिक न्याय के लिये एक चेतना पैदा की, जिससे वे गरीबों के मसीहा के रूप में पहचाने गये।
प्रेरणादायी जीवन : बाबा साहेब ने देश की राष्ट्रीय एकता को हमेशा ध्यान में रखा और भाईचारा और सद्भाव की सीख दी। उनके जीवन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिये। वे राष्ट्रहित के लिये देश विभाजन के लालच में भी नहीं आये। उन्होंने अपने लिये नहीं हमेशा देश हित में निर्णय लिये। बाबा साहेब ने लोकतंत्र का मूल अधिकार हमें दिया और स्वतंत्रता की सीमा भी एक निश्चित दायरे में दी। बाबा साहेब ने देश को जोड़े रखा। उन्होंने जातिगत समन्वय, भाषाई समन्वय स्थापित किया। देश की अलग-अलग वेश-भूषा और मान्यताओं को जीवित रखा और पूरब से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक सबकी भावनाओं की कद्र की।
मैं मानता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर नये विचारों को अपनाने के हिमायती थे। इसीलिये उन्होंने संविधान में उल्लेखित प्रावधानों में सभी के लिये सम्मान, एकता, स्वतंत्रता, अधिकार और नागरिक अधिकारों पर विशेष जोर दिया।
संविधान निर्माता : भीमराव साहेब को जब 30 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के नये संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया, तब उनके सामने संविधान का प्रारूप तैयार करने का चुनौतिपूर्ण काम था। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के रात-दिन मेहनत कर समता, स्वतंत्रता, बन्धुता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार किया। संविधान पर सरकार की मोहर लगने के बाद 26 जनवरी 1950 से भारतीय संविधान लागू हुआ और एक नये युग की शुरूआत हुई।
विचार शक्ति के धनी : बाबा साहेब का व्यक्तित्व एक सामाजिक विचारक के रूप में था। वे सामाजिक चिंतन, नारी सशक्तिकरण, दलितों का उत्थान सहित राजनैतिक, संवैधानिक, आर्थिक, धार्मिक विचारक थे। बाबा साहेब के पास असीम शक्ति थी। यह शक्ति पद और सत्ता की नहीं अपितु विचार की थी। इस शक्ति को उन्होंने अपने या अपने परिवार के लाभ में नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज विशेष रूप से गरीब, असहाय और कमजोर लोगों के कल्याण में लगाया। 
नारी की स्थिति को समाज की प्रगति का मापदंड माना : डॉ. अम्बेडकर की मान्यता थी कि नारी की प्रगति के बिना समाज की प्रगति संभव नहीं है। वे समाज में नारी की स्थिति को समाज की प्रगति का मापदंड मानते थे। उनका कहना था कि 'मैं किसी समाज की प्रगति इस आधार पर मापता हूँ कि उस समाज में नारी ने किस सीमा तक प्रगति की है।Ó बाबा साहेब नारी संगठन के बहुत हिमायती थे। उनका विश्वास था कि एक बार नारी को समझ में आ जाये तो समाज की बुराइयों को दूर करने और समाज को सुधारने में वे बहुत सहायक सिद्ध होंगी। इसलिये वे स्त्रियों को पुरुषों के साथ लेकर चले। उन्हें स्त्रियों के प्रति चिन्ता थी इसलिये उनका कहना था कि बच्चों को विवाह बंधन में तब तक नहीं बाँधे जब तक वे आर्थिक जिम्मेदारियों को वहन करने में समर्थ न हो जाये। उन्होंने स्त्रियों को समाज की प्रगति का दर्पण भी कहा।  उनका मानना था कि विवाह और सम्पत्ति पर अधिकार संबंधी प्रचलित कानूनों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाये बिना नारी की मुक्ति संभव नहीं है। इसके लिये उन्होंने एक व्यापक सामाजिक विधान की रूपरेखा निर्मित की, जिसे हिन्दू कोड बिल के नाम से जाना जाता है। महिलाओं को मानवीय अधिकार दिलाने के लिये यह बिल संसद में उन्होंने पेश किया और भारी विरोध के कारण संसद में बिल पारित नहीं हो पाया। इसके बाद दु:खी मन से बाबा साहेब ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 
व्यक्ति पूजा के विरोधी : डॉ. अम्बेडकर के व्यक्तित्व की जिस सबसे खास बात पर आज हमारा ध्यान नहीं जाता, वह है उनका व्यक्ति-पूजा का विरोधी होना। उन्होंने लोगों को नायक-पूजा से दूर रहने की सलाह दी। उनका मानना था कि सदियों से चले आ रहे इस दुर्गुण से हमारे देश और समाज को भारी नुकसान हुआ। उनका कहना था कि व्यक्ति विशेष के प्रति अत्याधिक आदर का भाव जनता के आत्म-विश्वास को कम कर देता है। संकट के समय यदि कोई नेता नहीं दिखे तो जनता एकदम पंगु हो जाती है। वे नहीं चाहते थे कि जनता एक व्यक्तित्व पर निर्भर होकर रह जाये। जनता अपना उद्धार स्वयं अपने प्रयासों से करे। इससे यह प्रमाणित होता है कि वे समूह की शक्ति के हामी थे, जिसे भारतीय मनीषा के मूल तत्वों में से एक माना जाता है।
अपनी ही कसौटी पर खरे उतरने वाले महापुरुष : डॉ. अम्बेडकर की माने तो महापुरुष कहलाने का अधिकार उस व्यक्ति को है, जो सामाजिक उद्देश्य से प्रेरित होकर काम करे। समाज की बुराई और गंदगी को दूर कर निर्मल वातावरण बनाये। ऐसा व्यक्ति ही समाज में आदर और श्रद्धा का सही पात्र होता है। डॉ. अम्बेडकर नि:संदेह अपने ही द्वारा निर्धारित कसौटियों पर कसे जाने वाले महापुरुष सिद्ध होते हैं। इस अर्थ में महापुरुष शब्द का मेरा यह प्रयोग इस आलेख के शुरू में उन्हें विशेषणों से परे बताने से भिन्न है।
समतामूलक समाज के स्वप्नदर्शी : भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अथक योगदान कभी भुलाये नहीं जा सकते। वे हम सब के लिये प्रेरणा-स्रोत के रूप में युगों-युगांतर तक उपस्थित रहेंगे। उनके विचार, जीवन-पद्धति और उनके काम की शैली हमेशा हमें उत्साहित करती रहेगी। कुछ कर गुजरने की जीजिविषा ने उन्हें दुनिया में वह मुकाम दिया कि भारत वर्ष उनका आजन्म ऋणी हो गया। बाबा साहेब ने एक सफल जीवन जीने का जो मंत्र दिया, एक रास्ता बनाया, उस पर चलकर हम एक नये भारत के लिये रास्ता बना सकते हैं। समतामूलक समाज का जो स्वप्न बाबा साहेब ने देखा था और उस स्वप्न को पूरा करने के लिये उन्होंने जिस भारतीय संविधान की रचना की, वह हमें अपनी मंजिल की तरफ ले जायेगा। मध्यप्रदेश की धरा इस नव-भारत निर्माता को जन्म देकर गौरवान्वित हुई है। मैं उनकी जयंती पर उनके बताये गये मार्ग का अनुसरण करने का संकल्प लेते हुए उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ।
(लेखक मध्यप्रदेश शासन में अनुसूचित जाति कल्याण, जनजातीय कार्य, नर्मदा घाटी विकास (स्वतंत्र प्रभार), सामान्य प्रशासन, विमानन एवं आनंद राज्य मंत्री हैं)

                                                                                                                                                         लाल सिंह आर्य

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