मल्टीमीडिया डेस्क। बैसाखी पर्व वैसे तो पूरे भारत वर्ष में ही मनाया जाता है, लेकिन विशेष रूप से पंजाब और आस-पास के राज्यों में बैसाखी बहुत उत्साह-उल्लास से मनाई जाती है। यह रबी की फसल पकने की खुशी का प्रतीक है।

प्रकृति की इस देन का और ईश्वर का धन्यवाद करने के लिए प्राप्त हुई फसल में से अन्न का कुछ अंश अग्नि स्वरुप परमात्मा को अर्पित किया जाता है और इस अन्न का प्रसाद सभी में वितरित किया जाता है।

बैसाखी नाम वैशाख माह से बना है। अप्रैल माह के 13 या 14 तारीख को जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, यानी जिस दिन मेष संक्रांति होती है, उसी दिन बैसाखी मनाई जाती है। इस साल यह पर्व 14 अप्रैल को यह मनाया जाएगा।

गंगा स्नान से पुण्य

हिंदुओं के लिए यह त्योहार नववर्ष की शुरुआत है। हिंदू धर्मावलंबी मानते हैं कि हजारों साल पहले देवी गंगा इसी दिन धरती पर उतरी थीं। उन्हीं के सम्मान में पारंपरिक पवित्र स्नान के लिए हिंदू गंगा किनारे स्नान करते हैं। इस दिन लोग भोग और पूजा करके देवताओं को प्रसन्न करते हैं। इस दिन गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन पापमोचनी गंगा में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

केरल में भी धूम

केरल में इसे 'विशु' के नाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग फूल, फल, अनाज, वस्त्र, सोना आदि से 'विशु कानी' सजाते हैं और नए कपड़े खरीदते हैं। सुबह जल्दी विशु कानी के दर्शन कर नए साल में में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

सिखों के लिए इसलिए है खास

सिख धर्म को मानने वालों के लिए यह त्योहार बेहद खास है। सिखों के दसवें गुरु गोविंदसिंहजी ने मुगल अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए 13 अप्रैल 1699 को खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिखों के गुरु तेग बहादुर को दिल्ली में चांदनी चौक पर औरंगजेब ने शहीद कर दिया था। तब आम लोगों की सुरक्षा और भलाई के लिए गुरु गोविंदसिंह ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की।

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